रामदास का मरना तय था ः भास्कर लाक्षाकार के कविता संग्रह का लोकार्पण 

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समाचार

भोपाल 22 जुलाई 25

रामदास का मरना तय था ः भास्कर लाक्षाकार के कविता संग्रह का लोकार्पण

आज दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के राज सदन में भास्कर लाक्षाकार के कविता‌ संग्रह रामदास का मरना तय था का लोकार्पण मनोज श्रीवास्तव,और राजेश जोशी ने किया।अरुणाभ सौरभ ने पुस्तक पर समीक्षात्मक टिप्पणी की। डां विशाखा राजुरकर ने कार्यक्रम का संचालन किया।

इस अवसर पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी में कहा कि

भास्कर प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए कविता और वह भी आक्रोशित रूप में कैसे करते हैं यह आश्चर्यजनक है ,क्योंकि रामदास का मरना तय था शीर्षक ही इस बात को अभिव्यक्त करता है कि वे एक कमजोर , असहाय व्यक्ति के साथ खड़े हैं। उन्होंने अपनी कविता में भाषा का प्रयोग सजगता के साथ किया है। उन्होंने कहा कि कविता हमेशा अंधकार से लड़ते हुए लिखी जाती है तथा उनका यह कविता संग्रह रघुवीर सहाय से लेकर राजेश जोशी तक की परम्परा का निर्वाह करता है।

इस आयोजन के मुख्य अतिथि राजेश जोशी ने कहा कि भास्कर लाक्षाकार प्रशासनिक पाले से कविता के पाले में आ गये है,पर यह जरूरी है क्योंकि व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में संवेदनशील होता है और वह घटनाओं को अपनी दृष्टि से देखता है। उन्होंने कहा कि वैसे ब्यूरोक्रेसी का अपना संसार है और उसे समझना कठिन है पर भास्कर जैसे लोगों के माध्यम से ही ये बातें सामने आ पाती है। कविता संग्रह के शीर्षक से आम आदमी की पीड़ा व्यक्त होती है।

इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि हमारे पूर्वज कवि ग़ालिब नहीं है क्योंकि ग़ालिब तो अपनी पेंशन बढ़ाने के लिए तीन हजार किलोमीटर की यात्रा कर दिल्ली से कोलकाता गए थे, पर हमारे पूर्वज कवि रघुवीर सहाय है। रघुवीर सहाय ने अपने दौर में जो कविताएं आम आदमी की तकलीफों को लेकर थी वहीं आस्वाद भास्कर की कविताओं में है।उन्होंने कहा कि मानस में

तुलसी ने सभी विगत और आगत कवियों के प्रति आभार व्यक्त किया है और उनका यह आभार बताता है कि उन्हें विश्वास था कि अगर विगत में सामाजिक विसंगतियों और अंधकार से लड़ने की रचना हुई है तो भविष्य में भी इस तरह के रचनाएं होती रहेगी ।उन्होंने कहा कि संग्रह में 31 कविताएं अपने समय की वास्तविकता को बताते हैं यह भी कहा कि भास्कर की कविताओं में ईश्वर के साथ जटिल रिश्तेदारी है और इस जटिल रिश्तेदारी से ऐसा लगता है कि ईश्वर भी मूर्खों की जमात से मुक्ति पाना चाहता है। कार्यक्रम के अंत में आभार भास्कर लाक्षाकार की माताजी जनक किशोरी जी ने व्यक्त किया।

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