Sahastrabahu Jayanti: महिष्मती के 1 हजार हाथों वाले राजा सहस्रबाहु, रावण को भी बना लिया था बंदी

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Sahastrabahu Jayanti: 8 सितंबर को पूरे देश में सहस्रबाहु जयंती मनाई जा रही है। इनका पूरा नाम राज राजेश्वर सहस्रबाहु अर्जुन है।

सहस्रबाहु की जयंती हर साल कार्तिक शुक्ल सप्तमी को मनाई जाती है। जिसे कलचुरी कलार समाज बेहद धूमधाम से मनाता है।

सहस्रबाहु को लेकर ये मान्यता है उनके एक हजार हाथ थे और उन्होंने रावण को भी बंदी बना लिया था।

आइए जानते हैं कौन हैं राजा सहस्रबाहु और कैसे पड़ा उनका ये नाम…

महिष्मती नगरी के राजा

सहस्रबाहु का जन्म महाराज हैहय की 10वीं पीढ़ी में माता पद्मिनी के गर्भ से हुआ था। उनका जन्म नाम एकवीर था।

चन्द्रवंशी महाराजा कृतवीर्य के पुत्र होने के कारण उन्हें कार्तवीर्य-अर्जुन कहा जाता है।

धर्मग्रंथों के अनुसार सहस्रबाहु अर्जुन नर्मदा नदी के तट पर स्थित महिष्मती नगरी के राजा थे।

माना जाता है कि मध्य प्रदेश का महेश्वर शहर ही प्राचीन काल में महिष्मती था।

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बेहद अनोखी है जन्म कथा

कार्तवीर्य अर्जुन के पिता का नाम कार्तवीर्य था जो एक प्रतापी राजा थे। उनकी कई रानियां भी लेकिन किसी को कोई संतान नहीं थी।

राजा और उनकी रानियों ने पुत्र रत्न प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। तब उनकी एक रानी पद्मनी ने देवी अनुसूया से इसका उपाय पूछा।

तब देवी अनुसूया में उन्हें अधिक मास में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को उपवास रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने के लिए कहा।

विधि पूर्वक एकादशी का व्रत करने के कारण भगवान प्रसन्न हुए और वर मांगने के लिए कहा, तब राजा और रानी ने कहा कि प्रभु हमें ऐसा पुत्र दें जो सर्वगुण सम्पन्न और सभी लोकों में आदरणीय तथा किसी से पराजित न हो।

भगवान ने राजा से कहा कि ऐसा ही होगा और 9 माह बाद रानी ने राजा सहस्त्रबाहु को जन्म दिया।

भगवान शिव के भक्त

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक राजा सहस्त्रबाहु ने संकल्प लेकर भगवान शिव की कठिन तपस्या कीं थी। इस घोर तप के समय में वो प्रति दिन अपनी एक भुजा काटकर भगवान शिव जी को अर्पण करते थे।

इस तपस्या के फलस्वरूप भगवान शिव ने सहस्त्रबाहु को अनेको दिव्य चमत्कारिक और शक्तिशाली वरदान दिए थे।

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इस वजह से कहा जाता है सहस्रबाहु

सहस्रबाहु का मूल नाम अर्जुन था। एक हजार हाथों की वजह से उन्हें सहस्रबाहु अर्जुन कहा जाने लगा।

ऐसे मिले 1 हजार हाथ

कहा जाता है सहस्रबाहु अर्जुन ने अपनी भक्ति से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया और उनसे वरदान में एक हजार हाथ मांगे।

भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कार्त्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन कहा जाने लगा।

रावण और भगवान परशुराम से भी किया युद्ध

सहस्रबाहु अर्जुन ने अपने जीवन में यूं तो बहुतों से युद्ध लड़े, लेकिन उनमें दो लोगों से लड़े गए युद्ध की चर्चा बहुत होती है।

पहला लंकाधिपति रावण से और दूसरा भगवान परशुराम से।

महाभारत के अनुसार एक बार सहस्त्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ ऋषि जमदग्नि के आश्रम में ठहरे थे। उस समय ऋषि जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी।

कामधेनु सभी इच्छाएं पूरी करने वाली दिव्य गाय थी जिसकी मदद से ऋषि जमदग्नि ने सहस्त्रबाहु अर्जुन और उनकी सेना का भव्य स्वागत किया। कामधेनु का चमत्कार देखकर सहस्त्रबाहु अर्जुन उस गाय को बलपूर्वक अपने साथ ले गए।

जब ये बात ऋषि जमदग्नि के पुत्र परशुराम को मालूम हुई तो वो क्रोधित हो गए और सहस्त्रबाहु अर्जुन से युद्ध करने पहुंच गए।

परशुराम और सहस्त्रबाहु अर्जुन के बीच युद्ध हुआ, जिसमें परशुराम ने सहस्त्रबाहु को पराजित कर दिया।

इस बात का बाद बदला लेने के लिए सहस्त्रबाहु अर्जुन के पुत्रों ने ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया था।

इसके बाद पिता की हत्या से क्रोधित होकर परशुराम ने हैहयवंश का विनाश करने की प्रतिज्ञा ली और 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया था।

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रावण को युद्ध में हराकर बना लिया था बंदी

रावण को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। एक दिन अहंकारवश हजारों हथियारों के साथ वो सहस्त्रबाहु अर्जुन से युद्ध करने नर्मदा नदी के तट पर महिष्मती पहुंचा।

माना जाता है कि उस समय राजा सहस्रबाहु अर्जुन ने अपनी हजार भुजाओं से नर्मदा नदी का पानी रोक दिया और फिर अचानक पानी छोड़ दिया, जिससे रावण की सेना नर्मदा की धारा में बह गयी।

इसके बाद हजार बाहों वाले सहस्रबाहु अर्जुन और दस सिर वाले लंकापति रावण के बीच भयानक युद्ध हुआ।

इस युद्ध में रावण हार गया था और उसे बंदी बना लिया गया था। बाद में रावण के पितामाह महर्षि पुलत्स्य के आग्रह पर सहस्रबाहु ने उसे छोड़ दिया।

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सहस्त्राबाहु के वंशज है कलार

भगवान सहस्त्रबाहु के वंशज पुरातन या मध्यकालीन युग में कलचुरी इस देश के कई स्थानों के शासक रहे हैं। उन्होंने बड़ी ही बुद्धिमत्ता व वीरता से न्याय प्रिय ढंग से शासन किया।

कलार शब्द का शव्दिक अर्थ है मृत्यु का शत्रु या काल का भी काल अर्थात कलार वंशीयो को बाद में काल का काल की उपाधि दीं जाने लगी, जो शब्दिक रूप में बिगड़ते हुए काल से कल्लाल हुई और फिर कलाल और अब कलार हो गई।

संपूर्ण धरती के राजा थे सहस्त्रबाहु

चंद्रवंशी राजा सहस्त्राबाहु का धरती के संपूर्ण द्वीपों पर राज था। मत्स्य पुराण में भी इसका उल्लेख है।

उन्होंने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या करके 10 वरदान प्राप्त किए और चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि धारण की थी।

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