☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 14 दिसम्बर 2024 (शनिवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्

।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – हमारा प्रत्येक कार्य उत्कृष्ट हो और यदि उसके मूल में समष्टि के कल्याण की भावना है तो हमारी प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया कर्मयोग बन जाती है। पूरी सृष्टि में कर्मयोग है। प्रकृति से ज्यादा निष्काम कर्म करने की सीख और कहाँ से मिल सकती है? प्रकृति हमारी सच्ची और हितैषी शिक्षिका है। प्रकृति का हर तत्व अपने उद्देश्य को बिना किसी स्वार्थ के पूरा करता है। सूर्य, चंद्रमा, नदियाँ, वृक्ष—ये सभी दूसरों के लाभ के लिए अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, बिना किसी अपेक्षा के। इसी प्रकार, यदि मनुष्य भी अपने कार्यों को इसी भावना से करें, तब उसके जीवन में सच्चा और दिव्य कर्मयोग घटित हो सकता है ! जीव के समक्ष प्रेय तथा श्रेय दो विरोधी पगडंडियाँ होती हैं। प्रेय मार्ग अपेक्षाकृत सहज, सरल, सुगम तथा भौतिक दृष्टि से आकर्षक लगता है। परिणाम में दु:खद होने पर भी सामान्य जन इसी का अनुसरण करते हैं। श्रेय मार्ग का अनुसरण करने वाले साधक बहुत कम होते हैं। सधे मन के जीव ही इस पथ पर चलते हैं। अपनी वृत्तियों को इस पथ पर लगाना प्रारम्भ में इतना ही कठिन होता है, जितना कि बहते जल को बाँधकर विपरीत दिशा की ओर मोड़ना। एक साधारण सा छेद भी इस बाँध को धराशायी तथा साधनों को व्यर्थ बना दे सकता है। ज्ञान, भक्ति और कर्म – ये तीन मानव के कल्याण के साधन हैं। इनके अलावा और कोई उपाय और साधन नहीं है। अपनी सभी क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से मुक्त रहना और सर्वव्यापी परमात्मा में एकाकीभाव से स्थित रहने का नाम ‘ज्ञानयोग’ है। शास्त्र कहते हैं कि कर्म से सुख-दु:ख और जन्म-मृत्यु तय होती है, किन्तु ज्ञान के द्वारा साधक को शोक और मोह से छुटकारा मिलता है। ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी वही होता है, जो अपनी इन्द्रियों को जीत ले। वास्तव में आत्मज्ञान ही आनन्द की सर्वोपरि अवस्था या परम शान्ति की वास्तविक अनुभूति है। फल और आत्म-भाव को त्याग कर, दैव इच्छा के अनुसार अपनी बुद्धि से कर्म करने का नाम ‘कर्मयोग’ है। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निष्काम कर्मयोग की शिक्षा देते हुए कहा कि हे अर्जुन ! योग में स्थित होकर सब प्रकार की आसक्तियों का परित्याग करके तथा सफलता और असफलता में समभाव बने रहना ही ‘योग’ है। तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने तक ही सीमित है, फल प्राप्ति की कामना करना तुम्हारी सार्मथ्य से परे है। इसलिए कभी भी फल के लोभ में न आओ। कर्ता का सम्बन्ध केवल कर्म से है। किसान का अधिकार अपने खेत में श्रम करने तथा मनोनुकूल बीज बोने तक सीमित है। इच्छानुकूल फल प्राप्ति उसकी सार्मथ्य से परे है। अच्छा है कि हम किसी लाभ, यश या प्रतिष्ठा का भाव अपने मन में न आने दें, क्योंकि फल प्राप्ति केवल हमारे श्रम पर ही निर्भर न होकर दैहिक तथा भौतिक शक्तियों से संचालित होती है। फलासक्त व्यक्ति अपने अभीष्ट की सिद्धि में विलम्ब या विफलता देखकर कार्य से विमुख हो सकता है। बहुत से साधक अपने कर्तव्य को दु:ख रूप या बन्धन रूप समझ कर उसका त्याग कर देते हैं। यह ठीक नहीं है। जीव स्वभावत: दो प्रकार के होते हैं – अंतर्मुखी तथा बहिर्मुखी। अंतर्मुखी प्रतिभा के व्यक्ति बाहरी संसार से तथा भौतिक सुखों से विरक्त रहते हुए अपनी अंतरात्मा के सम्यक विकास के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। इसी को ज्ञानयोग, निवृत्ति मार्ग या संन्यास पथ कहते हैं। बहिर्मुखी प्रतिभा का व्यक्ति भौतिकता में आसक्त होकर विविध सांसारिक कार्यों में लिप्त रहता है। इसी को प्रवृत्ति मार्गी या कर्मयोग कहते हैं। यथार्थ में ये दोनों मार्ग एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि कोई भी मनुष्य न पूर्णतया अंतर्मुखी हो सकता है और न पूर्णतया बहिर्मुखी। प्राय: सभी प्राणी कुछ अंशों में बहिर्मुखी होते हैं। निष्काम कर्म, ज्ञान से श्रेष्ठ है और सरल भी। कोई भी व्यक्ति क्षणभर के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के स्वाभाविक गुणों से विवश होकर प्रत्येक को कुछ न कुछ कर्म करना ही पड़ता है। जीवन के रहते हुए कर्म से बचना असम्भव है। श्रद्धा की अनुभूति को ही ‘भक्ति’ कहते हैं। सांसारिक विषय- वासनाओं तथा इन्द्रिय लोलुपता का अभाव भक्त की प्रथम आवश्यकता है, क्योंकि प्रेम में द्वैत का भाव सदा के लिए मिट जाता है। लौकिकता के रहते हुए अलौकिकता की उपलब्धि सम्भव नहीं है। भगवान के प्रति प्रेम में जितनी अधिक अनन्यता तथा प्रगाढ़ता होगी, भक्ति का उतना ही अधिक उत्कर्ष होगा। परमात्मा से योग करने वाली इस अनन्य भक्ति को ही ‘भक्तियोग’ की संज्ञा दी गई है। लेकिन अन्त में जैसे सभी सरिताएँ सागर में मिलकर सागर बन जाती हैं, ठीक उसी प्रकार से प्रारम्भ अनेक हैं, पर अन्त एक है ..!

? “पूज्यश्री जी” ने कहा – सत्कर्म निष्काम भाव से करें। निष्काम भाव से कर्म करना ही श्रेष्ठ। लक्ष्य बनाएँ और परिणाम तक पीछा करें। “पूज्य प्रभुश्री” का कहना है कि व्यक्ति को उत्साहपूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। यह जीवन अंतहीन सम्भावनाओं से भरा है, अतः युवाओं सहित सभी व्यक्तियों को प्रयोगवादी बनना चाहिए। अपने लक्ष्य तय करना चाहिए और सफल परिणाम आने तक लक्ष्य का पीछा करना चाहिए। मन-वचन-कर्म में एकता, भाव-शुचिता, सत-कर्म प्रीति और समर्पण ही साधना सार। ईश्वर के स्मरण से मिलेगी – शान्ति। “पूज्य प्रभुश्री” सहज शान्ति की खोज करने वालों को ईश्वर के स्मरण की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि वाह्य जगत अस्थिर क्षणभंगुर और पल-पल बदलने वाला है। निरन्तर बदलती घटनाएँ, परिस्थितियाँ, दृश्य और व्यक्ति शाश्वत नहीं हैं। अतः जीवन में सहजता, शान्ति और निर्भयता की प्राप्ति के लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर का सदैव स्मरण करते रहना चाहिए। सफलता के लिए मन से भय को निकालें। “पूज्य प्रभुश्री” ने कहा कि कई लोगों का कहना है कि वे मन से थक गए हैं। यही मन का थकना उन्हें सफलता से दूर कर देता है। मन में किसी दु;ख या भय के कारण व्यक्ति प्रायः मन से थकता है। सफलता के लिए हमें मन और मष्तिष्क दोनों को चुस्त-दुरुस्त और उत्साहित रखना चाहिए। इसलिए मन से भय को निकाल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि समन्वित प्रयास से असम्भव बन जायेगा – सम्भव। संसार के समस्त श्रेष्ठ और महान कार्य समन्वित प्रयासों से ही सिद्ध होते हैं। इसलिए महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समन्वित और एकीकृत रहें। इसलिए एकता में बड़ी सामर्थ्य निहित है, जो कठिन को सरल और असम्भव को भी सम्भव बना सकती है …।

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