गजब का गठवन्धन है ब्याह!

ग्रहस्थी में प्रवेश करने के बाद ज़िन्दगी सप्तपदी सूत्र की अपेक्षा लश्टम-पश्टम खुद ही संचालित होती रहती है। संघर्ष की पटरी पर किसी की जिन्दगी भाप के इंजन की तरह तो किसी की बुलेट ट्रेन की तरह चलती है। हर कालखण्ड में दामपत्य की अलग अलग चुनौतियाँ रही हैं। लेकिन ब्याह के बाद की महायात्रा में हर एक का धन,ऋण , गुणा, भाग का महायोग 100 ही रहता है। 16 श्रंगार और षठ रस सब इसी में अंतर्निहित हैं। हास्य ,करुण, रौद्र, वीर, श्रंगार , भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत, वत्सल और भक्ति सारे रसों का आनन्द इस संस्था के भीतर ही लिया जा सकता है।संस्था है बड़ी सुंदर ।जीवन को सरल सुगम बना के रखती है । धर्म, अर्थ ,काम और मोक्ष की राह भी इसी संस्था के वटवृक्ष के छांव में तय होती है। इस संस्था का प्रादुर्भाव आदमी के प्रादुर्भाव के साथ ही तो नहीं हुआ होगा! कब हुआ होगा ? संस्था के प्रादुर्भाव के बारे में १९वीं शताब्दी में वेखोफन (१८१५-८० ई.), मोर्गन (१८१८-८१ ई.) तथा मैकलीनान (१८२७-८१) ने विभिन्न प्रमाणों के आधार पर इस मत का प्रतिपादन किया था कि मानव समाज की आदिम अवस्था में विवाह का कोई बंधन नहीं था, सब नर-नारियों को यथेच्छित कामसुख का अधिकार था। रुसो के अनुसार तेरे और मेरे की भावना के अविर्भाव से संपत्ति का इच्छा का अंकुरण हुआ।शक्ति के आधार पर स्त्री विशेष को अपने अधिकार में रखने के बाद घर और परिवार जैसी संस्था को जन्म दिया।
सनातनी मानतते हैं कि पृथ्वी पर पहला विवाह मनु और शतरूपा ने किया था। शतरूपा संसार की प्रथम स्त्री थी ऐसी हिंदू मान्यता है। इनका जन्म ब्रह्मा के वामांग से हुआ था (ब्रह्मांड. 2-1-57) तथा स्वायंभुव मनु की पत्नी थीं। सुखसागर के अनुसार सृष्टि की वृद्धि के लिये ब्रह्मा जी ने अपने शरीर को दो भागों में बाँट लिया जिनके नाम ‘का’ और ‘या’ (काया) हुये।
ईसाई धर्म Adam और Eve को पहला मानव मानता है,तो वहीं इस्लाम धर्म आदम व हव्वा को। चीन, मिस्र और यूनान के प्राचीन साहित्य में भी कुछ ऐसे उल्लेख मिलते हैं। इनके आधार पर लार्ड एवबरी, फिसोन, हाविट, टेलर, स्पेंसर, जिलनकोव लेवस्की, लिय्यर्ट और शुर्त्स आदि पश्चिमी विद्वानों ने विवाह की आदिम दशा कामचार (प्रामिसकुइटी) की अवस्था मानी। क्रोपाटकिन व्लाख और व्राफाल्ट ने प्रतिपादित किया कि प्रारंभिक कामचार की दशा के बाद बहुभार्यता (पोलीजिनी) या अनेक पत्नियाँ रखने की प्रथा विकसित हुई और इसके बाद अंत में एक ही नारी के साथ पाणिग्रहण करने (मोनोगेमी) का नियम प्रचलित हुआ।मूलतः: विवाह संस्था के स्थापित न होने तक जीवन में असुरक्षा की भावना रहती होगी। विशेष रुप से नारी के लिए। विवाह की संस्था मानव समाज में जीवशास्त्रीय आवश्यकताओं से उत्पन्न हुई है। इसका मूल कारण अपनी जाति को सुरक्षित बनाए रखने की चिंता है। यदि पुरुष यौन संबंध के बाद पृथक् हो जाए, गर्भावस्था में पत्नी की देखभाल न की जाए, संतान उत्पन्न होने पर उसके समर्थ एवं बड़ा होने तक उसका पोषण न किया जाए तो मानव जाति का अवश्यमेव उन्मूलन हो जाएगा। अत: आत्मसंरक्षण की दृष्टि से विवाह की संस्था की उत्पत्ति हुई होगी।
भगवान शिव और पार्वती के विवाह को दुनिया का पहला प्रेम विवाह माना जाता है।
विवाह महाभारत के आदिपर्व में
ऋषि श्वेतकेतु ने ही स्त्री-पुरुषों को विवाह सूत्र में बांधा था और विवाह की परंपरा, नियम, मर्यादा, महत्व, सिंदूर, मंगलसूत्र और सात फेरों समेत, सभी तरह के रीति-रिवाजों की स्थापना की थी ।
शुरुआत में विवाह जैसा कुछ नहीं हुआ करता था। स्त्री और पुरुष दोनों की स्वतंत्र रहा करते थे। पहले के समय में कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री को पकड़कर ले जाया करता था। इस संबंध में महाभारत में एक कथा मिलती गै। एक बार उद्दालक ऋषि के पुत्र श्वेतकेतु ऋषि अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी वहां एक अन्य ऋण आए और उनकी माता को उठाकर ले गए। ये सब देखकर श्वेत ऋषि को बहुत गुस्सा आया। उसके पिता ने उन्हें समझाया की प्राचीन काल से यहीं नियम चलता आ रहा है। उन्होंने आगे कहा कि संसार में सभी महिलाएं इस नियम के अधीन है।
श्वेत ऋषि ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह तो पाशविक प्रवृत्ति है यानी जानवरों की तरह जीवन जीने के समान है। इसके बाद उन्होंने विवाह का नियम बनाया।सनातनी आठ प्रकार के विवाह पद्धतियों का उल्लेख करते हैं। दैव, ब्रह्म, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गंधर्व, राक्षस और पैशाच। लेकिन, आजकल ब्रह्म विवाह प्रचलित है। संस्था में रेल की पटरी की तरह समानान्तर भी नहीं चलना पड़ता न ही वृत के केन्द्र में खड़े होकर ताकतें रहने से काम चलता है। सहयात्री के कदम से कदम मिला कर चलने की एक अजब सी हूनरमंद यात्रा है ये। जो जितना निपुण उतना सुखी। नयी पीढ़ी सीता, सावित्री, अनसूया के चरित्र कथा भागवत तक ही ठीक समझते हैं परिवर्तित परिस्थितियों में संबन्ध समानता के घरातल पर चल रहे हैं। वर-वधू पौराणिक कथाओं के परिवेश से बारह वैज्ञानिक दृष्टि से सप्तपदी के सूत्रों का संचालन कर रहे हैं। संयुक्त कुटुंब से मुक्त युगल खुले आसमान में विचरण कर रहे हैं।
सप्तपदी के बाद की पदकथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी जटिल होती जा रही है। संस्था पर नैतिक, दार्शनिक ,पारिवारिक, सामाजिक बंधनों से ज्यादा वैधानिक , आर्थिक और वैश्विक सांस्कृति का प्रभाव और दबाव बढ़ रहा है । सह अस्तित्व, सहयोग, समन्वय की जगह आत्मसम्मान स्व अस्तित्व का भाव बड़ता दिखता है। हां करवाचौथ के ब्रतधारियों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन संस्था में प्रेम, सहिष्णुता सहभागिता, सामंजस्य और समन्वय के भाव में कमी आ जाने के कारण रिश्तों में स्थायित्व का भाव तिरोहित हुआ है। शिक्षा और रोजगार के कारण भी अन्याय और अवांछित दबाव का मुखर विरोध करने की क्षमता बालिकाओं में बढ़ी है। 30-35 बर्ष के बीच विवाह संपन्न होने के कारण वैवाहिक जीवन स्पान कम हो गया है। भारत में इस संस्था में पनप रही जटिलताओं का समाधान समाज सुधारकों, धर्माचार्यों और मनीषियों द्वारा किया जाना जरुरी है।
चलिए विषय की जटिलता में कौन उलझे। हम तो 36 का आंकड़ा पार कर गये अगली पीढ़ी अपनी जाने।
