०प्रतिदिन विचार (11/03/2024)कश्मीर अब खुलकर सांस-राकेश दुबे

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और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के साढ़े चार साल बाद प्रधानमंत्री मोदी पहली बार अब कश्मीर घाटी में गए, तो फिजाएं बदली हुई थीं। प्रधानमंत्री जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों में जाते रहे हैं, लेकिन घाटी में पहुंचना उनके लिए भी चुनौती थी। बहरहाल अब ‘जन्नत’ का नैसर्गिक रूप खिल रहा है। कश्मीर घाटी मन और सोच से भाजपा-विरोधी रही है, लेकिन अब ‘हम हिंदुस्तानी हैं’, ‘भारत माता की जय’ के नारे बुलंद थे। असंख्य लोगों को एक स्वर में उद्घोष करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अक्सर राजनीतिक जनसभाएं प्रायोजित होती हैं, भीड़ को लाया जाता है, लेकिन टीवी चैनलों पर आम कश्मीरी के बोल सुने, तो एकबारगी लगा कि कश्मीर अब खुलकर सांस लेने लगा है।
सरकारी सूचना तंत्र का दावा है कि आतंकवाद की घटनाओं में 73 प्रतिशत की कमी आई है। नागरिकों की मौतें 81 प्रतिशत तक कम हुई हैं। अलगाववाद का खात्मा इसी से साफ है कि अब घाटी में दुकान, बाजार, फैक्टरी, स्कूल-कॉलेज आदि को बंद कराने वाली आवाजें खामोश हैं। पत्थरबाजी की घटनाएं ‘शून्य’ हैं। शारदा मंदिर में इस बार उत्सव हो रहे हैं।सिनेमा हॉल खुल चुके हैं। दलितों, स्थानीय समुदायों को आरक्षण मिला है और महिलाओं के संवैधानिक अधिकार बहाल किए जा चुके हैं। कश्मीरी महिलाएं अपना जीवन-साथी ‘गैर कश्मीरी’ को भी चुन सकती हैं। औरतों को संपत्ति खरीदने की आजादी है। अब उनकी पैतृक संपत्ति में भी हिस्सेदारी तय है।
अब जब कश्मीर में जी-20 की बैठकें हुईं, तो विदेशी प्रतिनिधियों ने नए कश्मीर को देखा और आनंद लिया। बीते साल 2 करोड़ से अधिक पर्यटक कश्मीर की हसीन, खूबसूरत वादियों का सुख लेने आए, तो सरकार ने 30 सालों के लिए पीपीपी मॉडल पर अपनी 11 संपत्तियों को आउटसोर्स करने की योजना बनाई। होमस्टे पर खास जोर दिया जा रहा है, चूंकि लोगों की आवाजाही खुली और बढ़ी है, तो डल झील का नूरानी सौंदर्य भी लौट आया है। कश्मीरी पश्मीना शॉल, साडिय़ों और सलवार-कमीज जैसे वस्त्रों का निर्यात बहाल हुआ है। कश्मीरी कहवा और केसर के निर्याती बाजार भी खुल चुके हैं।
ऐसा यदि हैतो अर्थव्यवस्था फलने-फूलने लगी होगी। कश्मीर घाटी अब देश की मुख्यधारा से जुड़ कर अनुच्छेद 370 का इतिहास और अतीत भूलने की कोशिश में है। किसी पारिवारिक सियासत का हिस्सा 370 अब भी होगा, लेकिन आम कश्मीरी का कोई विरोध नहीं है। उसे सिर्फ विकास और रोजगार की दरकार है। वह इससे खुश और देश से जुड़ा महसूस करता है कि 53 विकास योजनाओं का लोकार्पण प्रधानमंत्री ने घाटी में किया। गांव-गांव तक 10 फुट की सडक़ें बन रही हैं। करीब 25,000 खिलाडिय़ों ने खेल मुकाबलों में हिस्सा लिया। कई खिलाड़ी तो राष्ट्रीय टीमों के सदस्य हैं। करीब 15 लाख परिवारों को ‘पानी’ मुहैया कराया गया।
सबसे अहम यह है कि राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ फिजाओं में लहरा रहा है और भारत का संविधान, संसद द्वारा पारित किए गए कानून अब जम्मू-कश्मीर में भी प्रभावी और प्रासंगिक हैं। कश्मीर में दो एम्स खुल चुके हैं, जाहिर है कि स्वास्थ्य भी सरकार के लिए अहम सरोकार है। ये तमाम उपलब्धियां और बदलाव एक ही दौर की देन नहीं हैं और न ही किसी व्यक्ति-विशेष से जुड़ी हैं। यह बीते 10 साल के दावे है, जो कश्मीर में अब मूर्त रूप लेता दिख रहा है। बेशक इनकी सूत्रधार भारत सरकार रही है और सर्वोच्च अदालत ने भी दखल देकर 370 की पेचीदगियों को खोला है। हालांकि आतंकवाद अब चंद इलाकों में सिमटा है।

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