ज्योतिरादित्य की जगह सुरेश पचौरी या नरोत्तम मिश्रा

ज्योतिरादित्य की जगह सुरेश पचौरी या नरोत्तम..!
(सवाल दर सवाल) (राकेश अग्निहोत्री)
ज्योतिरादित्य की जगह सुरेश पचौरी या नरोत्तम मिश्रा..!
यह सवाल इसलिए क्यों कि ज्योतिरादित्य के लोकसभा चुनाव जीतने के साथ ही राज्यसभा की सीट खाली हो जाएगी.. करीब 3 साल के बचे इस अधूरे कार्यकाल के लिए अभी तक पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का दावा सबसे मजबूत माना जा रहा था.. जो लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे और जिन्हे पार्टी ने मध्य प्रदेश में ऑपरेशन कांग्रेस खासतौर से भाजपा में आयातित नेताओं की स्क्रीनिंग कमेटी का प्रमुख बनाया हुआ है.. मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष संगठन महामंत्री के रहते घोषित तौर पर भाजपा में नई जॉइनिंग से जोड़कर पंडित नरोत्तम को नई है जिम्मेदारी सौंप गई है.. यानी नेतृत्व का पूरा भरोसा लेकिन मुख्य धारा की पॉलिटिक्स के लिए एडजस्टमेंट के साथ उन्हें फिट कर भविष्य के लिए हिट साबित नहीं किया जा रहा.. भाजपा हिंदू राज्यसभा का चुनाव हो टिकट वितरण हो या पार्टी की जमावट और विरोधियों को कमजोर करने के लिए पिछड़ा दलित आदिवासी और महिला वर्ग को को अपनी प्राथमिकता में बनाए हुए हैं ..हाल ही में ऑपरेशन लोटस यानी कमलनाथ सफल नहीं होने या यूं कहे फेल हो जाने के बाद प्लान B के तौर पर सुरेश पचौरी की धमाकेदार एंट्री भाजपा में सुनिश्चित कराई गई.. जिसमें जरूर ब्राह्मणों का बोल वाला नजर आया.. लोकसभा चुनाव के ठीक पहले भाजपा के इस सियासी धमाके की गूंज अगले कुछ दिनों तक फिर सुनाई देगी.. कांग्रेस के निराश, हताश, व्यक्तिगत राग द्वेष से पीड़ित ही नहीं उपेक्षित या अनु उपयोगी और जांच एजेंसियों से खौफ खाने वाले नेताओं के लिए मानो भाजपा के दरवाजे खोल दिए गए हैं.. कांग्रेस की इंटरनल पॉलिटिक्स में दिग्विजय सिंह के घोर विरोधी माने जाने वाले सुरेश पचौरी कभी ज्योतिरादित्य
और उनके पिता स्वर्गीय माधवराव के साथ खड़े नजर आते रहे.. अब कांग्रेस में मची इस उठा फटक का फायदा गुना से चुनाव लड़ने जा रहे ज्योतिरादित्य को ग्वालियर चंबल क्षेत्र में मिल सकता है.. जहां कांग्रेस के निशाने पर भाजपा से ज्यादा महाराज बने हुए हैं.. कांग्रेस से हिसाब किताब बराबर करने में जुटे सिंधिया के लिए भी यह संदेश राहत दे सकता है.. कुछ बयानों को छोड़ दिया जाए तो राहुल और सिंधिया के बीच आरोप प्रत्यारोप से ज्यादा दिग्विजय सिंह और उससे पहले कमलनाथ विशेष रूचि लेते रहे.. सुरेश पचौरी के व्यक्तिगत प्रभाव वाली भोपाल सीट से लोकसभा चुनाव लड़ हार चुके दिग्विजय सिंह भी गुना से अपने महाराज के खिलाफ चुनाव लड़ने में दिलचस्पी जता चुके थे.. कमलनाथ अपने लंबे सियासी जीवन के इस मोड पर कुछ ज्यादा ही विवादों में और भरोसे का संकट उनके जीवन भर की कमाई पर सवाल खड़ा कर चुका है.. कमलनाथ ने तो लोकसभा चुनाव लड़ने से इनकार भी कर दिया है.. ऐसे में भाजपा के अंदर सिंधिया और पचौरी की यह जोड़ी भोपाल, होशंगाबाद ग्वालियर चंबल खासतौर से गुना शिवपुरी सीट पर अहम भूमिका निभा सकती है.. जहां सिंधिया के लिए टिकट काट जाने के बाद केपी यादव और दूसरे जातीय समीकरण पहले ही बड़ी समस्या बने हुए हैं.. तो सवाल क्या सिंधिया चुनाव जीतने के बाद अपने वीटो पावर का उपयोग करते हुए हाई कमान से पचौरी को एक बार फिर भाजपा से राज्यसभा में पहुंचने में दिलचस्पी लेंगे.. क्या बिना शर्त भाजपा में राम के सहारे शामिल होने वाले सुरेश पचौरी के इस दावे पर यकीन किया जा सकता है.. या कोई पटकथा मध्य प्रदेश में कांग्रेस को अलग-अलग साबित करने के लिए लिखी जा चुकी है.. या फिर यह कांग्रेस के लिए नई पीढ़ी तैयार करने का एक मौका है जब पुरानी पीढ़ी के नेताओं की अहमियत खत्म होती जा रही है.. दिग्विजय सिंह और उनके भाई लक्ष्मण सिंह ने पचौरी को जिस तरह से समझाइए से ज्यादा निशाने पर लिया उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता..भाजपा के ऑपरेशन लोटस के इस नए प्लान : B पचौरी के मार्फत कांग्रेस को पंचर कराने में शिवराज सिंह चौहान, विष्णु दत्त शर्मा के साथ नरोत्तम मिश्रा ही नहीं ज्योतिरादित्य की भूमिका भी परदे के पीछे होने से इनकार नहीं किया जा सकता.. सुरेश पचौरी ने लंबे सियासी सफर में भले ही राज्यसभा की राजनीति की लेकिन एक समय था.. जब युवक कांग्रेस से लेकर सेवा दल के विभिन्न पदों पर रहते हुए युवाओं के बीच उनकी खासी पकड़ थी.. फिर भी सुरेश पचौरी का यह निर्णय समझ से परे उन्होंने किसी दबाव अपनी उपेक्षा या किसी प्रलोभन और नई उम्मीद के साथ लिया यह तो समय ही बताएगा.. भाजपा के लिए कांग्रेस से आयातित नेता कितने उपयोगी यह कहना कठिन लेकिन कांग्रेस का मनोबल गिराने और उसका आंतरिक गणित गड़बड़ा कर कलह मचाने के साथ माहौल राहुल गांधी के खिलाफ बनाने के लिए काफी है.. पश्चिम बंगाल में ममता ने एक अलग राय पकड़ ली है तो हिमाचल का संकट अभी खत्म नहीं हुआ, महाराष्ट्र में उद्योग की शिवसेना भी तालमेल तोड़कर उम्मीदवार का ऐलान करने लगी है..उधर राहुल गांधी के यात्रा समापन के लिए महाराष्ट्र पहुंचने से पहले राज्यसभा में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान को पहुंचा कर दूसरे राज्यों में भी भाजपा नेतृत्व कांग्रेस के बागियों को बड़ा संदेश पहले ही दे चुकी है.. ऐसे में भाजपा नेतृत्व को सुरेश पचौरी से अभी भी और जिलों में ऑपरेशन की उम्मीद जरूर होगी.. भोपाल के साथ होशंगाबाद लोकसभा सीट पर पचोरी उपयोगी साबित हो सकते हैं.. भाजपा की इंटरनल पॉलिटिक्स में शिवराज सिंह चौहान की जगह डॉक्टर मोहन यादव की मुख्यमंत्री के तौर पर ताजपोशी के बाद.. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा का कार्यकाल पूरा होने का इंतजार पार्टी के दूसरे नेताओं को भी है.. मिशन 2023 में अध्यक्ष रहते विष्णु दत्त की बड़ी भूमिका को ध्यान में रखते हुए खजुराहो से उनकी दूसरी जीत मोदी सरकार पार्ट 3 में उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा बना सकती है.. ऐसे में यदि आदिवासी, दलित और पिछड़े के साथ महिला नेतृत्व पर लोकसभा चुनाव के बाद फोकस हट गया .. जोर नहीं डाला गया और प्राथमिकता बदली तो पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की बड़ी भूमिका के लिए दरवाजे खुल सकते हैं.. विष्णु दत्त शर्मा यदि केंद्र में मंत्री तो उनके उत्तराधिकारी के तौर पर दूसरा ब्राह्मण चेहरा नरोत्तम मिश्रा पार्टी की कमान संभालने वाले के दावेदारों में सामने आ सकता हैं.. जिसे हारने के बावजूद अब ज्यादा इग्नोर नहीं किया जा सकता.. देखना दिलचस्प होगा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जो राज्यों की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रहे.. आखिर उनका वीटो नरोत्तम को मजबूरी नहीं जरूरी साबित कर भाजपा के उत्तम के साथ उपयोगी कैसे साबित करता हैं.. ऐसे में नरोत्तम यदि पार्टी की कमान संभालेंगे तो फिर सवाल सुरेश पचौरी क्या सिंधिया के राज्यसभा के बचे कार्यकाल के लिए उनका उत्तराधिकारी बनने का रास्ता साफ होगा.. या फिर ये संभावनाएं बहुत दूर की कौड़ी साबित होंगी.. सिंधिया के बाद बड़ा ऑपरेशन कांग्रेस के नाथ का मजाक बन जाने के बाद मध्य प्रदेश की पॉलिटिक्स में अभी पचौरी समर्थकों की और एंट्री से इनकार नहीं किया जा सकता.. जिनके पास कांग्रेस में अपने समर्थकों को तलाशने और भाजपा में अपनी पूछ परख बढ़ाने का मौका है.. यह सब उसे वक्त हुआ जब ऑपरेशन कांग्रेस के नाथ पर सस्पेंस एक बार फिर गहराता जा रहा है.. खासतौर से जब भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन पर राहुल गांधी से मेल मुलाकात फिक्स करने वाले विधायकों में छिंदवाड़ा जिले के विधायकों के साथ खुद कमलनाथ नदारत नजर आए थे.. तो चर्चा फिर जोर पकड़ रही है कि मध्य प्रदेश में भाजपा का पुराना भागीरथ मॉडल रंग ला सकता है.. कांग्रेस को भी डर सता रहा होगा की जिन्हें पार्टी लोकसभा का उम्मीदवार बनाए कहीं वो भाजपा में जाकर शामिल न हो जाए.. जिन आधा दर्जन सीटों पर कांग्रेस अपनी जीत की संभावना तलाश रही है.. उनमें से एक धार सीट के पूर्व सांसद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी और इंदौर कांग्रेस की पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा बलशाली चेहरा पूर्व विधायक संजय शुक्ला जो कैलाश विजयवर्गीय से पिछला चुनाव हार गए वो भाजपा में शामिल हो चुके हैं.. कमलनाथ द्वारा पार्टी हाई कमान से सुलह और चतुराई से मीडिया के मार्फत सफाई देने के बाद जो खबरें अंदरखाने से आ रही थी उसमें कांग्रेस के नाथ के साथ एक दर्जन से ज्यादा विधायक और 40 से ज्यादा पूर्व बड़े नेता भाजपा का दामन थामने का दावा उस वक्त किया गया था.. उस सूची में सुरेश पचौरी और संजय शुक्ला के शामिल होने की चर्चा भी रही.. सवाल भाजपा हाई कमान आखिर सुरेश पचौरी और उनके समर्थकों को पार्टी में शामिल कर किसे और क्या संदेश देना चाहता है.. पर इसमें एक बड़ा संदेश जरूर कांग्रेस के दूसरे नेताओं के लिए छुपा है.. सिंधिया के बाद यदि पचौरी को राज्यसभा या कोई और बड़ी दूसरी जिम्मेदारी सौंप उन्हें उपकृत किया जाता है.. तो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अंदर भगदड़ वह भी बूथ स्तर तक रोकना जीतू पटवारी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.. सुरेश पचौरी को 10 जनपथ इंदिरा राजीव सोनिया का बहुत करीबी तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं में सबसे बड़ा नाम माना जाता रहा.. कांग्रेस के निर्वाचित विधायकों में भले ही पचौरी के समर्थकों की संख्या सीमित रही लेकिन मैदानी क्षेत्र में कांग्रेस के अंदर उनसे सहानुभूति रखने वाले नेता और कार्यकर्ता जरूर दूर दराज क्षेत्र में मिल जाएंगे .. पचौरी ने राहुल गांधी की जातीय जनगणना की लाइन पर सवाल खड़ा कर सवर्ण खासतौर से ब्राह्मण मतदाताओं के लिए एक बड़ा संदेश दिया है.. भोपाल सीट से लोकसभा चुनाव उमा भारती से हारने वाले सुरेश पचौरी को जिले और क्षेत्र की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ सरकार के आने के बाद किनारे लगा दिया था.. भाजपा में अपनी मौजूदगी को तर्क संगत साबित करने के लिए शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य के नाते राम मंदिर पर कांग्रेस के आमंत्रण ठुकराने को घातक बताते हुए संघ और भाजपा की लाइन को ही आगे बढ़ाया है.. फिर भी सवाल खड़ा होना लाजमी है राहुल गांधी की पहले भारत जोड़ो यात्रा जब मध्य प्रदेश से गुजरी थी.. तब सुरेश पचौरी सिर्फ राहुल ही नहीं बल्कि प्रियंका के बहुत नजदीक खड़े नजर आए थे.. अब राहुल गांधी की न्याय यात्रा में जब पार्टी की कमान जीतू पटवारी के पास आ चुकी थी.. तब सुरेश पचौरी ही नहीं बल्कि पूर्व अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी अलग-अलग देखे गए.. बड़ा सवाल क्या कांग्रेस के अंदर मध्य प्रदेश में अभी और बवाल मचना तय है.. हाई कमान इसको कितनी गंभीरता से लेता है.. क्या इस बगावत से कांग्रेस के अंदर नए नेतृत्व और नई जमत की संभावना सामने आएगी.. या लोकसभा चुनाव के पहले नेता कार्यकर्ता का पार्टी से मोह भंग होना कहीं ताबूत की अंतिम कील तो साबित नहीं होगी..faillon
