०प्रतिदिन विचार (19/02/2024)नई मस्तिष्क तकनीकें – नैतिकता और मानव अधिकार-राकेश दुबे

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अब दिमाग के अंदर (इनवेसिव) डिवाइस डालकर गतिविधियां पढ़ने वाली चिप का मनुष्यों पर परीक्षण शुरू हो गया है। वैसे अमेरिका और अन्य देशों में दशकों से अनेकानेक अनुसंधान समूह इम्प्लांटेबल ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस डिवाइसेस पर काम करते आए हैं और कइयों का परीक्षण भी हुआ है। इयान मस्क की कम्पनी न्यूरालिंक के दावे के मुताबिक उनके इस प्रयोग में किसी मनुष्य के न्यूरॉन से पहली बार सूचना रिकॉर्ड की गई है। इस चिप में अति सूक्ष्म पॉलीमर तंतु हैं, जो दिमाग के अंदर 1024 बिंदुओं से गतिविधियां दर्ज कर सकते हैं। किसी अन्य समूह अथवा कंपनी द्वारा इतनी बड़ी बैंडविड्थ से ब्रेन-कंप्यूटर कम्युनिकेशन का उपयोग करने का दावा अब तक नहीं किया गया।

भले ही मस्क की यह घोषणा नाटकीय लगे लेकिन न्यूरालिंक पिछले कई सालों से इस तकनीक पर काम कर रही है। मस्क के मुताबिक यह तकनीक रीढ़ की हड्डी में चोट से लकवाग्रस्त हुए लोगों की मददगार हो सकती है। उन्होंने यह दावा भी किया कि चिप से अवसाद और व्यक्ति में एलज़ाइमर इत्यादि को भी ठीक किया जा सकता है।

न्यूरालिंक और अन्य अनुसंधानकर्ता जैसे कि ब्लैकरॉक न्यूराटेक और सिन्क्रोन समूह तरक्की कर रहे इस स्टार्टअप क्षेत्र का हिस्सा है, जिसे न्यूराटेक (फिनटेक, एजूटेक, एग्रीटेक की तर्ज पर) नाम दिया गया है। न्यूराटेक का उद्देश्य इंसान के दिमाग की अवस्था का विनियमन करना है। न्यूराटेक की दो धाराएं हैं -नॉन इनवेसिव और इनवेसिव तकनीक। नॉन इनवेसिव में खोपड़ी की सतह पर इलेक्ट्राड्स और अन्य डिवाइस लगाकर दिमाग की गतिविधि को पढ़ा जाता है और काफी समय से यह विधा उपयोग हो रही है। अनेकानेक न्यूराटेक उत्पाद पहले ही प्रचलित हैं जैसे कि ईईजी (इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राम) उपकरण जो दिमाग की गतिविधि में सुधार लाने के लिए सिग्नल को दर्ज कर संबंधित डाटा एवं ट्रांसक्रेनियल स्टिमुलेशन कॉन्ट्रैप्शन मुहैया करवाता है। इसका उपयोग करके दिमाग की गतिविधि में सुधार लाया जाता है।

न्यूरालिंक सरीखी कंपनियां इनवेसिव तकनीकों पर काम कर रही हैं, जिनमें खोपड़ी की सतह, दिमाग के भीतर और शरीर के अन्य अंगों पर इम्प्लांट स्थापित करना शामिल है। पर्ड्यू यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रिकल एंड कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर श्रिया सेन ने वाई-आर नामक तकनीक ईजाद की है, जो शरीर के अंदर ऐसा इंटरनेट स्थापित कर सकती है, जिसका उपयोग करके शरीर के अंदर लगी और बाहर डिवाइस जैसे कि स्मार्टफोन, स्मार्टवाच और इंसुलिन पम्प इत्यादि एक-दूसरे से संपर्क बना सकते हैं। सेन ने एक अन्य अवधारणा भी पेश की है, जिससे कि भविष्य में इंसान तकनीकी यंत्रों को महज विचारों के जरिए चला/नियंत्रित कर सकेगा। वाई-आर तकनीक ब्लूट्रुथ या अन्य रेडियो सिग्नल्स से कहीं कम फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल करके काम करती है। यह लो-फ्रीक्वेंसी सिग्नल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में इलेक्ट्रो-क्वासिस्टिक रेंज में आते हैं और मनुष्य की चमड़ी से गुजरकर प्रेषण कर सकते हैं।

अभी न्यूराटेक पर नैतिकता और नियमन को लेकर बहुत से तकाजे अनुत्तरित हैं। इंसान के दिमाग के अंदर इम्प्लांट स्थापित करके जो क्लीनिकल ट्रायल न्यूराटेक ने शुरू किए हैं, उनके नियमन पर रहस्य कायम हैं। भले ही अमेरिका की फूड एंड ड्रग रेग्यूलेटरी एडमिनिस्ट्रेशन ने परीक्षण अनुमति दे दी है परंतु न तो परीक्षणों की तफ्सील साझा करने वाली अनिवार्यता का पालन हुआ है न ही परीक्षणों का वैज्ञानिक मकसद मालूम है। विगत में मस्क की कंपनी द्वारा मनुष्यों पर परीक्षण करने की अनुमति को खारिज कर दिया गया था, इसलिए यह जानना आवश्यक है कि इस बार मंजूरी का आधार क्या है। अनेक नॉन-इनवेसिव उत्पाद जैसे कि माइग्रेन के इलाज के लिए इलेक्ट्रॉड्स का उपयोग होता आया है, इनकी दक्षता-निरापदता-गुणवत्ता के प्रमाण के प्रश्न बाकी हैं

नई मस्तिष्क तकनीकें नैतिकता और मानव अधिकार को लेकर चिंताएं पैदा करती हैं। इस क्षेत्र में अधिकांश खोजकार्य निजी कंपनियां द्वारा किया जा रहा है,जिनकी जवाबदेही अपने निवेशकों और शेयर धारकों के प्रति ही रहती है। इसलिए, जाहिर है कि जहां वे इनवेसिव तकनीक में निहित जोखिमों, उच्च कीमत, संक्रमण, दीर्घकालिक दुष्परिणाम, बैटरियों के ज्यादा गर्म होने इत्यादि प्रभावों को घटाकर बताएंगे तो सफलता का गुणगान बढ़ा-चढ़ाकर करेंगे।नई तकनीक को लेकर अति-उत्साह में बहने की बजाय इसके तकनीकी पहलुओं पर लोगों के बीच जानकारी परिपूर्ण संवाद की जरूरत है।

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