Khatu Shyam: कैसे दानव से देवता बने भगवान खाटू श्याम, जानिए महाभारत काल से जुड़ी जन्म कथा

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Khatu Shyam Birthday: कार्तिकशुक्ल पक्ष की एकादशी पर हर साल बाबा खाटू श्याम का जन्मोत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है।

इस साल ये दिन 12 नवंबर को आया है। जिसे लेकर खाटू श्याम के भक्तों में काफी उत्साह है।

खाटू नगरी (राजस्थान) में तो इस वक्त धूम मची हुई है।

मगर क्या आप जानते हैं कि कलयुग में देवता के रूप में पूजे जाने वाले खाटू श्याम एक राक्षस पुत्र थे?

तो आइए जानते हैं दानव पुत्र के देवता बनने की कहानी जो महाभारत काल और श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है।

भीम के पोते, घटोत्कच के पुत्र

महाभारत के अनुसार, खाटू श्याम पांडु पुत्र भीम के पोते हैं और उनका असली नाम बर्बरीक था।

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जब वनवास मिलने के बाद पांडव एक वन से दूसरे वन घूम रहे थे, तो पांडवों की मुलाकात हिडिंबा नाम की राक्षसी से हुई।

हिडिंबा भीम पर मोहित हो गई थी और उनसे शादी करना चाहती थी। फिर दोनों की शादी हुई जिससे इनके बेटे घटोत्कच का जन्‍म हुआ। बर्बरीक घटोत्‍कच का ही बेटा था। –

बर्बरीक को मां दुर्गा से मिले थे 3 दिव्य बाण

बर्बरीक अपने दादा और पिता घटोत्कच की ही तरह काफी शक्तिशाली थे। वह मां दुर्गा का परम भक्त था और देवी ने उसे 3 दिव्य बाण भी दिए थे। इन बाणों की खास बात ये थी कि ये बाण अपना लक्ष्य भेदकर वापस लौट आते थे।

महाभारत युद्ध के लिए बर्बरीक ने लिया ये प्रण

महाभारत युद्ध के दौरान बर्बरीक ने प्रण लिया था कि जो भी युद्ध में हारने वाला होगा वह उसकी तरफ से लड़ेंगे।

मगर श्रीकृष्ण को बर्बरीक की शक्तियों का अंदाजा था और वो जानते थे कि, अगर बर्बरीक युद्ध में शामिल हो गया तो पांडवों की हार तय है।

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बर्बरीक को रोकने के श्री कृष्ण ने बदला भेष

बर्बरीक को रोकने के लिए श्री कृष्ण गरीब ब्राह्मण बनकर बर्बरीक के सामने आए और दान में बर्बरीक का सर मांगा।

ये सुनते ही बर्बरीक समझ गए कि, यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है फिर बर्बरीक ने उनसे अपने वास्तविक रूप में आने को कहा।

बर्बरीक ने कटे सिर से देखी महाभारत

इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपना असली रूप बर्बरीक को दिखाया। श्रीकृष्ण के दर्शन होते ही बर्बरीक ने खुशी-खुशी अपना सर काटकर उन्हें दान कर दिया।

सिर देने से पहले बर्बरीक ने श्रीकृष्ण से महाभारत युद्ध देखने की इच्छा जताई थी तो उन्होंने बर्बरीक के कटे सिर को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहां से उन्होंने पूरी महाभारत देखी।

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ऐसे खाटू श्याम बने बर्बरीक

बर्बरीक की भक्ति और बलिदान से श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए थे और उन्हें वरदान दिया कि, तुम कलयुग में मेरे श्याम नाम से पूजे जाओगे. जो लोग तुम्हारी भक्ति और पूजा करेंगे, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।

तुम्हारे स्मरण मात्र से ही भक्तों का कल्याण होगा और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होगी।

राजस्थान के सीकर में है खाटू धाम

यूं तो पूरे देश में खाटू श्याम की पूजा होती है लेकिन असली खाटू धाम राजस्थान के सीकर जिले से 43 किलोमीटर दूर खाटू गांव में स्थित है।

यहां बाबा खाटू श्याम और श्रीकृष्ण का भव्य मंदिर है, जहां हमेशा भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

खाटू श्‍यामजी का मंदिर काफी प्राचीन है। मंदिर के शिखर पर सालभर सूरजगढ़ का निशान लहराता है।

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कहा जाता है साल 1679 में मुगल शासक औरंगजेब की सेना हिंदू मंदिरों को नष्‍ट करते हुए खाटू पहुंचकर बाबा श्‍याम के मंदिर को भी नुकसान पहुंचाया था।

तब मंदिर की रक्षा के लिए उस वक्‍त राजपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।

खाटू श्‍यामजी मंदिर के वर्तमान स्‍वरूप की नींव साल 1720 में रखी गई थी।

कहा जाता है बाबा श्याम, खाटू धाम में स्थित श्याम कुण्ड से प्रकट हुए थे।

खाटू श्याम के जन्मोत्सव पर लगता है मेला, कटता है केक

बाबा खाटू श्याम के जन्मोत्सव पर हर साल खाटू धाम में मेला लगता है, जिसमें लाखों भक्त पहुंचते हैं।

इस दिन बाबा के नाम का केक भी काटा जाता है और श्याम बाबा की जय, खाटू नरेश की जय, हारे के सहारे का जयकारा गूंजता है। इसके साथ ही भव्य आरती भी की जाती है।

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श्री कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया था कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में सक्षम है।

इसलिए कहा जाता है- ‘हारे का सहारा बाबा खाटू श्याम हमारा’

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