भोपाल में चेहल्लुम पर निकला मातमी जुलूस

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भोपाल में चेहल्लुम पर निकला मातमी जुलूस
हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की याद में गम और अक़ीदत से गूंजा शहर

भोपाल। पैगम्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) एवं उनके 72 साथियों की शहादत की याद में रविवार को चेहल्लुम पर्व गम और अक़ीदत के साथ मनाया गया। इस मौके पर शिया समुदाय का बड़ा मातमी जुलूस निकाला गया। दो माह आठ दिन की अज़ादारी के बाद यह जुलूस ओल्ड सैफिया कॉलेज से शुरू होकर इमामीगेट तक पहुंचा। करीब ढाई घंटे तक चले इस जुलूस में “या हुसैन-या हुसैन” की सदाओं से पूरा आसमान गूंजता रहा और शहर का माहौल गमगीन हो गया।

जुलूस की शुरुआत से पहले मौलाना वसी हसन खां साहब ने तकरीर की। उन्होंने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन ने अन्याय, आतंकवाद और असत्य के आगे कभी घुटने नहीं टेके। ‘कलमा-ए-हक’ की खातिर उन्होंने खुदा की राह में अपनी जान कुर्बान कर दी। मौलाना ने कहा कि यह कोई त्योहार का जुलूस नहीं बल्कि गम का जुलूस है, जिसमें इंसान की आंख और दिल दोनों रोते हैं।

जुलूस में शामिल बंदे मातम करते और मर्सिये पढ़ते हुए चल रहे थे। अधिकांश लोग काले वस्त्रों में नजर आए। नौजवानों के जत्थे अनुशासन के साथ मातम करते हुए चल रहे थे और कई नौजवान लहूलुहान भी दिखाई दिए। सबसे आगे हाथों में अलम और परचम थामे हुए नौजवान कदम से कदम मिलाकर बढ़ रहे थे। इस दौरान शहर की गलियां अज़ादारी की सदाओं और मातमी नौहों से गूंजती रहीं।

इस आयोजन के सूत्रधार जेगम अब्बास थे। वहीं शिया वेलफेयर सोसायटी के महासचिव सिब्तेन रिजवी और जुल्फिकार अली ने बताया कि जगह-जगह मर्सिये और नोहा पढ़े जाने की वजह से जुलूस को इमामीगेट तक पहुंचने में लंबा समय लगा। उन्होंने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन ने न्याय, सत्य और मानवता के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। उन्होंने यज़ीद के अत्याचार और अन्याय के खिलाफ खड़े होकर इतिहास में एक मिसाल कायम की।

इमामीगेट पहुंचकर मजलिस के साथ यह जुलूस विसर्जित हुआ। पूरे कार्यक्रम के दौरान माहौल में गम और अक़ीदत की गहराई साफ झलक रही थी। हर तरफ सिर झुकाए अकीदतमंद मातम करते नज़र आए और इंसानियत के पैगाम के साथ इमाम हुसैन की शहादत को याद किया गया।

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