०प्रतिदिन विचार (16/03/2024)सीएए और राज्यों की आपत्ति -राकेश दुबे

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नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए को लेकर कहीं जश्न कहीं विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं।पाकिस्तान से भारत आए शरणार्थी एक-दूसरे को रंग लगाते और मिठाइयां खिलाते नजर आए। तो केरल की राजधानी तिरुअंतपुरम में एलडीएफ के कार्यकर्ताओं द्वारा इस कानून की प्रतियां जलाई गई। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सीएए के नोटिफिकेशन जारी होते ही कह दिया कि था कि वो अपने राज्य में इसे लागू नहीं होने देंगे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कहा कि उनके अपने राज्य में सीएए लागू नहीं होगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने भी इसे विभाजनकारी बताया। इसके साथ ही इसे तमिलनाडु में भी लागू नहीं होने दिया जाएगा। दिल्ली में भी केजरीवाल सरकार का स्वर भी ऐसा ही समझ आ रहा है।ऐसे में प प्रश्न उठता है कि क्या केंद्र के बनाए किसी कानून को राज्य अपने यहां लागू करने से रोक सकता है?
इस दिशा में सबसे पहले असम में एनआरसी यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस पर काम हुआ। वर्तमान में नागरिकता संशोधन विधेयक को भी इसी कवायद का हिस्सा माना जा रहा है । संसद में पारित होने के पांच साल बाद केंद्र ने 11 फरवरी को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) लागू कर दिया। इस संशोधन के माध्यम से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश के 6 धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को नागरिकता का प्रावधान है जो पलायन करके भारत आए हैं । इनमें हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई और पारसी लोग शामिल हैं। नागरिकता संशोधन कानून किसी एक राज्य नहीं बल्कि पूरे देश में शरणार्थियों पर लागू हो गया। अब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल जैसे कई राज्यों का कहना है कि वे अपने-अपने राज्यों में इस कानून को लागू नहीं करेंगे।
इसमें कोई भी संदेह नहीं है। कोई भी राज्य सरकार संसद द्वारा पारित कानून की मंशा या वैधता पर सवाल उठा सकती है। इसके लिए संविधान के भीतर और लोकतंत्र के दायरे में अनेक प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। सुप्रीम कोर्ट में किसी भी कानून को चुनौती दी जा सकती है। संसद अपने द्वारा पारित किसी कानून को रद्द कर सकती है या सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भी किसी कानून को रद्द किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में सीएए से जुड़े 200 से अधिक याचिकाएं लंबित हैं। जिस पर सुनवाई होनी है। कानून के जानकार बताते हैं कि इस बीच में अगर किसी राज्य सरकार को इसको लेकर आपत्ति है तो भी उन्हें इस कानून का पालन करना होगा।
24 अप्रैल 1973 को भारत की सर्वोच्च अदालत ने केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार मामले में एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। इस फैसले को भारत के कानूनी इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। 13 जजों की बेंच ने ये फैसला सुनाया था। न्यायालय ने तय किया कि संसद के पास संविधान को संशोधित करने का अधिकार है, किन्तु वह किसी भी सूरत में संविधान के मूलभूत ढांचे को नहीं बदल सकते। बुनियादी ढांचे का मतलब है संविधान का सबसे ऊपर होना, कानून का शासन, न्यायपालिका की आजादी, संघ और राज्य की शक्तियों का बंटवारा, धर्मनिरपेक्षता, संप्रभुता, सरकार का संसदीय तंत्र, निष्पक्ष चुनाव आदि। कानून का शासन बेसिक स्ट्रक्चर है। कानून का शासन का मतलब ये है कि कोई भी कानून बना है वो सभी पर बाध्यकारी है। संविधान के आर्टिकल 246 में संसद और राज्य विधानसभाओं के बीच विधायी शक्तियों को वर्गीकृत किया गया है। कानून की वैधता के लिहाज से देखें तो सातवीं अनुसूति, नागरिकता के सवाल के तहत केंद्र सरकार को पूरे अधिकार हैं। ऐसे 97 विषय हैं, जिन्हें संघ सूची की 7वीं अनुसूची के अधीन हैं, जिनमें रक्षा, विदेश मामले, रेलवे और नागरिकता आदि शामिल हैं। नागरिकता किसी का मौलिक अधिकार नहीं हो सकता है और अमेरिका यूरोप में भी बदलाव किया गए हैं। इसके अलावा किसी दूसरे धर्म के लोगों को नागरिकता देने से मना नहीं किया गया है। वैसे नेताओं ने अभी तक बयान ही दिए हैं और राज्य सरकार की तरफ से कोई औपचारिक आदेश पारित नहीं हुआ है।

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