☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 04 मार्च, 2024 (सोमवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – वनों की अँधाधुन्ध कटाई एवं पर्यावरण की अनदेखी के कारण विश्वभर में वन्य जीवों की अनेक प्रजातियाँ लुप्तप्राय हो रहीं हैं जबकि धरा पर पारिस्थितिक संतुलन एवं जैव-विविधता को बनाए रखने के लिए वन्य जीवों का संरक्षण अत्यन्त आवश्यक है। स्वच्छ जल, प्राणवायु एवं जीवनदायिनी औषधियों के मूल स्त्रोत वन एवं वन्य जीव ही हैं। इनकी संख्या में लगातार कमी पर्यावरणीय विकृति का एवं पारिस्थितिक असंतुलन का मूल कारण है। धरा पर जीवन तत्त्व को सहेजने के लिए प्रकृति के साथ सहअस्तित्व के विचार का प्रसार आवश्यक है ..! हमारे शास्त्रों में पेड़ लगाने को बड़ा पुण्य कार्य बताया गया है। एक पेड़ लगाना एक यज्ञ करने के बराबर है। वनों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष लाभों को देखकर उनका संरक्षण करना हमारा कर्त्तव्य है। इस शताब्दी में वनों के विनाश के कारण होने वाले खतरो को भी विज्ञान समझ गया है, इसलिए आधुनिक वैज्ञानिकों ने प्रत्येक सरकार को वनों के संरक्षण की सलाह दी है। इसलिए संसार की प्रत्येक सरकारों ने अपने यहाँ वन संरक्षण की नीति बनाई है। वन मानव जाति के लिए एक वरदान है। वन प्रकृति का एक सुन्दर सृजन हैं। भारत को विशेष रूप से कुछ सुन्दर जंगलों का आशीष मिला है जो पक्षियों और जानवरों की कई दुर्लभ प्रजातियों के लिए घर हैं। वनों के महत्व को पहचाना जाना चाहिए। वन पृथ्वी पर जैव-विविधता को बनाए रखते हैं। वन वातावरण को शुद्ध करते हैं। स्वस्थ वातावरण ही हमारे जीवन का आधार है। प्रकृति के बिना मनुष्य का अस्तित्व ही नहीं। अतः पर्यावरण का संरक्षण किया जाना सामूहिक दायित्व है। प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि पर्यावरण के स्वच्छ रहने पर ही धरती पर जीवन सम्भव है। पर्यावरण के प्रति बढ़ते संकट को रोकने और इसे सुरक्षित करने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है और यह तभी सम्भव है जब हम प्रकृति के संरक्षण के लिए सक्रिय योगदान कर सकें। अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध रखने का सबसे अच्छा माध्यम पौधारोपण है। पौधे लगाकर ही हम कर सकते हैं – प्रकृति का संरक्षण। प्रकृति और मानव-सृष्टि के सन्तुलन का मूल आधार वन ही हैं। वन पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जंगलों को संरक्षित करने और अधिक पेड़ों का विकास करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा कि वन तरह-तरह के फल-फूलों, वनस्पतियों, वनौषधियों और जड़ी-बूटियों की प्राप्ति का स्थल तो हैं ही, धरती पर जो प्राण-वायु का संचार हो रहा है उसके समग्र स्रोत भी वन ही हैं। वन धरती और पहाड़ों का क्षरण रोकते हैं। नदियों को बहाव और गतिशीलता प्रदान करते हैं। वन बादलों और वर्षा का कारण हैं। वन तरह-तरह के पशु-पक्षियों की उत्पत्ति, निवास और आश्रय स्थल हैं। अनेक दुर्लभ मानव और पशु-पक्षियों आदि की जातियाँ-प्रजातियाँ आज भी वनों की सघनता में अपने बचे-खुचे रूप में पाई जाती हैं। यह सामान्य सा ज्ञान है कि पौधे ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। वे अन्य ग्रीनहाउस गैसों को भी अवशोषित करते हैं, जो वातावरण के लिए हानिकारक होती हैं। वृक्ष जंगलों से निकल रही नदियों और झीलों पर छाया का निर्माण करते हैं और उन्हें सूखने से बचाए रखते हैं। दुनिया भर के लाखों लोग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। वनों के संरक्षण और प्रबन्धन के लिए लगभग 10 मिलियन लोग प्रत्यक्ष रूप से कार्यरत हैं। इस प्रकार वनों के और भी अनेक जीवन्त महत्त्व एवं उपयोग गिनाए जा सकते हैं ..।
? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – यह स्पष्ट है कि आरम्भ से लेकर आज तक तो वनों की आवश्यकता-उपयोगिता बनी ही रही है, आगे भी बनी रहेगी। किन्तु मानव शिक्षित, ज्ञानी होते हुए भी लगातार वनों को काट कर प्रकृति का, धरती का, सारी मानवता का सन्तुलन बिगाड़ कर सभी कुछ तहस-नहस करके रख देना चाहता है। अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति में मग्न होकर, हम यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वनों का निरन्तर कटाव जारी रखकर हम वनों को उचित संरक्षण एवं संवर्द्धन न देकर प्रकृति और मानवता का तथा अपनी ही आने वाली पीढ़ियों का कितना बड़ा अहित कर रहे हैं। जीवन को अमृत पिलाने में समर्थ धरती को रूखा-सूखा और बेजान बना देना चाहते हैं। वन बने रहें, तभी धरती पर उचित मात्रा में वर्षा होगी, नदियों की धारा प्रवाहित रहेगी, पहाड़ों और धरती का क्षरण नहीं होगा। सूखा या बाढ़ और भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा होती रहेगी। आवश्यक प्राण-वायु और प्राण-रक्षक औषधियाँ-वनस्पतियाँ आदि निरन्तर प्राप्त होती रहेंगी। अनेक खनिज प्राप्त हो रहे हैं, वे भी होते रहेंगे, अन्यथा उनके स्रोत भी बन्द हो जाएँगे। वनों की उपयोगिता जैसी सदियों पहले थी आज भी वैसे ही है और आने वाले प्रत्येक वर्ष में ऐसी ही रहेगी। वन मानव को जीवन प्रदान करते हैं। वन तो प्राणीमात्र के ऐसे सच्चे मित्र हैं कि वे उनके खतरों को स्वयं ग्रहण कर उन्हें लाभ प्रदान करते हैं। श्वास जीव मात्र का जीवन है। जब हम श्वास लेते हैं तो ऑक्सीजन वायु हमारे हृदय में जाती है और हम में प्राण धारण करती है और जब हम अपने श्वास बाहर छोड़ते हैं उस समय कार्बन-डाइऑक्साइड गैस को बाहर निकालते हैं। इस श्वास प्रक्रिया में पेड़ हमारी बड़ी सहायता करते हैं। पेड़ जीवों की रक्षा के लिए ऑक्सीजन छोड़ते है और कार्बन डाइआंसाइड को ग्रहण करते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड मानव के लिए हानिकारक है। पेड़ के न होने से वायु में उसकी मात्रा बढ़ती जाती है, जिससे जीवमात्र के लिए खतरा पैदा हो जाता है। पेड़ों के अभाव में ऑक्सीजन का अभाव भी होने लगेगा, जिससे जीवमात्र का अस्तित्व भी मिटने लगेगा। पेड़ों के द्वारा वर्षा अधिक होती है। पेड़ बादलों को अपनी ओर खींचते हैं। पेड़ हमें प्रदूषण से बचाते है। प्रदूषण से कई प्रकार के रोग पैदा होते है, वायुमण्डल दूषित हो जाता है, ऑक्सीजन नष्ट हो जाती है। पेड़ इस प्रदूषण को मिटा देते है, वे दूषित वायु को स्वयं ग्रहण कर स्वच्छ वायु हमें प्रदान करते हैं। इस स्थिति में पेड़ से बढ़कर हमारा मित्र और कौन हो सकता है? इसलिए पेड़ों की रक्षा करना हमारा धर्म है ..।

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