नवरात्रि का पहला दिन-कामाख्या से ग्राउंड रिपोर्ट

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आज नवरात्रि का पहला दिन है। हर दिन मां और दशहरा से जुड़ीं अलग-अलग जगहों से ग्राउंड रिपोर्ट लाएंगे। पहली कहानी गुवाहाटी के कामाख्या पीठ से…

गुवाहाटी से करीब 10 किमी दूर नीलांचल पहाड़ी पर बना मां कामाख्या का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। देवी मां 64 योगिनियों और दस महाविद्याओं के साथ यहां विराजित हैं। ये दुनिया की इकलौती शक्तिपीठ है, जहां दसों महाविद्या- भुवनेश्वरी, बगला, छिन्नमस्तिका, काली, तारा, मातंगी, कमला, सरस्वती, धूमावती और भैरवी एक ही स्थान पर विराजमान हैं।

यहां एक कुंड है, जो हमेशा ही फूलों से ढंका रहता है। इसे मां की योनि माना गया है जिसकी पूजा होती है। मंदिर नाव के आकार में बना है और तीन खंडों में बंटा हुआ है।

यहां के मुख्य मंदिर में कामेश्वरी और कामेश्वर को माथा टेकने के बाद 10 कदम की दूरी पर नीचे की ओर एक अंधेरी गुफा है। जहां टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से होकर जाना होता है।

यह वही जगह है जहां मां की योनि की पूजा होती है।
यह वही जगह है जहां मां की योनि की पूजा होती है।

यहां एक चौकोर-सी छोटी जगह कपड़ों से ढंकी है। जिसके चारों तरफ जल है। यही वो योनि स्थल है, जिसे हमेशा कपड़ों से ढंककर रखा जाता है। यह इतना गहरा है कि घुटनों के बल झुककर इसे छूना पड़ता है।

मंदिर के ऊपर कबूतर दिखाई दे रहे हैं। उनके ऊपर सिंदूर लगा हुआ है। कबूतर वाले से पूछा तो बताने लगे कि शरीर से रोग दूर करने और मनोकामना पूरी करने के लिए सिंदूर लगाकर कबूतर को उड़ाया जाता है। यहां एक कबूतर करीब 500 रुपए में मिलता है।

नवरात्रि में इस मंदिर में भीड़ लगती है। देशभर से लोग यहां मां के दर्शन के लिए आते हैं। पूजा के तरीके में कोई खास बदलाव नहीं होता। मां कामाख्या की पूजा सामान्य दिनों की तरह ही होती है। सुबह साढ़े 5 बजे देवी के पीठ स्थान को स्नान कराया जाता है। फिर नए कपड़े पहनाए जाते हैं। फूल चढ़ाकर श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद शुरू होती है रोज की पूजा और आरती।

दोपहर 1 बजे से डेढ़ घंटे के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसी वक्त मां को भोग लगाया जाता है। ढाई बजे से सूर्यास्त तक मंदिर खुला रहता है। शाम को साढ़े 7 बजे माता की आरती होती है। यहां मनोकामना पूरी होने के बाद कन्‍या भोजन कराने की प्रथा है। इस वजह से भी भक्त देशभर से नवरात्रि के मौके पर आते हैं।

नागा साधु कपड़ों में होते हैं, क्योंकि मां के सामने नंगे नहीं रह सकते यहां मंदिर का अपना कोई ऑफिस नहीं है। जूना और किन्नर अखाड़ा ही मंदिर का प्रशासन संभालता है। जूना अखाड़े में देशभर से नागा साधु आए हैं। काफी चहल-पहल है। चिलम फूंकी जा रही है।

जटाधारी भभूत लगाए धूनी रमा रहे हैं। महिला नागा साधु भी साधना कर रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये नागा साधु पूरे कपड़ों में हैं। इनका कहना है कि कामाख्या उनकी मां हैं और मां के सामने वे बिना कपड़ों के नहीं रह सकते।

मां के रजस्वला होने पर लगता है अंबुबाची मेला, तीन दिन बंद रहता मंदिर कामाख्या शक्तिपीठ में हर साल जून के महीने में अंबुबाची मेला लगता है। इस मेले के दौरान तीन दिनों के लिए मंदिर को बंद कर दिया जाता है। दरअसल यह मेला, देवी कामाख्या के वार्षिक मासिक धर्म चक्र का उत्सव है। इस मौके पर भी देशभर से भक्त आते हैं।

मंदिर के गर्भगृह के आसपास सफेद रंग का कपड़ा बिछाया जाता है। तीन दिन बाद यह कपड़ा लाल रंग में गीला हो जाता है। इस कपड़े को अम्बुवाची वस्‍त्र कहते हैं। इसे ही प्रसाद के रूप में भक्‍तों को दिया जाता है, जिसे लेने के लिए भक्तों के बीच छीना-झपटी और मारामारी होती है।

इस मेले में देश भर से भक्त ही नहीं, तंत्र साधना करने वाले लोग भी आते हैं। रजस्वला समाप्ति पर मां कामाख्या की विशेष पूजा होती है। चौथे दिन ब्रह्म मुहूर्त में मां को नहलाकर श्रृंगार किया जाता है। उसके बाद ही मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है।

कामाख्या मंदिर तंत्र विद्या के लिए मशहूर है। यहां साधु-अघोरी हमेशा मौजूद रहते हैं।
कामाख्या मंदिर तंत्र विद्या के लिए मशहूर है। यहां साधु-अघोरी हमेशा मौजूद रहते हैं।

कोई नरमुंड लिए जाप कर रहा है, तो कोई तंत्र साधना में मगन मंदिर में दर्शन करने के बाद मैं रात के करीब 12 बजे गुवाहाटी से उत्तर की ओर 11 किमी दूर कामाख्या शक्तिपीठ की तलहटी से होती हुई भूतनाथ श्मशान पहुंचती हूं। चारों तरफ सुलगती चिताएं।

आग की लपटें और उठते धुएं से जलती आंखें… राख का काला-सफेद रंग कपड़ों पर निशान छोड़ रहा और तपिश इतनी कि खाल में खोट पड़ जाए। इन सब के बीच तांत्रिक समाधियों में बैठे हैं। कोई चिता के पास नरमुंड लिए जाप कर रहा है, तो कोई तंत्र साधना में मगन है।

श्मशान के अंदर मैं नंगे पांव एंटर करती हूं। चारों ओर चिताएं हैं या उनसे निकली राख पसरी है। पैर रखने में सिहरन सी हो रही। न जाने कितनी ही चिताओं की राख पर पांव रखते हुए श्मशान में घूम रही हूं। हर कदम कुछ डरा दे रहा।

एक चिता के सामने बैठे लाल बाबा तंत्र साध रहे हैं। उनके और चिता के बीच थाली में सिंदूर से रंगा नरमुंड धरा है और बाबा के हाथ में बड़ी सी इंसानी हड्डी। मैं बाबा के पास पहुंची ही थी कि उन्होंने मंत्र पढ़ते हुए सिंदूर से रंगी हड्डी मेरे सिर पर रख दी। अब न उठते बन रहा था, न बैठते। उठते हुए डर लगा कि कहीं बाबा नाराज न हो जाएं। लिहाजा बैठे रहने में ही सलामती समझी।

बाबा ने नाम पूछा और मंत्र बोलते हुए आग में कुछ डाल दिया। मेरे माथे पर चिता की भभूत मलकर कहा- जा बाबा को याद रखेगी। कुछ समझ नहीं आ रहा कि यहां क्या हो रहा है, लेकिन यहां की दुनिया­­­­­­­ देखने के लिए डर ही मोल है।

यह मंदिर तंत्र विद्या के लिए मशहूर है इसलिए दूर-दूर से साधु संत भी यहां दर्शन के लिए आते हैं।
यह मंदिर तंत्र विद्या के लिए मशहूर है इसलिए दूर-दूर से साधु संत भी यहां दर्शन के लिए आते हैं।

­­­­चारों ओर तंत्र साधक बैठे हैं। साधना कर रहे। सबके अपने तरीके हैं। कोई जोर-जोर से मंत्र पढ़ रहा, तो कोई चिता पर धूनी रमाए हुए है। थोड़ी दूर पर दो तांत्रिक एक चिता पर मंत्र जाप कर रहे। उनमें से एक उठता है और चिता की सुलगती राख के सामने सीटी मारकर किसी को बुलाने जैसा इशारा करता है। फिर चिता के चारों ओर चक्कर लगाने लगता है।

मेरे पास खड़े शख्स ने बताया कि तांत्रिक चिता से कुछ शक्तियां पुकार रहा है। उनके हाव-भाव से लग रहा मानो कोई अकेले में बात कर रहा हो।

आगे बढ़ी तो कानों में ढोलक की थाप गूंजने लगी। ढोलक, चिमटे और तुनकी के संगीत पर लोग मदमस्त होकर नाच रहे और गा रहे हैं। सबके चेहरे खिले हुए हैं। मैं सोच में पड़ गई… श्मशान में किसी की मौत का ऐसा उत्सव कैसे मनाया जा सकता है?

रात और बीती, करीब दो-ढाई बजे होंगे… जगह-जगह दुकानें सजी हैं। कहीं चाय बन रही, तो कहीं पकवान। महादेव के भजनों पर लोग नाच रहे हैं। यहां टहलते-मुस्कुराते चेहरे और बेफिक्र मस्ती देख कोई नहीं कह सकता कि ये सब चिताओं के सामने हो रहा है। चिताओं से उठ रहे अंगारे तांत्रिकों पर गिर रहे हैं, मानो चिता की राख ही इनका जीवनदान हो।

यह जगह तंत्र साधना के लिए महत्‍वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि अगर किसी पर काला जादू हो, तो मंदिर में मौजूद अघोरी और तांत्रिक इसे उतार देते हैं।
यह जगह तंत्र साधना के लिए महत्‍वपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि अगर किसी पर काला जादू हो, तो मंदिर में मौजूद अघोरी और तांत्रिक इसे उतार देते हैं।

लोगों को मारने तक की तंत्र साधना, पढ़े-लिखे लोग भी ये कराने आते अब सुबह करीब चार-साढ़े चार का वक्त हो चला है। अघोरी बाबाओं का झुंड श्मशान में आता जा रहा है। वे एक-एक कर शराब पी रहे हैं। बोल रहे हैं रुक जाओ जरा। इनमें तीन अघोरी महिला साधु भी हैं, जो तप कर रही हैं। मैंने पूछ लिया कि ‘आप लोग क्या करने वाले हैं?’

एक अघोरी ने बताया कि ‘एक डॉक्टर आ रही है मारण क्रिया के लिए।’

ये सुन मेरे भी होश उड़ गए। अघोरी कहने लगे कि ये उस महिला डॉक्टर का फैमिली मैटर है। मैंने पूछा किसी को मारने के लिए क्या-क्या सामग्री लगती है। जवाब मिला- ये तो गुप्त बात है। मैंने गुजारिश की कुछ तो बता दें। वे एक-दूसरे से कानाफूसी करने लगे।

तभी एक अघोरी उठा और एक लिफाफा लेकर उसमें रखी एक टोकरी निकाल लाया और बोला-

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‘देखो यह है मारण क्रिया का सामान।’

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आटे जैसी दिखने वाली किसी चीज से दो इंसानी मूर्तियां बनी हैं, जिन्हें काले धागे के साथ बांधा हुआ है। मैंने पूछा- यह आटा है? तो वह बोला कि नहीं, इसके अंदर बहुत कुछ है। बहुत महंगी-महंगी सामग्री है। यह सब देख एक बार तो डर गई कि किसी को मारने के लिए पढ़े-लिखे लोग भी यह सब करते और कराते हैं।

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