*सुबह सुबह फूल तोड़ना..
*सुबह सुबह फूल तोड़ना..
*इसे कहते हे अदृश्य पाप”
( हम फुल तोड़कर चढ़ाना ही ईश्वर के पंच तत्त्व के नियम के विरुद्ध चल रहे है.)
“कुछ लोगो की मानसिकता और अवधारणाओं पर मुझे सच मे तरस आता है। ईश्वर के विपरीत चल कर भी उन्हें लगता है वो ईश्वर का काम कर रहे है।
मै देखता हूं कुछ लोग तडके चार बजे पूजा के फूल तोड़ने निकल पड़ते है। फूल न मिले तो कली ही तोड़ लेते है।
मान्यता यह रखते है कि जितने फूल मंदिर में चढ़ाएंगे उतने उन्हें धार्मिक लाभ होगा। रोज सुबह देखो तो सारे बगीचों से फूल गायब।
मेरे सिद्ध गुरु अक्सर कहा करते थे कि परम्परा से ज्यादा विवेक को महत्व दो। विवेक याने सही गलत को अपने मन के तराजू में तोलना।
विवेक यह है कि सुबह का ब्रह्म मुहूर्त प्रसव काल होता है। यानी प्रकृति अपनी पूरी एनर्जी लगा देती है।यही वह समय होता है जब ईश्वर अपने अस्तित्व का बोध प्रकृति में कलियों के खिलने के रूप में और बीजो को अंकुरित होने के रूप में दिखाता है।
मैं फुल तोड़ने को मना करता हूं तो लोग मुझे फला बुरा कहते है.
“में स्वयं रोज गिरे हुए फूल भगवान को चढ़ता हू.ये ही पंच तत्त्व को बचाने का नियम है.
इस प्रसव काल मे कलियों को फूलों को तोड़ने से बड़ा कोई महापाप नही है।यह वैसा है जैसे किसी माता का गर्भ समय से पहले गिरा देना। और मैंने देखा है कि ऐसे लोग अक्सर किसी मानसिक या शारीरिक रोग से पीड़ित रहते है। पीढित होंगे ही क्योकि उनके कृत्य प्रकृति के पिपरित है।
मेरा निवेदन है कि जिन लोगो को यह लेख समझ मे आये तो शेयर करे।
न समझ आये तो मुझे गालियां दे और अपने पाप बढ़ाए और मेरे पाप नष्ट करने में सहायक बने.
अगर 10 लोग भी यह करना छोड़ देंगे तो मेरा लेख लिखना सफल मानूंगा और पर्यावरण को बचाने में सहायक होंगे.
बाकी ईश्वर इच्छा।
**
