कैंसर पीड़ित 80% बच्चे हो रहे रिकवर
AIIMS भोपाल से कैंसर पीड़ित बच्चों के लिए राहत भरी खबर सामने आई हैं। संस्थान की नई रिपोर्ट के अनुसार, अब बचपन में कैंसर का समय पर और समुचित इलाज मिलने से करीब 80% बच्चे ठीक हो रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि संपूर्ण इलाज के साथ उन्हें तनाव मुक्त रखा जाए। इसके लिए AIIMS में ACT (After Completion of Therapy) क्लिनिक और एक आधुनिक प्ले रूम की शुरुआत की गई है।
खुशहाल जीवन की ओर अग्रसर करना लक्ष्य एम्स भोपाल के निदेशक डॉ. अजय सिंह ने कहा, कैंसर से जंग जीत चुके बच्चों के संपूर्ण स्वास्थ्य और पुनर्वास को केंद्र में रखते हुए ACT क्लिनिक की शुरुआत की गई है। इस पहल का उद्देश्य न केवल उपचार के बाद के स्वास्थ्य प्रभावों से बच्चों को राहत देना है, बल्कि उन्हें एक सामान्य और खुशहाल जीवन की ओर अग्रसर करना भी है।
क्यों जरूरी ACT क्लिनिक बच्चों में इलाज के बाद भी उन्हें विकास, हार्मोन, हृदय, मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन सभी पहलुओं की समग्र देखभाल के लिए ACT क्लिनिक की शुरुआत की गई है।
इस क्लिनिक में पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजिस्ट, एंडोक्रोनोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरो-डेवलपमेंट विशेषज्ञ, साइको-ऑन्कोलॉजिस्ट, पोषण विशेषज्ञ, फिजियोथेरेपिस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक शामिल रहेंगे। पूरे कार्यक्रम का समन्वय एनाटमी विभाग द्वारा किया जाएगा, जिससे इंटिग्रेटेड ट्रीटमेंट पर जोर दिया जा सके।

शुरू हुआ प्ले रूम कैंसर पीड़ित बच्चों को इलाज के दौरान तनाव मुक्त रखने के लिए नए प्ले रूम बनाए गए हैं। डॉ. सिंह ने कहा कि यह कैन-किड्स-कीड्स कैन संस्था के सहयोग से तैयार किए गए है। यह प्ले रूम कैंसर और गंभीर बीमारियों से ग्रसित बच्चों के लिए मनोरंजन और मानसिक राहत का केंद्र बनेगा। इससे उनके उपचार के कठिन समय को थोड़ा सरल और खुशहाल बनाया जा सकेगा।
शरीर के साथ मन का ख्याल रखना जरूरी एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक, इलाज में अब बदलाव आ रहा है। अब तक बीमारी के इलाज में फोकस सिर्फ शारीरिक उपचार तक सीमित होता था। लेकिन, बीते सालों में कई रिसर्च ने यह साफ किया है कि शरीर के साथ मन को स्वस्थ रखना भी आवश्यक है। इसलिए, अब एम्स में इलाज सिर्फ दवा तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह आशा, ताकत और खुशियों को लौटाने की प्रक्रिया है।
ACT क्लिनिक उसी दृष्टिकोण का विस्तार है, जिससे हम यह सुनिश्चित कर सकें कि बच्चे न सिर्फ बीमारी से उबरें, बल्कि जीवन को संपूर्णता से जी सकें।
