एमपी में अगले 2 साल कोई नया जिला नहीं

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मध्यप्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार ने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से उठ रही नए जिलों की मांग के बाद अब मध्यप्रदेश प्रशासनिक इकाई पुनर्गठन आयोग बनाने की घोषणा कर दी है। सीएम ने 9 सितंबर को ये घोषणा उस वक्त की, जब वह सागर जिले के बीना में एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे।

ये वही बीना है, जहां की कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे बीना को जिला बनाने की मांग के साथ बीजेपी में शामिल हुई थीं। बीना को जिला बनाए जाने की मांग के बीच खुरई को भी जिला बनाने के लिए भीतर खाने राजनीतिक लामबंदी होने लगी थी। अब आयोग के गठन से ये भी साफ हो गया है कि नए जिलों का गठन सोच समझकर किया जाएगा।

पुनर्गठन आयोग की घोषणा से सरकार ने राजनीति, भूगोल और समाज तीनों को साधने की कोशिश की है। सीनियर अधिकारी कहते हैं कि ऊपरी तौर पर भले ही ये प्रशासनिक आदेश लग रहा है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने बेहद गहरे हैं।

सवाल जवाब में समझते हैं कि इस आयोग के गठन से क्या असर होगा? क्या अब एमपी में नए जिलों की आवाज बंद हो जाएगी? सीएम जैसा कह रहे हैं, वैसा हुआ तो एमपी कितना बदल जाएगा?

10 सवालों में सिलसिलेवार जानिए आयोग कैसे काम करेगा और क्या असर होगा..

1. पुनर्गठन आयोग कैसा होगा, क्या काम करेगा?

27 फरवरी 2024 को ही कैबिनेट ने प्रशासनिक पुनर्गठन आयोग को स्वीकृति दे दी थी। मगर, चुनाव आचार संहिता के चलते उस समय नियुक्ति के आदेश नहीं हुए थे। अब 9 सितंबर को सरकार ने रिटायर्ड एसीएस मनोज श्रीवास्तव को आयोग का सदस्य बनाया है।

उनके अलावा दो सीनियर रिटायर्ड आईएएस भी होंगे। किसी राजनीतिक व्यक्ति को भी आयोग में शामिल किए जाने का विचार चल रहा था, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन पाई है। आयोग का दफ्तर भोपाल में होगा।

क्या करेगा आयोग

  • आयोग हर जिलों के दौरे करके उसका भूगोल समझेगा। वहां के लोगों की तकलीफ जानेगा।
  • ये देखेगा कि प्रदेश के किस हिस्से में जिला मुख्यालय लोगों की पहुंच से बेहद दूर है? क्या उस हिस्से को नजदीक के किसी जिले में मिलाया जा सकता है या नहीं?
  • इसके बाद आयोग एक ड्राफ्ट बनाएगा। उस पर दावे-आपत्तियां बुलाई जाएंगी।
  • एक बार फिर उन दावे-आपत्तियों पर सुनवाई होगी। फिर अंतिम ड्राफ्ट तैयार होगा।

2. आयोग का काम कब से शुरू होगा और कब तक चलेगा?

बाकी सदस्यों की नियुक्ति के बाद आयोग का काम शुरू होगा। शुरुआती तौर पर यह बताया गया है कि आयोग का कार्यकाल एक साल होगा। लेकिन जितना बड़ा काम है, उसके लिए 2 से 3 साल से भी ज्यादा वक्त लग सकता है।

3. आम आदमी अपनी बात कैसे रख सकेगा?

जब आयोग के दफ्तर की जगह तय हो जाएगी तब राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के अलावा व्यक्तिगत रूप से लोग अपने सुझाव दे सकेंगे। आयोग चाहेगा तो वह जिलों में जाकर भी लोगों से सुझाव मांग सकेगा। इससे वह ग्राउंड पर जाकर लोगों की तकलीफ को भी समझ सकेगा। साथ ही जो लोग जनसंख्या और मैप के साथ तार्किक रूप से अपनी बात रखेंगे, उसे पूरी तवज्जो देगा।

उदाहरण के लिए मंदसौर जिले के गरोठ को लंबे समय से जिला बनाने की मांग की जा रही है । इसके लिए आंदोलन भी हुए। तात्कालिक सीएम शिवराज सिंह चौहान ने गरोठ को जिला बनाने की बात कही थी। वहीं अब मंदसौर को संभाग बनाने की भी मांग उठ रही है। मंदसौर, उज्जैन संभाग का जिला है और इसकी दूरी करीब 150 किमी है।

4. क्या आयोग सरकार को अपनी रिपोर्ट देगा?

हां, आयोग काम पूरा होने के बाद रिपोर्ट सरकार को देगा। इसके बाद तहसील, जिले और संभाग की सीमाओं का नोटिफिकेशन होगा। हालांकि ये बहुत लंबी प्रक्रिया है।

5. क्या मध्यप्रदेश में पहली बार पुनर्गठन आयोग बन रहा है?

इस तरह से प्रशासनिक इकाई पुनर्गठन आयोग मध्यप्रदेश में पहली बार हुआ है। ये अपनी तरह का बहुत ही महत्वाकांक्षी काम है। मुख्यमंत्री बनते ही डॉ. मोहन यादव ने जनवरी में ही इस बात के संकेत दे दिए थे। फरवरी में कैबिनेट से इसकी मंजूरी हो गई थी। लेकिन तब चुनाव के चलते इस पर बात आगे नहीं बढ़ी थी।

6. नए जिलों की मांग थमने से सरकार को क्या फायदा?

कोई भी सरकार हो, ऐसे निर्णय राजनीतिक दूरदृष्टि के हिसाब से ही लेती है। कम से कम 16 -17 जिलों की तहसीलों को नया जिला बनाने की मांग लंबे समय से हो रही है। इसमें राजनीतिक दांव पेंच भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। जैसे बीना को जिला बनाने की मांग उठी तो खुरई को भी जिला बनाने का दांव चला गया।

इसे लेकर जमकर राजनीति हुई। अब आयोग बनाने के कदम से दोनों जगह के लोग मन मसोसकर रह जाएंगे। सरकार को राजनीतिक नुकसान नहीं होगा।

7. क्या 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले होने वाले परिसीमन पर इसका असर होगा?

अभी तस्वीर बहुत साफ नहीं है। लेकिन राजनीति में दूर की सोच जरूर होती है। पहले जनगणना होगी। फिर इसी आधार पर विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन होगा। परिसीमन में सरकार अपना फायदा जरूर देखेगी।

ऐसे में नए विधानसभा क्षेत्रों में सत्ता में आसीन दल का जनाधार बढ़ाने वाले निर्णय इस पुनर्गठन में शामिल हो सकते हैं। हालांकि जब तक इसकी पूरी प्रक्रिया तय नहीं हो जाती, तब तक कुछ भी कहना मुश्किल है।

8. क्या आयोग क्या पुराने जिलों को खत्म करने की सिफारिश भी कर सकता है?

बिल्कुल। हाल ही में बने मऊगंज, निवाड़ी, पांढुर्णा, मैहर जिलों में कुछ और हिस्सों को जोड़ने की सिफारिश भी हो सकती है। इससे जिले का वर्तमान भूगोल बदलेगा। उदाहरण के तौर पर बैतूल जिले का सालबर्डी पांढुर्णा के नजदीक है। बैतूल से 120 किमी दूर सालबर्डी के लोगों को बैतूल जाने में 3-4 घंटे लगते हैं, जबकि पांढुर्णा का रास्ता 1 घंटे का है।

वैसे ही सागर जिले का बीना और नर्मदापुरम का पिपरिया है, जिनकी दूरी करीब 70 किमी है। आयोग पुराने जिलों को नई तहसीलों से जोड़ने के साथ नए जिले बनाने की सिफारिश कर सकता है। इसमें इस बात का ख्याल रखा जाएगा कि लोगों को जिला मुख्यालय जाने के लिए बहुत लंबा सफर तय न करना पड़े।

9. जिला पंचायत- जनपद पंचायत के चुनाव में इसका असर होगा?

सबसे ज्यादा असर पंचायत चुनाव में ही होगा। जिला पंचायत और जनपद पंचायत में सरकार को फायदा हो, इसकी तस्वीर दिख सकती है। हालांकि ये कैसे होगा, ये अभी से अनुमान लगाना मुश्किल है। लेकिन, एक बात तय है कि जब एक जिले का बड़ा हिस्सा दूसरे जिले में चला जाएगा तो उसकी नगर परिषद और जिला पंचायतों के राजनीतिक समीकरण भी बदल जाएंगे।

10. आयोग की सिफारिशों से तस्वीर कैसे बदलेगी?

पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का विधानसभा क्षेत्र बुधनी का जिला मुख्यालय सीहोर है। लेकिन यहां की दूरी 106 किलोमीटर है। जाहिर है कि बुधनी के लोगों को जिला मुख्यालय जाने में बहुत दिक्कत होती है। बुधनी की दूरी नर्मदापुरम से सिर्फ 8 किलोमीटर है।

ऐसे में संभावना है कि बुधनी को नर्मदापुरम में शामिल कर लिया जाए। ऐसे ही सिरोंज की विदिशा से 90 किलोमीटर दूरी है। यहां भी समीकरण बदलेंगे।

अब जानिए किस जिले की मांग कितने समय से हो रही

चाचौड़ा: ये गुना जिले की तहसील है। चाचौड़ा को जिला बनाने की मांग लंबे समय से हो रही है। कमलनाथ सरकार के समय पूर्व विधायक लक्ष्मण सिंह ने इसे पुरजोर तरीके से उठाया था। चाचौड़ा की गुना से दूरी 70 किमी है और यहां के लोगों को जिला मुख्यालय जाने में करीब डेढ़ घंटे का समय लगता है। वहीं गुना की मधुसुदनगढ़ तहसील में कई ऐसे गांव हैं, जो जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर हैं। उनके लिए गुना की अपेक्षा भोपाल जिला ज्यादा करीब पड़ता है।

पिपरिया: ये नर्मदापुरम जिले में आता है। जिला मुख्यालय से पिपरिया की दूरी करीब 70 किमी है और पहाड़ी इलाका होने से आने-जाने में करीब 2 घंटे का समय लगता है। पिपरिया को जिला बनाने की मांग कई साल से की जा रही है। पिछले साल विधानसभा चुनाव के दौरान पिपरिया को जिला बनाने की मांग को लेकर धरना, प्रदर्शन और हड़ताल भी की गई थी।

गौरिहार: छतरपुर जिले में आता है और जिला मुख्यालय से इस तहसील की दूरी करीब 100 किमी है। आने-जाने में ढाई घंटे का समय लगता है। यहां के लोगों ने कई बार इसे जिला बनाने की मांग की है। चुनाव के समय ये मांग ज्यादा तेज हुई थी। उस दौरान चुनाव लड़ने वाले जनप्रतिनिधियों ने लोगों को आश्वासन भी दिया था।

ओंकारेश्वर: बारह ज्योतिर्लिंग में से एक यहीं पर स्थित है। ओंकारेश्वर खंडवा जिले में आता है, लेकिन यहां के लोग लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि खरगोन जिले की बड़वाह और सनावद को शामिल कर ओंकारेश्वर को एक नया जिला बनाया जा सकता है। खरगोन से सनावद की दूरी 70 किमी और बड़वाह की 88 किमी है, जबकि ओंकारेश्वर से सनावद 14 किमी और बड़वाह 16 किमी है।

डही: ये धार जिले की तहसील है और इसकी जिला मुख्यालय से दूरी 127 किमी है। डही के लोगों को धार तक पहुंचने में तीन घंटे का समय लगता है। यहां के लोगों की कई दिनों से मांग है कि कुक्षी या मनावर जिला बनाकर डही को उसमें शामिल किया जाए। कुक्षी से डही की दूरी 24 किमी है तो मनावर की दूरी 60 किमी है।

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