☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 22 मार्च, 2024 (शुक्रवार)
22 मार्च, 2024 (शुक्रवार)
पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
अपनी रचनाधर्मिता से, इस विविधता से भरे विचित्र एवं सुन्दर संसार का सृजन करने वाला परमात्मा स्वयं ही आद्यकवि के रूप में प्रतिष्ठित है। परमात्मा के हृदय की करुणा, माधुर्य एवं रचनाधर्मिता जब किसी कवि के अहंशून्य मनोभावों का संस्पर्श करती है, अर्थात् कवि की मानस चेतना व्यष्टि से समष्टि में समाहित होती है तो मनोभावों की यह सुन्दर, कलात्मक रसयुक्त अभिव्यक्ति कविता कहलाती है।”विश्व कविता दिवस” पर हार्दिक शुभकामनाएँ ..! कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-सम्बन्धों के संकुचित मण्डल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले आती है, जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है। इस भूमि पर पहुँचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता। वह अपनी सत्ता को लोक-सत्ता में लीन किए रहता है। कविता का मानव जीवन में बड़ा महत्व है। कविता मनुष्य को जीवन जीने की सही शिक्षा देती है। अच्छे संस्कार देती है। इसके अतिरिक्त कविता मानव मात्र को ऊँचे आदर्श, पवित्र धारणा और अटल आस्था को धारण करने की ऊर्जा और शक्ति प्रदान करती है। कविता के माध्यम से जीवन का सत्य और सब प्रकार के अनुभवों को व्यक्त किया जा सकता है। आज से सैंकड़ों वर्ष पहले राजर्षि भर्तृहरि जी ने कविता के विषय में यहाँ तक कह दिया था कि यदि किसी के पास अच्छी कविता है तो उसे विशाल राज्य की क्या आवश्यकता है। यदि हम कविता का सही मूल्यांकन करें तो आधुनिक परिवेश में भी कविता मानव जीवन के लिए संजीवनी का काम करती है। कविता से मनोरंजन के अतिरिक्त अच्छी शिक्षा और श्रेष्ठ आदर्श भी मिलते हैं, अपितु कविता तो जीवनदर्शन समझाती है। भागदौड़ के जीवन में कविताओं से नई स्फूर्ति मिलती है। तनावपूर्ण वातावरण में कविता हमें सुख, शान्ति और धैर्य प्रदान करती है।कविता का लक्ष्य जीवन को सही दिशा देना है। अच्छे कवियों को सुनकर और पढ़कर हम बहुत कुछ सीखते हैं। कविता का उद्देश्य सौन्दर्यभाव को जागृत करना है। जिस सौन्दर्य को हम अपने आस-पास विद्यमान होते हुए भी अनुभव नहीं कर पाते उसे कविता के माध्यम से अनुभव करने लगते हैं, क्योंकि कविता श्रोता को एक सौन्दर्य बोधक दृष्टि प्रदान करती है और वे भाव-सौन्दर्य, शब्द सौन्दर्य तथा ध्वनि सौन्दर्य सभी की अनुभूति करने लगते हैं ..!
“राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है ।
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है ।।”
श्रीराम का चरित्र नरत्व के लिए तेजोमय दीप स्तम्भ है। वस्तुतः भगवान श्रीराम मर्यादा के परमादर्श के रूप में प्रतिष्ठित हैं। श्रीराम सदैव कर्तव्यनिष्ठा के प्रति आस्थावान रहे हैं। उन्होंने कभी भी लोक-मर्यादा के प्रति दौर्बल्य प्रकट नहीं होने दिया। इस प्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में श्रीराम सर्वत्र व्याप्त हैं। कहा गया है – श्रीराम के चार रूप दर्शाए गए हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथ-नन्दन, अंतर्यामी, सौपाधिक ईश्वर तथा निर्विशेष ब्रह्म। पर इन सबमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का चरित्र सर्वाधिक पूजनीय है ..।
