“वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ..।”
वस्तु, पदार्थ और अभिरुचियाँ हर क्षण बदलती रहती हैं, किन्तु शास्त्र विचार शाश्वत है। धर्म, संस्कृति और सनातन परम्पराएँ सद्विचारों के कारण ही जीवन्त हैं। ज्ञान-विज्ञान को नई पीढ़ी में स्थानांतरण का स्त्रोत भी सद्ग्रन्थों में संग्रहित विचार ही है। अतः वैचारिक पूँजी को सहेज कर रखें ..! हमारे विचारों से हमारे संस्कार और व्यवहार का भी पता चलता है। प्रयास यह करें कि विचारों और व्यवहार में पवित्रता और प्रेम का समावेश रहे। इससे ही हमारा व्यक्तित्व निखरता है। आत्म-संतुष्टि एवं प्रसन्नता का आधार है – वैचारिक सम्पन्नता एवं आत्म-अवबोध; समृद्धि का स्रोत पवित्र विचार और शुभ संकल्प हैं | सत्-उपसर्ग की ही यदि बात करें तो विचार शब्द के आगे सद् लगने से सद्विचार, आचरण के आगे सद् लगने से सदाचारण, व्यवहार के आगे सद् लगने से सद्व्यवहार, आहार के आगे सद् लगने से सद्आहार और मनुष्य के मन में यदि सद्गुरु की कृपा से यह सत् समा जाए तो मनुष्य सज्जन कहलाता है, सौम्य बन जाता है। फिर मानव के जीवन की दिशा सुदिशा हो जाती है। और, सुदिशा पर चलने से जीवन की दशा बदल जाती है …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – योगविद्या मन और आत्मा के स्वभाव का एकीकरण करने की विद्या है। दोनों का स्वभाव एक हो जाने से मन, वचन और काया से एक ही प्रकार के परम सात्विक कार्य होने लगते हैं। उन दोनों के परस्पर विरोधी होने के कारण जो संघर्ष चलते थे, उन सबकी समाप्ति हो जाती है, अन्तर्द्वन्द्व, भीतर संघर्ष, पर-स्वर विरोधी विचार नष्ट हो जाने से मनुष्य अपने अन्तस्तल में बहुत हलका, शान्त, स्वस्थ, संतुष्ट एवं प्रसन्नता का अनुभव करता है। इस स्थिति को प्राप्त करने के पश्चात ही साँसारिक सम्पदाओं के भोग का आनन्द आता है। मन पर नियंत्रण हो, इन्द्रियाँ संयम में हों, दृष्टिकोण निर्भ्रान्त हो तो ही मनुष्य प्राप्त वस्तुओं से सुख लाभ कर सकता है। पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा कि किसी भी समाज या राष्ट्र की चिन्तनशैली से वैचारिक स्तर से वहाँ की सभ्यता, रहन, सहन, आचार-व्यवहार और जीवनक्रम की भविष्यत् की सम्भावनाओं की बारीकियाँ जानी जा सकती हैं। वैदिक युग कभी सतयुग था तो एक ही कारण था कि उस युग की चिन्तन-पद्धति तथा वैचारिक स्तर उत्कृष्ट था। यदि आज वह नहीं है तो निश्चित ही कहीं न कहीं विचारों के स्तर में गिरावट आई हैं, यह मानना चाहिए। भौतिक विश्व के आगे क्या है, यह अध्यात्म बताता है। अध्यात्म प्राण, मन, बुद्धि और अहंकार से उपजी समस्याओं के समाधान की बात करता है। उपनिषदों में ज्ञान और अध्यात्म का भण्डार है। अध्यात्म से आधुनिक समय की सारी चुनौतियों के समाधान ढूँढे जा सकते हैं। स्मरण रखिए ! संसार में अनेक लाभ हैं पर जीवन का सर्वोपरि लाभ ‘अध्यात्म’ है। उसका महत्व संसार की महानतम वस्तुओं से ऊँचा है, उसका लाभ सृष्टि के समस्त लाभों से अधिक है। इसलिए उस मार्ग में प्रवेश करने के लिए हम सब को प्रयत्नशील होना चाहिये …।