महिला आरक्षण बिल पास होने के बाद देश और प्रदेश का बढ़ेगा आर्थिक बोझा?

0
Spread the love

 

*महिला आरक्षण बिल पास होने के बाद देश और प्रदेश का बढ़ेगा आर्थिक बोझा?*

 

व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

 

देश में जब भी कोई बड़ा फैसला होता है, तो उसका स्वागत भी होता है और सवाल भी उठते हैं। महिला आरक्षण बिल को लेकर भी कुछ ऐसा ही माहौल है। एक तरफ इसे “नारी सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम” बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ कुछ लोग कैलकुलेटर लेकर बैठ गए हैं कि भाई साहब, इससे सरकारी खजाने पर कितना बोझ बढ़ेगा?

 

अब देखिए, राजनीति में गणित बड़ा दिलचस्प होता है। जनता को भावनाओं में जोड़ा जाता है और खर्चों को फाइलों में। महिला आरक्षण बिल पास हुआ तो सीटों का परसीमन होगा, सीटें बढ़ेंगी, सांसद बढ़ेंगे, विधायक बढ़ेंगे और फिर पार्षद भी बढ़ेंगे। यानी लोकतंत्र का परिवार और बड़ा होगा। अब सवाल ये है कि परिवार बढ़ेगा तो खर्चा भी तो बढ़ेगा ना?

 

आज की स्थिति यह है कि केंद्र से लेकर राज्यों तक और नगर निगम से लेकर पंचायत तक हर सरकार कर्ज लेकर ही अपनी गाड़ी चला रही है। कहीं विकास के नाम पर कर्ज है, कहीं योजनाओं के नाम पर और कहीं चुनावी वादों के नाम पर। ऐसे में अगर सांसदों की संख्या 800 के पार पहुंचती है और विधायकों की संख्या भी बढ़ती है, तो वेतन, भत्ते, बंगले, गाड़ियां, सुरक्षा सब कुछ तो बढ़ेगा ही।

 

अब आम आदमी सोच रहा है कि “भाई, ये लोकतंत्र है या कोई सरकारी कंपनी, जिसमें हर साल नए-नए कर्मचारी भर्ती हो रहे हैं?” फर्क बस इतना है कि यहां भर्ती के लिए इंटरव्यू नहीं, चुनाव होते हैं।

 

महिला आरक्षण का विरोध कोई समझदार व्यक्ति नहीं कर सकता, क्योंकि महिलाओं को राजनीति में बराबरी का हक मिलना ही चाहिए। लेकिन सवाल यहां नीयत का नहीं, नीति के खर्च का है। अगर 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करनी हैं, तो क्या उसके लिए सीटें बढ़ाना जरूरी है? या फिर मौजूदा सीटों में ही आरक्षण लागू किया जा सकता है?

 

लेकिन राजनीति में “जगह बनाना” थोड़ा मुश्किल काम है। पुराने नेता अपनी सीट छोड़ना नहीं चाहते और नए नेताओं को जगह चाहिए। तो समाधान निकला सीटें बढ़ा दो! यानी घर छोटा पड़े तो नया कमरा बनाओ, भले ही कर्ज लेकर बनाना पड़े।

 

अब जरा कल्पना कीजिए एक राज्य में पहले 230 विधायक थे, अब मान लीजिए ये संख्या 300 हो गई। हर विधायक को वेतन, भत्ता, यात्रा खर्च, कार्यालय, स्टाफ सब कुछ मिलेगा। फिर मंत्री पद की भी होड़ बढ़ेगी। हर पार्टी चाहेगी कि उसके ज्यादा से ज्यादा लोग मंत्री बनें। तो मंत्रीमंडल भी फूलेगा, और खर्चा भी।

 

नगर निगमों और नगर पालिकाओं का हाल तो और भी दिलचस्प होगा। पहले जहां 50 पार्षद थे, वहां 70 हो जाएंगे। अब हर पार्षद को भी बैठने के लिए कुर्सी, चाय-पानी और सम्मान चाहिए। जनता को भले पानी न मिले, लेकिन पार्षदों के लिए मिनरल वॉटर की व्यवस्था पक्की रहेगी। सरकार कहेगी “ये खर्च नहीं, निवेश है।”

जनता पूछेगी “किसमें निवेश है? नेताओं में या देश में?”

 

अब समर्थक कहेंगे कि इससे महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, नीतियां बेहतर बनेंगी, समाज में संतुलन आएगा। बिल्कुल सही बात है। लेकिन विरोधी यह पूछ रहे हैं कि क्या इसके लिए कोई आर्थिक रोडमैप भी है? या फिर ये भी उसी सूची में जुड़ जाएगा, जिसमें योजनाएं पहले बनती हैं और बजट बाद में खोजा जाता है। जब भी कोई नई योजना आती है, तो सरकार कहती है“इससे देश मजबूत होगा।” लेकिन कभी ये नहीं बताया जाता कि “खजाना कितना कमजोर होगा।”

 

अब सोचिए, अगर सांसदों की संख्या 800 के पार चली गई, तो संसद भवन में भी कुर्सियां कम पड़ सकती हैं। फिर नया भवन, नई व्यवस्था सब कुछ करना पड़ेगा। यानी लोकतंत्र को और “स्पेस” चाहिए, और उस स्पेस के लिए “स्पेंड” भी चाहिए।

 

जनता का हाल भी बड़ा मजेदार है। वो टैक्स देती है, महंगाई झेलती है, और फिर टीवी पर बहस देखती है कि “देश का भविष्य उज्ज्वल है।” वो सोचती है“भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन वर्तमान क्यों इतना महंगा है?”

 

महिला आरक्षण बिल निश्चित रूप से सामाजिक दृष्टि से एक जरूरी कदम है। लेकिन हर जरूरी कदम आर्थिक रूप से आसान नहीं होता। सरकार को यह समझना होगा कि केवल सीटें बढ़ाने से सशक्तिकरण नहीं आता, बल्कि सही नीतियों और पारदर्शिता से आता है।

 

अगर महिलाएं राजनीति में आएंगी, तो उम्मीद है कि वे खर्चों पर भी लगाम लगाएंगी। शायद वे ही पूछें“इतनी गाड़ियां क्यों चाहिए?” शायद वे ही कहें “जनता के पैसे का हिसाब दो।” और अगर ऐसा हुआ, तो हो सकता है कि यह बढ़ता हुआ खर्च भी एक दिन संतुलित हो जाए।

 

लेकिन फिलहाल तो स्थिति यही है कि लोकतंत्र का परिवार बढ़ रहा है,और उसके साथ खर्चों का वजन भी। अब ये बोझ देश की अर्थव्यवस्था उठाएगी या जनता की जेबये फैसला आने वाले समय में होगा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481