गृहस्थ मुख्यमंत्री करते हैं वानप्रस्थ जैसा राजनीतिक तप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की राजनीतिक शुचिता से समूचा देश परिचित है। मगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी गृहस्थ होते हुए भी वानप्रस्थ जैसा कठिन राजनीतिक तप कर रहे हैं, यह अभी तक लोगों को पता ही नहीं और यह वे मुख्यमंत्री बनने के बाद नहीं बल्कि बहुत पहले
से ही करते आ रहे हैं। शासन की कोई सुविधा परिवार के लिए नहीं, इस व्रत का वे आज भी सख्ती से पालन करते हुए भारतीय जनता पार्टी की शुचितापूर्ण राजनीति की
परंपरा को ही आगे बढ़ा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दो महीने का कार्यकाल
पूरा होने पर उसकी समीक्षा तो लोग कर ही रहे हैं लेकिन कुछ ऐसे अनछुए पहलू भी हैं जिनकी जानकारी अभी तक लोगों को नहीं है।
वे प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, इस नाते उनके लिए या उनके परिवार के लिए सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं है। वे गृहस्थ हैं। परिवार में मुखिया के रूप में बुजुर्ग पिता हैं। पत्नी हैं। बेटा-बेटी हैं। अन्य नाते-रिश्तेदार हैं। मगर सच जानकर किसी को भी हैरानी हो सकती है कि इनमें से आज तक किसी को भी मुख्यमंत्री निवास में रुकने का अवसर नसीब नहीं हुआ। पत्नी और बच्चों को भी नहीं। उनकी पत्नी, पिता और एक बेटा आज भी उज्जैन में ही पैतृक आवास में रहते हैं। एक बेटा डॉक्टर अभिमन्यु भोपाल में चिकित्सा की पढ़ाई हॉस्टल में रहकर कर रहा है। जब वे उच्च शिक्षा मंत्री थे तब उनकी बेटी आकांक्षा ने हॉस्टल में ही रहकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और एक और बेटे वैभव ने उज्जैन में ही रहकर विधि की पढ़ाई पूरी की। आज भी वैभव उज्जैन में अपनी मां एवं दादा के साथ ही रहता है। कॉलेज जाने तक वैभव को डॉ. मोहन यादव एक बाइक भी लेकर नहीं दे सके।
डॉ. यादव के सिद्धान्तों से उनके परिवार के सभी सदस्य | परिचित हैं। इसलिए कोई उनसे हटकर चलने की कोशिश भी नहीं करता। उनकी या शासन की गाड़ियों में उनके परिवार का कोई सदस्य घूमता नहीं दिखेगा। स्वयं अपने वाहन में भी किसी को नहीं बैठाते। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अंध विश्वास और रूढ़ियों को भी तोड़ रहे हैं। उज्जैन में किसी भी मुख्यमंत्री ने रात्रि विश्राम नहीं किया, क्योंकि मान्यता है कि | वहां के राजा महाकाल हैं और वहां कोई अन्य शासक या राजा | रात में नहीं रुक सकता। लेकिन डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वयं को महाकाल का पुत्र बताते हुए वहां रुककर इस मिथक को तोड़ा। मुख्यमंत्री पद की शपथ में भी | उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं था। पिता ने उन्हें टीवी पर शपथ लेते हुए देखा। महाकाल की पूजा भी वे अकेले करने पहुंचे थे, पत्नी को भी साथ नहीं ले गए थे। उनके इस व्यवहार पर कुछ अचरज करते हैं तो कुछ राजनीतिक शुचिता मानते हैं। मगर डॉ. यादव मुख्यमंत्री बनने के बाद नहीं बल्कि पहले से ही ऐसे ही रहे हैं। उज्जैन विकास प्राधिकरण अध्यक्ष के बतौर उन्हें उज्जैन सरकारी आवास मिला था। उस वक्त भी उन्होंने वह आवास विक्रम विद्यापीठ को कार्य करने के लिए दे दिया था। उसका उपयोग उन्होंने अपने लिए इसलिए नहीं किया, क्योंकि उनके पास खुद का आवास था।
