लगे हाथ मीडिया भी भर ले अपनी मांग…

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पहलगाम हमले और उसके बाद के ऑपरेशन सिंदूर के बाद मैंने कुछ क्षणिक प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर दीं थीं। जिसके बाद मेरे बड़े भाई और भोपाल में रिपोर्टिंग के क्षेत्र में खुला हाथ देने वाले घनश्याम पंजवानी सर ने मुझे कहा था कि मैं इस मसले पर और अधिक खुलकर हाथ दिखाऊं। उनकी बात मेरे लिए आदेश है। अब हुआ ये कि पिछले कुछ दिनों में तेजी से घटनाक्रम बदला कि हर नए दिन बीते दिन की घटनाएं पुरानी होनें लगीं तो मैं इंतजार कर रहा था एक ठहराव का। अब शायद सही मौका है कि इस पर कुछ लिखा जाए। चूंकि मीडिया मेरी च्वाइस रहा है और मैं इस मीडिया जगत की बड़ी मशीनरी का छोटा सा अंग हूं तो क्यों न शुरुआत मीडिया से ही की जाए।

कमी है हम में

मीडिया ने पहलगाम की घटना के दिन शुरुआत की तो शुरु में किसी झड़प में एक फिर दो लोगों के घायल या मृत होने की जानकारी देनी शुरु की लेकिन जैसे-जैसे शाम बीती वैसे-वैसे यह संख्या बढ़ती गई और अंत में 26 लोगों की मौत की जानकारी सामने आई। अक्सर कहा जाता है कि जहां न पहुंच सके रवि वहां पहुंच जाए कवि। यह बात मीडिया पर भी लागू होती है। मीडिया एक माध्यम है लोगों तक जानकारी पहुंचाने की लेकिन एक बजे की घटना का पूरा खुलासा होते-होते देर रात हो गई। यह सोचनीय विषय है वो भी तब जबकि देश के कमसे कम एक दर्जन न्यूज चैनल खुद को नंबर एक बताते नहीं अघाते हैं।

नहीं रह पाता धैर्य

इधर हमले की जानकारी सामने आई और दूसरे दिन फ्लाइट से सभी चैनलों के कथित बड़े चेहरे काश्मीर पंहुच गए और वहां की जानकारी देने लगे। सभी में होड़ सी लगी थी कि कौन क्या नया दे सकता है। एक दिन पहले की असफलता का दाग मिटाने के लिए ऐसे-ऐसे खुलासे होने लगे कि कोई क्या कहे। एक महान महिला रिपोर्टर ने तो पेड़ के पीछे छिप कर बताया कि कैसे आतंकी पेड़ के पीछे छिप सकते हैं। सिस्टम की लापरवाही को ढकने की शुरुआत हो चुकी थी। कोई सवाल नहीं कर रहा था कि घटना के समय हमारा खुफिया तंत्र कैसे निष्क्रिय रहा। और भी कई सवाल जो दबा दिए गए। जो आज भी आम जनमानस को चुभ रहे हैं। इधर सत्ता ने भी अपना काम शुरु कर दिया था। फौरन मंत्री मौके पर पहुंचने लगे। प्रधानमंत्री ने अपनी विदेश यात्रा बीच में ही खत्म कर दी और बिहार जा पहुंचे। जहां से उन्होने गर्जना की। इस बीच विपक्ष ने सरकार को बिना शर्त समर्थन दे दिया था।

सूचना करने लगे लीक

इधर प्रधानमंत्री ने गर्जना की और उधर हमारे न्यूज चैनल चीखने लगे। अपनी सैन्य तैयारी, हथियार अलग अलग उकसाऊ हेडलाइन्स के साथ दिखाने लगे। पाकिस्तान की पतलून जैसे तुक्के मिलाकर अपने सभी आधुनिक हथियार दिखा दिए गए। पुराने सैन्य अधिकारियों को बुलाकर सभी संभावित विकल्प दिखाए जाने लगे। इस तरह चलते चलते एक पखवाड़ा बीत गया। मसाला कम पड़ने लगा। फिर भी उबाऊ तरीके से खींचा गया। वो तो शुक्र हो सरकार का कि उसने इस कठिन काल में जातिगत जनगणना कराए जाने का ऐलान कर दिया नहीं तो चैनलों के पास सूचना का वास्तविक संकट उपस्थित हो जाता।

उन्होंने जीती दिल्ली तो हमने जीता कराची लाहौर

सरकार और सेना ने आखिर ऑपरेशन सिंदूर कर पूरी दुनिया को चौंका दिया। दर्जनों की संख्या में दहशतगर्द मारे गए। इससे बौखलाई पाकिस्तानी सेना ने अपनी नापाक करतूत दिखा दी और दोनों देशों के बीच संघर्ष शुरु हो गया। हमारे विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहे न्यूज चैनलों ने इस दौरान जिस तरह की खबरें दीं वो सनसनीखेज थीं। तीनों सेनाओं को युद्ध में उतार दिया गया। आईएनएस से गोलाबारी शुरु हो गई। लाहौर, इस्लामाबाद, कराची सब हमारा हो गया। हालंकि जाहिल उस तरफ भी थे जिन्होंने पाकिस्तानी सेना को रातभर में आधी दिल्ली पर कब्जा करा दिया। पूरे देश में जोश भरने में होश गवां बैठे न्यूज चैनलों को अगली सुबह तलब कर फटकार लगाई गई इसके बाद कुछ ने माफी मांगी तो कुछ बेशर्म बने रहे। मीडिया ने इसके बाद भी सब्र नहीं किया और विपक्ष के सवालों पर उन्हें देश विरोधी, देशद्रोही का तमगा बांटना शुरु कर दिया है। जबकि स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार से सवाल काफी जरूरी हैं। पारदर्शिता जरूरी है। उस समय पूरा देश एक जुट था। न कोई हिंदु था न मुसलमान। जाहिर है कि हमें सोचना होगा कि क्यों हमारी मीडिया आज भी पूरी दुनिया में सौवें नंबर पर भी नहीं ठहरती। हम क्या थे और क्या हैं और क्या होंगे अभी जैसी पंक्तियां राष्ट्रकवि ने शायद मीडिया के लिए ही लिखी थी।

जरूरी है कि भर दी जाए मांग

पिछले दिनों एक खबर आई थी कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद अब पार्टी घर-घर जाकर महिलाओं को सिंदूर बांटेगी लेकिन बाद में पार्टी ने इसका खंडन कर दिया। भले हमारा मीडिया खुद को स्वतंत्र, निष्पक्ष कहता है लेकिन हकीकत क्या है सभी जानते है। अब इसके पीछे क्या कारण हैं सभी को पता है। ऐसे में जरूरी है कि मीडिय़ा खुद को सरकार की सहगामी बताते हुए सरकार का सिंदूर अपनी मांग में सजा ले। माथे में सिंदूर न होने और साथ में रहने पर समाज में क्या कहा जाता है यह बताने की जरूरत नही है। चलिए फिलहाल विराम। वक्त मिला तो बात करेंगे कि सीजफायर से कैसे चमक गई सोशल मीडिया की किस्मत….।

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