डिग्री- लघु कथा(श्याम चौरसिया)

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पड़ोसी वर्मा अपने पुत्र नारायण के डॉक्टर बन जाने से फूला नहीं समा रहा था। नारायण के संग ही धीरज शर्मा ने भी परीक्षा दी थी।77% अंक धारी होने से धीरज को मैदान मारे जाने की फुल उम्मीद थी।मगर धीरज वेटिंग लिस्ट के मक्कड़ जाल में उलझ चित्त हो गया। बिना किसी चिंता और खर्च के नारायण की नॉव पार लग गयी। घरु जिले में पोस्टिंग भी हो गयी। सयोंग से डॉक्टर नारायण के काका इमरत टाई फाइड की चपेट में आ गया। रुकने-ठहरने का मुकाम शहर में हमारा घर बनाया। गांव में ये मानवीय,सुख दुख बटने की व्यवहारिक परम्परा इस मशीनी युग मे भी जीवित है।

अस्पताल में डॉक्टर नारायण के बतौर डॉक्टर पदस्त होने से चिंता नहीं थी। इमरत को दिखाया। मगर डॉक्टर नारायण को नहीं। हमने वर्मा से डॉक्टर नारायण को दिखाने की जिद की। डॉक्टर नारायण और वर्मा दोनों टाल गए। डॉक्टर आरके अग्रवाल को दिखाने ले गए। चेकअप करने के बाद डॉक्टर अग्रवाल ने डॉक्टर नारायण से जाँचे कराने और खुद ही पर्चा लिखने का आग्रह किया। डॉक्टर नारायण पर्चा तक लिखने से कतरा गया।

हमें डॉक्टर नारायण के ज्ञान और हैसियत समझ आने लगी थी। पता लगा।तमाम डॉक्टरों को मरीज घेरे रहते।लेकिन डॉक्टर नारायण के पास इक्का दुक्का मरीज ही फटकते थे। डॉक्टर नारायण बोरियत दूर करने अंक सूचियां, प्रमाण पत्र सत्यस्पित करने की जिम्नेदारी निभाता थे। इस काम के लिए विद्यार्थियों की पहली पसंद डॉक्टर नारायण ही थे। डॉक्टर नारायण जैसे 02 और डॉक्टर थे।वे सरकारी सुविधाओ और मोटे वेतन का आनद ले रहे थे। तीनो के पास डिग्री थी। मगर ज्ञान,अनुभव,योग्यता बहुत कम थी। तीनो को कोई अपने घर मरीज देखने नहीं बुलाता था। ना उनके घरो पर अन्य डाक्टरों की तरह मरीजो का हजूम लगता था। व्यवहारिक पूछ परख भी कम थी।

जब परिवार जन और रिस्तेदार ही डॉक्टर नारायण या उन जैसे 02 अन्य डॉक्टरों से कन्नी काट योग्य,प्रतिभाशाली डॉक्टरों को ही पसंद करते थे।

शायद इसी कमजोर बनाम रेवड़ी नीति/संस्कृति की वजह से ही सर्व सुविधा सम्पन्न सरकारी सेक्टर का जनहित में उचित दोहन नारायणो के बहुमत से कम सम्भव है।। यही रेवड़ी ही निजी सेक्टर की हिमालयीन सफलता का राज प्रतीत होती है।

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