बालाघाट से चुनाव मैदान में दिव्यांग CA दिलीप छावड़ा:स्कूल में एडमिशन नहीं मिलता था…कंकर मुंजारे की वजह से पढ़ाई हुई, अब उन्हीं से मुकाबला

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दिलीप नगर पालिका का चुनाव किसी सियासी पार्टी के टिकट पर लड़ना चाहते थे लेकिन ऐसा हो नहीं सका। - Dainik Bhaskar

‘मां जब मुझे स्कूल लेकर गई तो एडमिशन नहीं मिला। सभी ने कहा कि इसे टॉयलेट कौन लेकर जाएगा? जिस उम्र में मुझे पढ़ना था, उस उम्र में मैं चाचा की दुकान पर बैठने लगा। मुझे अपने जीवन में बहुत तकलीफ झेलनी पड़ी है।’

ये कहना है दिलीप छावड़ा का। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट दिलीप बचपन से दिव्यांग हैं। वे इस बार बालाघाट लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। 50 साल के दिलीप का विजन सांसद बनकर उन लोगों को राहत दिलाना है, जो आज भी पट्टे के अभाव में विस्थापित जैसी जिंदगी जी रहे हैं। इसके अलावा उनका मिशन संसदीय क्षेत्र के विकास को लेकर भी है।

27 मार्च को जब दिलीप अपने सहयोगी के साथ व्हील चेयर की मदद से नामांकन दर्ज करने पहुंचे तब प्रशासन ने भी संवेदनशीलता के साथ नामांकन प्रक्रिया को पूरा किया।

दिलीप का स्कूल में एडमिशन से लेकर पढ़ाई पूरी करने तक का सफर बेहद कठिन रहा है। दिव्यांगता से संघर्ष कर दिलीप की जिंदगी कैसे अंधेरे से बाहर निकली, किसने उनकी मदद की और आखिर वे चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? दिलीप की कहानी, उन्हीं की जुबानी…

बालाघाट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे दिलीप छावड़ा इस तरह स्कूटर पर प्रचार कर रहे हैं।
बालाघाट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे दिलीप छावड़ा इस तरह स्कूटर पर प्रचार कर रहे हैं।

दिव्यांगता के कारण कोई भी स्कूल एडमिशन नहीं देता था

पिता गांव में रहते थे। बचपन में पोलियोग्रस्त होने के कारण मेरी पढ़ाई नहीं हो पा रही थी। मां एडमिशन कराने कई स्कूल लेकर गईं, लेकिन दिव्यांगता के कारण कोई भी स्कूल एडमिशन नहीं देता था।

पढ़ने की उम्र में बालाघाट शहर आकर चाचा की दुकान में बैठता था। तब मेरी उम्र पहली या दूसरी क्लास में पढ़ने की नहीं थी। फिर नजदीकी स्कूल वैनगुड में कक्षा पहली में एडमिशन ले लिया, जहां मेरे कजिन पढ़ते थे।

स्कूल ले जाना और लाना दुकान के कर्मचारी करते थे। इस स्कूल में जैसे-तैसे तीसरी कक्षा तक पढ़ाई की। पढ़ाई में मन नहीं लगता था क्योंकि मैं क्लास के अन्य बच्चों से ज्यादा उम्र का था। इसके बाद मैंने स्कूल जाना बंद कर दिया और दुकान में ही रहता था।

दिलीप छावड़ा प्रचार के लिए अपने सहयोगी के साथ निकलते हैं।
दिलीप छावड़ा प्रचार के लिए अपने सहयोगी के साथ निकलते हैं।

शिक्षा मंत्री के दखल के बाद 10वीं में मिला एडमिशन

दिलीप कहते हैं कि मेरा भाई और कजिन कक्षा 7वीं में थे, तब मैं उनकी किताबें पढ़ता था। उन्हें एक टीचर पढ़ाने घर आते थे। उनका नाम था- बीआर भैरव। वे जो पढ़ाते थे, मैं उसे बाहर से सुना करता था। एक दिन टीचर की नजर मुझ पर पड़ गई। उन्होंने पूछा- पढ़ना चाहते हो? मैंने कहा- मैं उनके (कजिन ) साथ नहीं पढ़ूंगा क्योंकि मेरी उम्र इनसे 3 साल ज्यादा है।

मैंने कह दिया- 10वीं में एडमिशन मिलेगा, तब पढूंगा। उस समय उम्र 17 साल हो चुकी थी। तब उन्होंने तत्कालीन शिक्षा मंत्री को एक पत्र भेजा। मुझे स्कूल में बिना एडमिशन क्लास अटैंड करने की अनुमति मिल गई, लेकिन बताया गया कि परीक्षा देने का मौका नहीं मिलेगा।

तब भटेरा के सरकारी स्कूल में क्लास अटैंड की। उसी वक्त तत्कालीन स्कूल शिक्षा मंत्री का पत्र आया कि मैं 10वीं की परीक्षा दे सकता हूं, लेकिन यह बोर्ड तय करेगा। मैं तैयारी करने लगा, लेकिन मुझे लगा कि पास होना कठिन है तो मैंने कक्षा 8वीं की प्राइवेट परीक्षा दी और पास हो गया।

अब दिलीप के सीए बनने की कहानी…

मां के कहने पर डॉक्टर बनने का सपना देखा, टीचर के कहने पर सीए बन गए

जब मैं 10वीं में था, तब परिवार खासकर मां के कहने पर डॉक्टर बनने का सपना देखा, लेकिन एक घटना ने सब कुछ बदल दिया। हुआ ये कि क्लास में टीचर शरद अंगारे इंग्लिश का पीरियड ले रहे थे। तब कुछ बच्चे शोर मचा रहे थे। उन्होंने बच्चों को डांटते हुए कहा- हल्ला करने से कुछ नहीं होगा, आगे चलकर सीए बनकर दिखाओ। ये हरकतें सीए बनने वाले बच्चों जैसी नहीं हैं।

तब मेरे मन में विचार आया कि आगे चलकर सीए बनना चाहिए। उस समय भी मुझे थोड़ा बहुत पता था कि यह अकाउंट का फील्ड है, क्योंकि चाचा की दुकान का अकाउंट मैं ही देखता था, जिसमें मेरी मास्टरी थी। मैं 27 साल की उम्र में सीए बन गया था, क्योंकि मैं कभी फेल नहीं हुआ था।

जानिए, चुनावी मैदान में क्यों उतरे…

मैं किसी राजनीतिक पार्टी के टिकट पर नगर पालिका का चुनाव लड़ना चाहता था। सोचा था कि पार्षद का चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करूंगा। यदि जीत गया तो अध्यक्ष बनने की कोशिश करूंगा। मेरा गृह वार्ड 16 महिला के लिए आरक्षित हो गया था। इसके बाद जब विधानसभा चुनाव का समय आया तो मेरी तबीयत खराब हो गई थी इसलिए अब लोकसभा चुनाव के मैदान में हूं।

दिलीप कहते हैं कि मैं देश का विकास चाहता हूं। मेरे पास आइडिया भी है कि ये किस तरह से होगा? वे कहते हैं कि जितने भी चुनाव हुए, उसमें स्थानीय और बेसिक मुद्दे कभी नहीं उठे। बालाघाट खनिज बहुल जिला है। देश का 80 फीसदी खनिज यहां से जाता है। यहां धातुओं को अलग-अलग करने के प्लांट तक नहीं है।

देश में सिर्फ 6 रेंजर कॉलेज हैं। इनमें से एक बालाघाट में है, लेकिन उसकी हालत भी खराब है। यहां की जनता गरीब और असहाय ही है। यह इलाका तेंदूपत्ता का गढ़ है, फिर भी यह उपेक्षित है।

बालाघाट में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार

बालाघाट में इस बार त्रिकोणीय मुकाबले के आसार दिख रहे हैं। भाजपा ने पहली बार भारती पारधी के रूप में महिला प्रत्याशी को यहां से मौका दिया है। भारती पारधी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत पंचायत स्तर से की थी। वहीं, कांग्रेस की तरफ सम्राट सरस्वार चुनावी मैदान में हैं। वे जिला पंचायत अध्यक्ष हैं।

सम्राट सरस्वार के पिता अशोक सिंह सरस्वार 2 बार बालाघाट से विधायक रहे हैं। वहीं, बसपा की तरफ से पूर्व सांसद कंकर मुंजारे चुनाव लड़ रहे हैं। कंकर मुंजारे 3 बार विधायक और एक बार सांसद रहे हैं। उनकी पत्नी अनुभा मुंजारे इस समय कांग्रेस से बालाघाट विधायक हैं।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इस बार मुकाबला त्रिकोणीय इसलिए है क्योंकि बीजेपी-कांग्रेस के दोनों प्रत्याशी पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं जबकि मुंजारे इस मामले में अनुभवी हैं। विधानसभा चुनाव की बात करें तो बालाघाट की 6 में से 4 सीटों पर कांग्रेस काबिज है। ऐसे में कांग्रेस जीत की उम्मीद कर रही है, वहीं बीजेपी को उम्मीद है कि वो पिछले लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराएगी।

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