क्या डॉलर को रौंद पाएगी रूस-चीन की स्ट्रैटजी
दूसरे विश्वयुद्ध तक ज्यादातर देशों के पास जितना सोने का भंडार होता था, वो उतनी ही वैल्यू की करेंसी जारी करते थे। 1944 में दुनिया के 44 देशों के डेलिगेट्स मिले और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले सभी करेंसी का एक्सचेंज रेट तय किया, क्योंकि उस वक्त अमेरिका के पास सबसे ज्यादा सोने का भंडार था और वो दुनिया की सबसे बड़ी और स्थिर अर्थव्यवस्था था।
80 साल बाद यानी 2024 में दुनिया का 80% व्यापार और 58% पेमेंट डॉलर में होता है। साथ ही दुनिया का 64% लोन और 59% फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व डॉलर में है। अमेरिकी डॉलर के इसी दबदबे को कम करने की कोशिशें होती रहती हैं। 22 से 24 अक्टूबर 2024 तक रूस के कजान शहर में BRICS की 16वीं समिट हो रही है, जिसमें PM नरेंद्र मोदी भी पहुंचे। यहां डी-डॉलराइजेशन और न्यू पेमेंट सिस्टम अहम एजेंडा है।
भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे कि अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे मजबूत करेंसी कैसे बना, क्या फिलहाल डॉलर को रिप्लेस किया जा सकता है और इससे भारत, चीन, अमेरिका पर क्या असर होगा…
सवाल-1: अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे मजबूत करेंसी कैसे बना? जवाब: मान लीजिए भारत को पाकिस्तान की करेंसी पर भरोसा नहीं है। ऐसे में वो पाकिस्तानी करेंसी में व्यापार नहीं करेगा। ऐसी ही समस्या के लिए 1944 में तमाम देशों ने मिलकर डॉलर को बेस करेंसी बनाया था। यानी भारत पाकिस्तान से डॉलर में कारोबार कर सकता है, क्योंकि उसे पता है कि अमेरिकी डॉलर डूबेगा नहीं और जरूरत पड़ने पर अमेरिका डॉलर के बदले सोना दे देगा।
ये व्यवस्था करीब 3 दशक चली। डॉलर दुनिया की सबसे सुरक्षित करेंसी बन चुका था, लेकिन 1970 की शुरुआत में कई देशों ने डॉलर के बदले सोने की मांग शुरू कर दी। ये देश अमेरिका को डॉलर देते और उसके बदले में सोना लेते थे। इससे अमेरिका का सोने का भंडार खत्म होने लगा।

डॉलर की मजबूती की एक और बड़ी वजह थी। दरअसल, 1945 में अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने सऊदी के साथ एक करार किया। करार की शर्त ये थी कि उसकी सुरक्षा अमेरिका करेगा और बदले में सऊदी सिर्फ डॉलर में तेल बेचेगा। यानी अगर देशों को तेल खरीदना है, तो उनके पास डॉलर होना जरूरी है।
सवाल-2: डॉलर की पावर के दम पर अमेरिका बैठे-बिठाए कैसे अरबों कमाता है? जवाब: हम किसी चीज को खरीदने के लिए कई तरीकों से उसका दाम चुकाते हैं। जैसे- कैश, ऑनलाइन बैंकिंग, UPI ट्रांसफर। ऐसे ही दुनियाभर के देश आपस में व्यापार करने के लिए अमेरिका के SWIFT नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। इसके जरिए अमेरिका बैठे-बिठाए अरबों कमाता है।

1973 में 22 देशों के 518 बैंक के साथ SWIFT नेटवर्क शुरू हुआ था। फिलहाल इसमें 200 से ज्यादा देशों के 11,000 बैंक शामिल हैं। जो अमेरिकी बैंकों में अपना विदेशी मुद्रा भंडार रखते हैं। अब सारा पैसा तो व्यापार में लगा नहीं होता, इसलिए देश अपने एक्स्ट्रा पैसे को अमेरिकी बॉन्ड में लगा देते हैं, जिससे कुछ ब्याज मिलता रहे। सभी देशों को मिलाकर ये पैसा करीब 7.8 ट्रिलियन डॉलर है। यानी भारत की इकोनॉमी से भी दोगुना ज्यादा। इस पैसे का इस्तेमाल अमेरिका अपनी ग्रोथ में करता है।
सवाल-3: डॉलर को रिप्लेस करने के लिए चीन-रूस क्या कोशिशें कर रहे हैं? जवाब: रूस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल और गैस का उत्पादन करने वाला देश है। उसके सबसे बड़े खरीदार यूरोपीय देश हैं। अप्रैल 2022 में रूस ने नेचुरल गैस खरीदने वाले यूरोपीय यूनियन के देशों से कहा कि वो डॉलर या यूरो के बजाय बिल का भुगतान रूबल में करें।
यानी जो देश पहले रूस से गैस खरीदने के लिए अमेरिकी बैंक में डॉलर रिजर्व रखते थे, उन्हें रूसी सेंट्रल बैंक में रूबल रिजर्व रखना पड़ा। इसी तरह बाकी चीजों के निर्यात के लिए भी रूस ने अनफ्रेंडली देशों से रूबल में पेमेंट करने की मांग की।
इसकी वजह से रूस के गैस एक्सपोर्ट में गिरावट आई। यूरोपीय यूनियन 2021 तक करीब 40% गैस रूस से इम्पोर्ट करता था, जो 2023 में घटकर लगभग 8% हो गया।
जून 2022 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने BRICS देशों की करेंसी का एक नया इंटरनेशनल रिजर्व बनाने की बात कही थी। पुतिन के प्रपोजल पर BRICS देशों में शामिल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका विचार कर रहे हैं।
डॉलर को युआन से रिप्लेस करने के लिए चीन की कोशिशें SWIFT की ही तरह चीन के सेंट्रल बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने CIPS नाम का सिस्टम बनाया है। इस पेमेंट सिस्टम से करीब 117 देशों के 1551 बैंक जुड़ चुके हैं। पिछले साल इस सिस्टम के जरिए 123.06 ट्रिलियन युआन (चीन की करेंसी) से ज्यादा का ट्रांजैक्शन हुआ।
युआन रिजर्व को बढ़ावा देने के लिए चीन ने 40 से ज्यादा देशों के साथ करेंसी स्वैप एग्रीमेंट किया है। इस एग्रीमेंट के तहत 2 देशों को व्यापार करने के लिए हर बार SWIFT सिस्टम की जरूरत नहीं है। एक फिक्स अमाउंट का ट्रेड वो देश अपनी करेंसी में कर सकते हैं।
नवंबर 2023 में चीन ने सऊदी अरब के साथ एग्रीमेंट किया। इसमें तीन साल के लिए डॉलर की बजाय युआन का इस्तेमाल कर करेंसी स्वैप की जाएगी, जिसकी वैल्यू करीब 6.93 बिलियन डॉलर है। इससे डॉलर का दबदबा कम होगा।

सवाल-4: 2024 की BRICS समिट में इसे लेकर क्या हो रहा है, इसमें भारत का क्या रोल रहेगा? जवाब: 22 से 24 अक्टूबर तक रूस के कजान शहर में BRICS की 16वीं समिट चल रही है। यानी इस बार BRICS समिट की मेजबानी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कर रहे हैं। 19 अक्टूबर 2024 को पुतिन ने कहा- BRICS करेंसी में अभी समय लग सकता है। BRICS अभी नेशनल करेंसी के उपयोग को बढ़ाने और इसे सुरक्षित बनाने के लिए रिसर्च कर रहा है।
विदेशी मामलों के जानकार और जेएनयू में प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं,
इस समिट में BRICS करेंसी की बात नहीं हो रही है, बल्कि उसकी जगह डॉलर के महत्व को धीरे-धीरे कम करने पर बात की जा रही है। पुतिन ने भी ये कहा है कि BRICS एक सिस्टम की बात कर रहा है जो BRICS देशों के बीच होने वाले ट्रेड्स में इस्तेमाल किया जा सके। साथ ही इंटरनेशनल ट्रेड्स में डॉलर, यूरो जैसी वेस्टर्न करेंसी का इस्तेमाल न किया जाए।

1 अक्टूबर 2024 को एक थिंकटैंक प्रोग्राम में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत ने कभी डॉलर को निशाना नहीं बनाया है, क्योंकि यह देश की आर्थिक, राजनीति या रणनीतिक नीति का हिस्सा नहीं रहा है। भारत की ऐसी कभी कोई नीयत नहीं रही है। ये जरूर है कि भारत के कुछ पार्टनर्स को डॉलर में व्यापार करने में कठिनाई हो रही है।’
राजन कुमार बताते हैं, ‘भारत चाहता है कि डॉलर में होने वाले ट्रेड पेमेंट को कम किया जाए। इससे भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर कम होगा और जो डॉलर रिजर्व रहेगा उसका इस्तेमाल दूसरे कामों में किया जा सकेगा।’

सवाल-5: क्या डी-डॉलराइजेशन पॉसिबल है, अगर हां तो किस हद तक? जवाब: अमेरिकी अर्थशास्त्री साइमन हंट मानते हैं कि अगले 2 साल में BRICS की करेंसी या सिस्टम अमेरिकी डॉलर को टक्कर देगी। जानकार मानते हैं कि BRICS देश किसी एक करेंसी को लेकर सहमत नहीं होंगे। हालांकि, वो एक पेमेंट सिस्टम बना सकते हैं या अपनी-अपनी करेंसी में ट्रेड करने के लिए तैयार हो सकते हैं।
प्रो. राजन कुमार के मुताबिक फिलहाल पूरी तरह से डी-डॉलराइजेशन करना संभव नहीं है। वो कहते हैं,
अगर BRICS देशों में नेशनल करेंसी में ट्रेड होता भी है तो उसकी वैल्यू का आधार डॉलर को ही बनाया जाता है। यानी रूस और चीन के बीच ट्रेड होता है तो रूबल और युआन की वैल्यू डॉलर के आधार पर तय की जाती है। अगर BRICS देश पेमेंट का कोई सिस्टम बना भी लेते हैं तो उससे डॉलर के इस्तेमाल में कमी आएगी। न कि पूरी तरह से डी-डॉलराइजेशन हो जाएगा।

सवाल-6: क्या डी-डॉलराइजेशन से अमेरिका तबाह हो जाएगा? जवाब: मजबूत डॉलर और इकोनॉमी के दम पर अमेरिका दुनियाभर में अपना दबदबा कायम करता है। जब भी कोई देश उसे किसी भी तरह से चुनौती देता है, तो अमेरिका उस देश पर प्रतिबंध लगा देता है। ऐसा कर अमेरिका देशों के व्यापार से लेकर उनकी विदेश नीति तक को प्रभावित करता है।
डी-डॉलराइजेशन देशों के बीच पावर बैलेंस को बदल सकता है। साथ ही नए तरह से ग्लोबल इकोनॉमी और मार्केट को आकार देगा। इससे अमेरिका प्रभावित होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प ने डी-डॉलराइजेशन को अमेरिका के लिए बड़ा खतरा माना। उन्होंने हाल ही में एक चुनावी रैली में कहा था कि जो देश डॉलर का साथ छोड़ेंगे, उन पर 100% टैरिफ लगा दिया जाएगा।
राजन कुमार बताते हैं, ‘दुनियाभर में डॉलर में होने वाला ट्रेड BRICS देशों के ट्रेड से कई गुना ज्यादा है। ऐसे में अगर BRICS कोई करेंसी या सिस्टम लाता भी है तो उसके कारण डॉलर की वैल्यू पर ज्यादा असर नहीं होगा।’
जेपी मॉर्गन में स्ट्रैटजिक रिसर्चर एलेक्जेंडर वाइस कहते हैं, ‘डी-डॉलराइजेशन से अमेरिकी बाजारों में डिसइन्वेस्टमेंट और भरोसे में गिरावट हो सकती है, जिससे मुनाफा घटेगा। साथ ही इंटरनेशनल रिजर्व में डॉलर में कमी आएगी या दूसरी करेंसी में ज्यादा रिजर्व रखा जाएगा।
सवाल-7: क्या डी-डॉलराइजेशन से चीन का दबदबा बढ़ जाएगा? जवाब: प्रो. राजन कुमार कहते हैं, ‘केवल डी-डॉलराइजेशन होने से चीन का दबदबा नहीं बढ़ेगा। दरअसल BRICS देश ये चाहते हैं कि उनका इन्वेस्टमेंट और फॉरेन रिजर्व डॉलर के अलावा दूसरी करेंसी में भी हो, जिससे अमेरिका डॉलर का इस्तेमाल किसी इन्स्ट्रूमेंट की तरह न कर सके क्योंकि अभी इन देशों का ज्यादातर फॉरेन रिजर्व डॉलर में है और कोई भी देश ये नहीं चाहता कि अमेरिका उनका रिजर्व फ्रीज कर दे। साथ ही BRICS देश चीन की करेंसी को लेकर सहमत नहीं होंगे।’
राजन कुमार बताते हैं, ‘चीन का ज्यादातर फॉरेन रिजर्व डॉलर में ही है। ऐसे में वो ये नहीं चाहेगा कि डी-डॉलराइजेशन हो और डॉलर की वैल्यू घटे। इससे चीन की इकोनॉमी पर इम्पैक्ट होगा। इसलिए चीन भी डी-डॉलराइजेशन को धीरे-धीरे करने की कोशिश करेगा और युआन को इंटरनेशनल करेंसी के तौर पर पेश करेगा।’
जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स (SWP) के सीनियर फेलो हन्स गुंथर हिल्पर्ट कहते हैं,
वास्तव में चीन ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम के साथ नहीं जुड़ा हैं, क्योंकि इसमें ‘कई कमियां’ हैं। चीन में कई सरकारी कंपनियां हैं, जिन्हें भारी सब्सिडी दी जाती है। अगर कोई देश ‘ग्रेट इकोनॉमिक पावर’ बनना चाहता है, तो ये स्ट्रैटजी सही नहीं है।


सवाल-8: डी-डॉलराइजेशन से भारत को फायदा होगा या नुकसान? जवाब: डी-डॉलराइजेशन से भारत की अमेरिकी मॉनेटरी पॉलिसी और डॉलर पर निर्भरता कम होगी। साथ ही भारत के फॉरेन रिजर्व में दूसरी करेंसी का हिस्सा बढ़ेगा। इसके लिए भारत को धीरे-धीरे और सावधानी के साथ डी-डॉलराइजेशन का कदम लेना होगा।
राजन कुमार बताते हैं, ‘अगर भारत और रूस के बीच रूबल और रुपए में ट्रेड होता है तो भारत को फायदा होगा, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान हमने दिखा है कि भारत ने रुपए में रूस से क्रूड ऑयल खरीदा, लेकिन कुछ समय बाद रूस को घाटा होने लगा क्योंकि उसके पास बहुत ज्यादा रुपया इकट्ठा हो गया, जिसका वो कहीं इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था। दरअसल, रूस से भारत इम्पोर्ट ज्यादा करता है और एक्सपोर्ट कम।’
कुमार बताते हैं, ‘भारत ये नहीं चाहेगा कि BRICS देशों में चीन के युआन का महत्व बढ़े और उसे सभी देश स्वीकार करें क्योंकि भारत का चीन की करेंसी में विश्वास नहीं है।’
सवाल-9: ऐसा क्यों कहा जाता है कि डॉलर और यूरो का वेपनाइजेशन किया गया है? जवाब: रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अमेरिका ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए। उसने विदेशों में रखा रूस का 282 बिलियन डॉलर का रिजर्व फ्रीज कर दिया। रूसी बैंकों को SWIFT नेटवर्क से डिस्कनेक्ट कर दिया और अमेरिकी बैंकों के जरिए पेमेंट्स रोक दी।
प्रो. राजन कुमार कहते हैं, ‘अमेरिका ने रूस का रिजर्व फ्रीज कर इंटरनेशनल लॉ का उल्लंघन किया। साथ ही पश्चिमी देश भी रूस-यूक्रेन युद्ध में एक तरह से शामिल हैं। अमेरिका ने ऐसा कर डॉलर का इस्तेमाल एक वेपन यानी हथियार के तौर पर किया। ऐसे में कई देश अमेरिका और पश्चिमी देशों से घबराए हुए हैं और वो अपने रिजर्व और पॉलिसी में बदलाव ला रहे हैं।’
