लोकसभा चुनाव से पहले CAA; मुस्लिम बोले- NRC लाकर हमारे अधिकार छिनेंगे
तारीख 23 अप्रैल 2019, लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण की वोटिंग का दिन। प्रेस कॉन्फ्रेंस में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा- ‘आप क्रोनोलॉजी समझ लीजिए। पहले CAA (सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट) आने जा रहा है, फिर NRC आएगा। NRC सिर्फ बंगाल के लिए नहीं, पूरे देश के लिए आएगा।’
तारीख 22 दिसंबर 2019, जगह दिल्ली का रामलीला मैदान। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- ‘अर्बन नक्सल अफवाह फैला रहे हैं कि सारे मुसलमानों को डिटेंशन सेंटर भेजा जाएगा। यह झूठ है, झूठ है, झूठ है… 2014 से मेरी सरकार आने के बाद NRC शब्द की कोई चर्चा नहीं हुई है।
तारीख 11 मार्च 2024, लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा से पांच दिन पहले। शाम 5 बजे खबर फ्लैश हुई कि प्रधानमंत्री मोदी नेशनल टेलीविजन पर कुछ बड़ा ऐलान करने वाले हैं। करीब 6 बजे ब्रेकिंग खबर फ्लैश हुई- ‘केंद्र सरकार ने CAA की अधिसूचना जारी कर दी है।’
CAA लागू करके BJP ने अपना बड़ा वादा पूरा कर लिया। अब अगला वादा NRC का है, जिस पर फिलहाल BJP चुप है, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि CAA और NRC एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यहीं डर मुसलमानों को भी है। NRC लिस्ट में नाम नहीं होने के बाद भी हिंदू तो CAA के जरिए भारत के नागरिक बन जाएंगे, लेकिन मुस्लिमों की नागरिकता छिन जाएगी। वोट देने का अधिकार नहीं बचेगा।
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1970 के दशक की बात है। पूर्वी पाकिस्तान और बांग्लादेश से बड़ी संख्या में रिफ्यूजी भारत आए, खास करके असम और पश्चिम बंगाल में। इसी बीच 1978 में असम की मंगलदोई लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव हुए। इसमें देखा गया कि अचानक वोटर्स की संख्या बढ़ गई।
The All-Assam Students Union यानी AASU ने कहा कि बांग्लादेश से भागकर आए अवैध प्रवासियों की वजह से ऐसा हुआ है। AASU ने इन लोगों को बांग्लादेश भेजने की मांग की, पर केंद्र सरकार तैयार नहीं हुई।
चार साल बाद यानी 1983 में असम में विधानसभा चुनाव हुए। AASU ने जबरदस्त विरोध किया और यह चुनाव हिंसा की भेंट चढ़ गया। ORF वेबसाइट के मुताबिक तब 2 हजार से ज्यादा बांग्लादेशी प्रवासी मारे गए थे।
इसके बाद केंद्र की राजीव गांधी सरकार AASU की मांग मानने पर मजबूर हो गई। 15 अगस्त 1985 की अलसुबह राजीव गांधी और आसू के बीच समझौता हुआ, जिसे असम अकॉर्ड कहा जाता है। इसके बाद नागरिकता कानून में बदलाव किया गया।
असम अकॉर्ड के तहत 1966 से पहले असम आने वालों को नागरिकता देने की बात कही गई। जो लोग 1966 और मार्च 1971 के बीच आए थे, उन्हें 10 साल बाद वोटिंग लिस्ट में शामिल करने की बात कही गई। जो लोग मार्च 1971 के बाद असम आए, उन्हें अवैध प्रवासी माना गया।

असम के बाद नॉर्थ ईस्ट के दूसरे राज्यों और पश्चिम बंगाल से भी ऐसी ही मांग उठने लगी। 2 लोकसभा सीटों वाली BJP ने इस मुद्दे को लपक लिया। 1989 के लोकसभा चुनाव में BJP ने देशभर में NRC लागू करने का वादा किया।
NRC यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स, जिसमें भारत के नागरिकों के नाम दर्ज किए जाते हैं। NRC लागू होने के बाद हर व्यक्ति को डॉक्यूमेंट के आधार पर साबित करना पड़ेगा कि वह भारतीय है, जो साबित नहीं कर पाएगा, उसे अवैध प्रवासी माना जाएगा।
अभी देश में सिर्फ असम में ही NRC लागू है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मुताबिक करीब 19 लाख लोग NRC की लिस्ट से बाहर हैं। इनमें 7 लाख मुस्लिम हैं।
बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर चुनाव में उतरी BJP, पहली बार दिल्ली विधानसभा में बहुमत
साल 1993, दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने थे। ये वो दौर था जब देश में हिंदुत्व का मुद्दा उफान पर था। शाहबानो केस के बाद राजीव गांधी की सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों से घिरी थी। बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाया जा चुका था। ऐसे में BJP ने वादा किया कि हमारी सरकार बनी तो ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ को वापस भेजेंगे।
यह पहली बार था जब BJP बांग्लादेशी प्रवासियों के मुद्दे पर चुनाव में उतरी। BJP ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 में से 49 सीटें जीत लीं। पहली बार दिल्ली में BJP की सरकार बनी। इसके बाद NRC, BJP के कोर एजेंडे में शामिल हो गया।

वाजयेपी सरकार के CAA में अवैध प्रवासियों को नागरिकता नहीं
साल 2003, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट 2003 लेकर आई। इसमें कहा गया कि अवैध प्रवासियों को नागरिकता नहीं मिलेगी। तब मनमोहन सिंह राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष थे। उन्होंने कहा- ‘पाकिस्तान और बांग्लादेश में प्रताड़ित हो रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देनी चाहिए।’
तब गृहमंत्री रहे आडवाणी ने कहा- ‘हम किसी को जबरन वापस नहीं भेजेंगे। पड़ोसी देशों से मित्रतापूर्ण तरीके से बात करके हम उन्हें उनके देश भेजेंगे।’
कांग्रेस और लेफ्ट ने भी इस एक्ट का समर्थन किया। 2004 में CAA लागू हो गया, लेकिन उस साल हुए चुनाव में NDA की सत्ता छीन गई। उसके बाद 10 साल UPA की सरकार रही और मनमोहन सिंह PM रहे, लेकिन CAA 2003 के प्रावधानों को खास तवज्जो नहीं दी गई।
PM बनने के 6 महीने बाद मोदी ने गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को लॉन्ग टर्म वीजा दिया
साल 2014, BJP, नरेंद्र मोदी को PM फेस बनाकर लोकसभा चुनाव में उतरी। BJP ने घोषणापत्र में वादा किया कि हिंदू शरणार्थियों को उनके स्वाभाविक घर (भारत) में लाया जाएगा।
22 फरवरी को असम में एक रैली के दौरान मोदी ने कहा- ‘दुनिया में कहीं भी हिंदुओं पर जुल्म होगा, तो भारत उन्हें आश्रय देगा, लेकिन जो लोग राजनीति के लिए घुसपैठिया बनकर यहां रह रहे हैं, उन्हें हम बाहर निकालेंगे। असम के लोग बेरोजगार हैं और बाहर के लोग यहां आकर रोजी-रोटी कमा रहे हैं। ये अन्याय है कि नहीं। दिल्ली में सरकार बना दीजिए, ये अन्याय मिट जाएगा।’
26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और 6 महीने बाद ही यानी दिसंबर 2014 में एक नोटिफिकेशन जारी किया। इसमें पाकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, ईसाई और बौद्धों को लॉन्ग टर्म वीजा देने की बात कही गई।

2016 में असम विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान BJP अध्यक्ष रहे अमित शाह ने कहा कि वे असम को बांग्लादेशी घुसपैठियों से मुक्ति दिलाएंगे। साथ ही यह भी वादा किया कि उनकी सरकार आई तो प्रवासी हिंदुओं की रक्षा करेगी।
असम में इसका विरोध भी हुआ, लेकिन नतीजे BJP के पक्ष में रहे और पहली बार उसने असम में सरकार बनाई। यहां से अघोषित रूप से साफ हो गया कि मुस्लिम प्रवासियों को छोड़कर बाकी पाकिस्तानी-बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों को सरकार नागरिकता देगी।
नॉर्थ ईस्ट में जोरदार विरोध, लोकसभा से पास हुआ बिल, लेकिन राज्यसभा में पेश नहीं किया
19 जुलाई 2016, मोदी सरकार ने लोकसभा में CAA बिल पेश किया। इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम यानी हिंदू, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध और ईसाई प्रवासियों को नागरिकता देने की बात कही गई।
इस बिल का विरोध हुआ। असम में BJP की सहयोगी पार्टी असम गण परिषद ने भी इसका विरोध किया। पूरे नॉर्थ ईस्ट में प्रदर्शन शुरू हो गए। लिहाजा सरकार ने इसे राज्यसभा में पेश नहीं किया और यह बिल लैप्स हो गया।

यह पहली बार था जब BJP गैर मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने की बात कह रही थी, इससे पहले BJP का स्टैंड था कि सभी अवैध प्रवासियों को बाहर निकालेंगे। इसी बात को लेकर विपक्ष ने BJP पर आरोप लगाया कि वो पोलराइजेशन के लिए मुस्लिम प्रवासियों को CAA से बाहर कर रही है।
CAA के विरोध में ओवैसी ने बिल की कॉपी फाड़ दी
2019 लोकसभा चुनाव में BJP ने CAA-NRC लागू करने का अपना वादा दोहराया। 12 अप्रैल 2019 को पश्चिम बंगाल के रायगंज में अमित शाह ने कहा कि बांग्लादेशी घुसपैठिया दीमक हैं। हम दोबारा जीतकर आएंगे, तो इन्हें बाहर निकालेंगे।
30 मई को नरेंद्र मोदी रिकॉर्ड 303 सीटें जीतकर दोबारा प्रधानमंत्री बने। PM बनने के करीब 6 महीने बाद यानी 9 दिसंबर 2019 को CAA बिल फिर से लोकसभा में पेश किया गया। इसका जोरदार विरोध हुआ।
हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ‘अगर अमित शाह साहब का नाम NRC में नहीं आएगा तो CAA के तहत उनका नाम आ जाएगा, लेकिन उन्हीं के पार्टी के एक मुस्लिम नेता का नाम नहीं आया NRC में तो उसे बाहर जाना पड़ेगा। …बताइए गृह मंत्री जी ये भेदभाव नहीं है? हमारा गुनाह क्या है, हम मुसलमान हैं। ये एक और बंटवारा है।’
इसके बाद ओवैसी ने CAA बिल की प्रति फाड़ दी।
इसके जवाब में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा- ‘जो लोग कहते हैं कि माइनॉरिटी को विशेष व्यवस्था मिलनी चाहिए, वे लोग ही CAA का विरोध कर रहे हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान की माइनॉरिटी को विशेष व्यवस्था मिलनी चाहिए या नहीं। कौन भेदभाव कर रहा है मान्यवर, मैं तो नहीं कर रहा।’
अमित शाह ने आगे कहा- ‘इस देश का बंटवारा धर्म के आधार पर किसने किया…कांग्रेस ने। अगर धर्म के आधार पर देश का बंटवारा नहीं होता, तो इस बिल को लाने की नौबत ही नहीं आती।’
10 दिसंबर की रात CAA बिल लोकसभा से पास हो गया। इसके पक्ष में 311 वोट पड़े और 80 वोट विपक्ष में। 11 दिसंबर को यह बिल राज्यसभा से भी पास हो गया। राज्यसभा में इसके पक्ष में 125 वोट पड़े और विपक्ष में 99 वोट।

CAA के विरोध में दिल्ली में दंगे, अमेरिका-ब्रिटेन में प्रदर्शन
CAA बिल जैसे ही दोनों सदनों से पास हुआ, देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। JNU, जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र सड़कों पर उतर गए। शाहीन बाग में मुस्लिम महिलाओं ने डेरा जमा लिया।
पुलिस और सरकार धरना-प्रदर्शन खत्म कराने की कोशिश करती रही, लेकिन बात नहीं बनी। सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग में धरना खत्म कराने के लिए ऑब्जर्वर भी भेजे, लेकिन महिलाएं शाहीन बाग से नहीं हटीं।
जनवरी आते-आते UP, असम, कर्नाटक, मेघालय जैसे राज्य CAA विरोध की जद में आ गए। फरवरी-मार्च के बीच दिल्ली में दंगे हुए। करीब 83 लोगों की जान गई। दिल्ली, पश्चिम बंगाल, केरल सहित कई राज्यों ने CAA लागू करने से मना कर दिया।

दूसरी तरफ विदेशों में भी इसके विरोध के स्वर उठने लगे। अमेरिका, इंग्लैंड, बर्लिन जैसे देशों में कुछ लोग CAA के विरोध में सड़कों पर उतर गए। UN सेक्रेटरी ने कहा कि इस कानून से मुस्लिम बिना देश के हो जाएंगे।
विरोध बढ़ता देख सरकार ने CAA को होल्ड कर दिया। तब से हर 6 महीने पर सरकार CAA लागू करने के लिए एक्सटेंशन लेती रही। पिछले चार सालों में सरकार ने 8 एक्सटेंशन लिया और आखिरकार 2024 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले CAA लागू कर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी के CAA लागू करने के 5 मकसद
1. ये मैसेज देना कि भारत हिंदुओं का देश है
22 फरवरी, 2014, जगह असम का सिलचर। BJP के तब PM फेस रहे नरेंद्र मोदी ने कहा- ‘हिंदू जाएगा तो कहां जाएगा। दुनिया के किसी भी देश में अगर हिंदुओं को खदेड़ा जाएगा, तो उसके लिए एक ही जगह बची है। वो वहीं चला आएगा।
भाइयो-बहनों… क्या हमारी सरकार उन हिंदुओं के साथ वैसा ही जुल्म करेगी जैसा विदेशों में उनके साथ हो रहा। क्या हम उनके साथ वैसा ही जुल्म करेंगे जैसा बांग्लादेश में हो रहा है। हम ऐसा नहीं करेंगे।’

2 जनवरी 2020, CAA बिल को लेकर केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी ने कहा, ‘अल्पसंख्यकों (तीन मुस्लिम देशों के) को नागरिकता देना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। अगर वे भारत नहीं आएंगे तो वे कहां जाएंगे? इटली?’
2. पितृभूमि, मातृभूमि और पुण्यभूमि की विचारधारा को बढ़ावा देना
हिंदू महासभा के नेता रहे और BJP-RSS के आइकॉन वीडी सावरकर ने अपनी किताब- ‘हिंदुत्व : कौन है हिंदू’ में लिखा है कि जिस भी व्यक्ति की पितृभूमि, मातृभूमि और पुण्यभूमि भारत है, वही इस देश का नागरिक है।
यानी सावरकर के मुताबिक जो लोग मक्का और येरुशलम को अपनी पुण्यभूमि मानते हैं, वे भारत के नागरिक नहीं हो सकते। उनका इशारा मुसलमानों और ईसाइयों को लेकर था।
मुस्लिम स्कॉलर जफरुल इस्लाम बताते हैं- ‘सावरकर के जमाने से संघ का एजेंडा रहा है कि जो धर्म भारत में पैदा हुए हैं, वे तो हमारे हैं, लेकिन जो धर्म बाहर पैदा हुए, वे हमारे नहीं हैं।’
3. RSS के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को बढ़ाना चाहती है सरकार
सीनियर जर्नलिस्ट और मुस्लिम स्कॉलर जफरुल इस्लाम बताते हैं- ‘BJP जो काम भी करती है, उसके पीछे कहीं न कहीं हिंदुत्व की आइडियोलॉजी होती है। संघ की किताबों में लिखा है कि जो लोग बाहर के हैं, वो यहां गुजारा करें, लेकिन हक नहीं मांगे। श्रीलंका और भूटान में भी तो धर्म के नाम पर ज्यादती हो रही है, लेकिन इन्होंने उन्हीं तीन देशों को लिस्ट में रखा, जो मुस्लिम कंट्री हैं।’

4. पश्चिम बंगाल और असम में शरणार्थियों के वोट बैंक पर नजर
सीनियर जर्नलिस्ट नीरजा चौधरी एक मीडिया इंटरव्यू में बताती हैं- ‘पश्चिम बंगाल में हिन्दू बंगाली और हिन्दू बांग्लादेशी प्रवासियों के वोट पर BJP की नजर है। यहां BJP, 2019 से ज्यादा लोकसभा सीटें जीतना चाहती है। पिछली बार BJP को यहां 42 में से 18 सीटों पर जीत मिली थी। इस जीत में तीन से चार सीटों पर मतुआ कम्युनिटी की भूमिका रही।’
दरअसल, पश्चिम बंगाल में करीब 2 करोड़ मतुआ कम्युनिटी के लोग रहते हैं। मतुआ कम्युनिटी, पश्चिम बंगाल की दूसरी सबसे बड़ी दलित कम्युनिटी है। यहां 42 में से 10 लोकसभा सीटें रिजर्व्ड हैं। इनमें से 4 सीटों पर अभी BJP का कब्जा है।
पश्चिम बंगाल की तरह असम में भी बड़ी संख्या में हिंदू शरणार्थी हैं, जिन पर BJP की नजर है। 22 फरवरी 2014 को नरेंद्र मोदी ने असम में चुनाव प्रचार के दौरान भीड़ से पूछा- ‘भाइयो-बहनों… बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को बाहर भेजना चाहिए कि नहीं भेजना चाहिए। जरा पूरी ताकत से बोलो बाहर भेजना चाहिए कि नहीं भेजना चाहिए।’
मोदी ने आगे कहा- ‘बांग्लादेश से दो तरह के लोग आए हैं। एक राजनीतिक षड्यंत्र के तहत और दूसरे वो जिनका बांग्लादेश में जीना मुश्किल कर दिया गया है। उनकी बहन-बेटियों की इज्जत सलामत नहीं है। हिंदू जाएगा तो कहां जाएगा। हम नहीं चाहते कि बांग्लादेश से आए हिंदुओं का अकेला बोझ असम उठाए। पूरे हिंदुस्तान को उन्हें आश्रय देना चाहिए।’

5. चुनाव से पहले हिंदू बनाम मुसलमान कराना, ताकि ध्रुवीकरण हो
UP कांग्रेस के माइनॉरिटी प्रभारी शाहनवाज हुसैन बताते हैं- ‘सरकार किसी की नागरिकता नहीं छीन रही, लेकिन जिसे दे रही है, उसे तो धर्म के आधार पर नागरिकता दे रही है। यह तो संविधान के खिलाफ है। अभी CAA लाए हैं और आगे ये NRC भी लाएंगे।
सरकार को लगता है कि इस बिल का माइनॉरिटी विरोध करती है, तो चुनाव में पोलराइजेशन का वो लाभ ले पाएंगे। इनका हर प्लान दो वर्गों को बांटने के लिए ही होता है। मुसलमान इस साजिश को समझ गया है, इसलिए इस बार वो प्रोटेस्ट नहीं कर रहा।’
आखिर CAA का विरोध क्यों हो रहा है… 3 बड़ी वजह
1. NRC आया तो मुस्लिमों की छिन सकती है नागरिकता
सीनियर जर्नलिस्ट और मुस्लिम स्कॉलर जफरुल इस्लाम कहते हैं, ‘सरकार कह रही है कि हम किसी की नागरिकता नहीं छीन रहे, लेकिन ये पहला स्टेज है। दूसरे स्टेज में आप NRC लाकर नागरिकता से एक वर्ग को वंचित रखेंगे। अमित शाह ने बार-बार कहा है। अगर ये जीत गए तो NRC भी लाएंगे। हम CAA और NRC को अलग करके नहीं देख सकते हैं।’
2. जो CAA के जरिए नागरिक बनेंगे, उन्हें आरक्षण मिलेगा या नहीं
CSDS के प्रोफेसर हिलाल अहमद बताते हैं- ‘हमने कानूनी तौर पर पहली बार तय किया है कि धर्म के अधार पर किसे नागरिकता देंगे और किसे नहीं। ऐसा करके भाजपा ने अपना वादा तो पूरा कर लिया, लेकिन सवाल यह है कि जो लोग इस कानून के तहत नागरिक बनेंगे, क्या वे SC-ST वर्ग में शामिल होंगे। उन्हें आरक्षण मिलेगा या नहीं। इसका जवाब अभी तक CAA में सरकार की तरफ से नहीं दिया गया है।

2. श्रीलंकाई तमिलों को भी प्रताड़ित किया जा रहा, उन्हें इस कानून से बाहर क्यों रखा गया
CAA कानून में शामिल पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश तीनों ही मुस्लिम कंट्री है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर ऐसा किया है ताकि मुस्लिम को नागरिकता से दूर रखा जा सके। विपक्ष ने सरकार से पूछा कि श्रीलंका में भी तो तमिलों के साथ धार्मिक उत्पीड़न हो रहा, फिर उन्हें नागरिकता क्यों नहीं मिल रही।
BJP प्रवक्ता प्रेम शुक्ला जवाब देते हैं, ‘श्रीलंकाई तमिलों को भी पहले कानून बनाकर नागरिकता दी गई है। उस वक्त किसी ने नहीं पूछा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए अल्पसंख्यकों को नागरिकता क्यों नहीं दी जा रही। आज भी जिसे नागरिकता चाहिए, उसे मेरिट के आधार पर नागरिकता मिलती है। पाकिस्तानी सिंगर अदनाम सामी को सरकार ने नागरिकता दी है।’
अमेरिका और यूनाइटेड नेशंस ने उठाए CAA पर सवाल

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार हाई कमीशन के एक प्रवक्ता ने इंटरनेशनल न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से कहा, ‘हमने 2019 में कहा था कि भारत का CAA भेदभाव करता है। यह भारत के अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों का उल्लंघन है। अभी जो कानून लागू हुआ है, उसे हम परख रहे हैं कि ये अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार के नियमों के मुताबिक है या नहीं।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने कहा, ‘हम नागरिकता संशोधन नियम की अधिसूचना को लेकर चिंतित हैं। हम बारीकी से देख रहे हैं कि यह अधिनियम कैसे लागू किया जाएगा। धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान और सभी समुदायों के लिए कानून के तहत समान व्यवहार मौलिक लोकतांत्रिक सिद्धांत हैं।’
सुप्रीम कोर्ट में CAA को चुनौती देने वाली 200 याचिकाएं
CAA को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 200 से ज्यादा याचिकाएं लगाई गई हैं। 19 दिसंबर 2019 को उस वक्त के चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस पर सुनवाई करते हुए कहा था कि सरकार का पक्ष जाने बगैर कोर्ट इस पर कोई फैसला नहीं लेगा। इसके बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट प्रस्तुत करते हुए CAA का बचाव किया था।

