मप्र बीजेपी में यह बेचैनी का दौर है। कोई पद नहीं मिलने से बेचैन है तो किसी को वजन व कद घटने की फिक्र है।
फिक्रमंद वे भी हैं,जिन्हें आयातित नेताओं ने रिप्लेसड कर दिया या वे अधिक प्रभावी भूमिका में आ चुके हैं। मालवा में कैलाश,महाकौशल में अजय विश्नोई,निमाड़ में नागर सिंह तो बुंदेलखंड में भूपेंद्र सिंह,गोपाल भार्गव अपनी भावनाएं व्यक्त करते रहे है।
वहीं, ग्वालियर-चंबल व विंध्य में मूल वर्सेज आयातित के बीच जारी शीतयुद्ध किसी से छिपा नहीं है। शेष चुप्पी साधे ‘तेल’ व इसकी धार माप रहे हैं।
** सताई 2029 की चिंता
2029 के लोकसभा चुनाव में दो बड़े बदलाव होंगे। पहला महिलाओं को संसद में 33 फीसद आरक्षण तो दूसरा वन नेशन,वन इलेक्शन। पुरुषवादी सोच सियासी दलों में भी हावी रही। इसके रहते महिलाओं को आगे आने के अपेक्षाकृत कम ही अवसर मिले।अब मजबूरी है। न सिर्फ नेतृत्व बल्कि जिताऊ चेहरे भी तैयार करने की। मप्र में दो दलीय राजनीति होने से ज्यादा दिक्कत कांग्रेस के समक्ष है। ‘देर आए दुरुस्त आए’ वाले अंदाज में कांग्रेस भी इसे लेकर अब सचेत है। हाल ही में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने पार्टी के एक कार्यक्रम के बहाने इसका खुलासा भी किया।
वहीं,बीजेपी ने अंदरखाने इसकी तैयारी काफी पहले शुरू कर दी थी। इस नाते,वह अन्य दलों से बेहतर स्थिति में मानी जा सकती है,लेकिन जातिगत आधार पर महिला नेतृत्व का संकट यहां भी है।
पिछला भोपाल महापौर चुनाव इसकी बानगी है। जब विधायक कृष्णा गौर के हाथ खड़े करने और शीर्ष नेतृत्व के अपनी गाइड लाइन पर अडिग रहने से,पार्टी को राजधानी में दूसरा ओबीसी महिला चेहरा तलाशने में पसीना आ गया था।
** दुर्गावती के बहाने
सरकारी योजनाएं,कार्यक्रम देखने,सुनने में भले जनकल्याण से जुड़े लगें,लेकिन इनके सियासी निहितार्थ से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
मप्र की मोहन सरकार ने गौंड शासक रही रानी दुर्गावती की जयंती कुछ ज्यादा ही धूमधाम से मनाई। वीरांगना की राजधानी रहे सिंग्रामपुर में कैबिनेट बैठक के इतर भी कई अन्य आयोजन हुए। हितग्राहीमूलक योजनाओं से जुड़ीं महिलाओं को साधने के साथ ही,एसएचजी की बहनें भी कार्यक्रम में जुटीं।
दुर्गावती से जुड़े अनेक फैसले तो हुए ही,मोटे अनाज का उत्पादन बढ़ाने वाली श्री अन्न प्रोत्साहन योजना भी शुरू हुई। यही नही,पहली बार किसी योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए सलाहकार समिति भी गठित हुई। जाहिर है,मंशा दुर्गावती के बहाने आदिवासी महिला वर्ग में पैठ बढ़ाने के साथ ही इस वर्ग से महिला नेतृत्व तैयार करना भी है, जिनका पार्टी में अभी खासा टोटा है।
………………. ** बाकी सब इवेंट हाईकोर्ट की नाराजगी और आदेश के बाद सरकार नर्मदापुरम कलेक्टर सोनिया मीणा के खिलाफ अब तक कोई एक्शन नहीं ले पाई। लोनिवि मंत्री राकेश सिंह अपने विभाग में कंसलटेंट नियुक्ति को लेकर गड़बड़ी की जांच इसलिए नहीं करवा सकते,क्योंकि एसीएस व ईएनसी यह नही चाहते।
भोपाल के एक टीआई से जुड़े मामले में फैसला नहीं कर पाने पर हाईकोर्ट को होम एसीएस,डीजीपी से कहना पड़ा कि इतना नहीं कर सकते तो नौकरी छोड़ दो। इंदौर के एक पूर्व विधायक अश्विन जोशी गोली चालन के आरोप से इसलिए बरी हो गए क्योंकि पुलिस ने केस डायरी ही गुमा दी। कोर्ट ने इस षड़यंत्र करार देते हुए लापरवाह पर एक्शन लेने को कहा।
खुन्नसवश एक रोजगार सहायक की नौकरी छीने जाने के मामले में कोर्ट को नजरअंदाज करने पर न्यायालय को धार कलेक्टर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करना पड़ा। राजस्व से जुड़े एक केस में हाईकोर्ट को जबलपुर के अफसरों से कहना पड़ा कि वे गुंडों की तरह काम नहीं कर सकते। केस से जुड़े कलेक्टरों से वसूली के आदेश भी न्यायालय ने दिए।
ये कुछ बानगियां हैं,गुजरते सप्ताह के घटनाक्रमों की। मप्र में ‘सुशासन’की हकीकत यही है। बाकी तंत्र में जो’हरा-भरा’दिख रहा, उसमें ज्यादातर इवेंट का हिस्सा है।
** ईमानदारी का सम्मान
ईमानदारी,मेहनत व शराफत की जीत हमेशा हुई है। ईमानदारी अपने दायित्व के प्रति और मेहनत अपनी छवि को बेदाग रखते हुए इसे निखारने की। मप्र कैडर में साल 1989 बैच के आइएएस अनुराग जैन इसका उदाहरण हैं। जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत,काम के प्रति सर्मपण व ईमानदारी से यह मुकाम पाया।
दिल्ली जाने से पहले मप्र में रहे तो सरकार के पसंदीदा अफसर रहे। दिल्ली पहुंचे तो अपने काम से ऐसी धाक जमाई कि वहां दस साल बिता दिए। इस दौरान वह पीएमओ की भी पसंद बने।
जैन मप्र के संभवतया पहले आइएएस,जिन्होंने कलेक्टर रहते हुए संबंधित तीनों जिलों के अधिकांश गांवों का दौरा किया। वर्षों पहले एक कलेक्टर के तौर पर आमजन के प्रति उनका जो आत्मीय भाव था,वह आज भी कायम है। सीहोर के किसानों का हाल ही में मंत्रालय पहुंचकर प्रदेश के नए सीएस को सम्मान स्वरूप पगड़ी पहनाना व हल भेंट करना,इसका उदाहरण है।
वर्ना कुछ अफसर ऐसे भी हुए,जिन्होंने सीएस बनते ही जनसामान्य से भेंट का सिस्टम ही खत्म कर दिया था।
एक दौर में आम जन के लिए मुख्यमंत्री निवास के द्वार खुलवाने का श्रेय भी जैन को ही जाता है। तब मुख्यमंत्री निवास में कोटवारों ने भी भोजन किया तो मोचियों व राज मिस्त्रियों ने भी। बहरहाल,जैन की आमद से मंत्रालय का माहौल भी बदला है और मिजाज भी।
** कायम है हस्तक्षेप
मप्र दुग्ध महासंघ समेत अन्य संघों को प्रबंधन बीते माह सरकार ने पांच सालों के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड यानी एनडीडीबी को सौंप दिया। विभाग के तत्कालीन पीएस गुलशन बामरा ने इसका विरोध किया तो उन्हें विभाग से चलता कर दिया गया,लेकिन बामरा का नाम एनडीडीबी में बतौर संचालक अब भी दर्ज है।
बोर्ड की वेबसाइट तो यही बताती है।अब इसे लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं जो बोर्ड महीने भर में अपनी वेबसाइट दुरुस्त नहीं कर सका,वह ‘सांची’के दिन कैसे बहुरेगा? बहरहाल,बामरा का नाम तो बोर्ड की वेबसाइट से देर-सबेर हटना ही है,लेकिन सांची का प्रबंधन बदले जाने से उन अफसरों को भी बड़ा नुकसान हुआ,जिनके घर हर रोज दूध व महीने में मावा,घी मुफ्त पहुंचते रहा।
**पुनर्वास की आस
अति महत्वाकांक्षी होना भी कई बार दु:ख का कारण बनता है। निवर्तमान मुख्य सचिव वीरा राणा को भी रिटायरमेंट बाद किसी बेहतर पद पर अपने पुनर्वास की पूरी आस रही। इसके चलते वह अपनी सेवानिवृति के अगले ही दिन प्रदेश के मुखिया से भी मिलीं,लेकिन यह मीटिंग महज सौजन्य भेंट बनकर रह गई।
पुनर्वास की चाहत तो और रिटायर्ड अधिकारियों की भी है। इनकी फेहरिस्त लंबी है। कुछ ने आवेदन कर रखें हैं और किसी को बुलावे का इंतजार है। जहां पुनर्वास हो सकता है,उनमें राज्य निर्वाचन आयोग,सिया,राज्य महिला आयोग व सूचना आयोग शामिल हैं।
** अब पुण्यतिथि का इंतजार
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वतंत्रता की लड़ाई में 11 बार जेल गए। अपने जीवन के 2 हजार 338 दिन उन्होंने जेलों में बिताए।इस दौरान उन्होंने जेलों की व्यवस्था में सुधार को लेकर भी आवाज उठाई। शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुए मप्र जेल विभाग,जेलों में सुधार से जुड़े कानून ‘मध्य प्रदेश सुधारात्मक सेवाएं और बंदीगृह अधिनियम 2024’ को गांधी जयंती यानी दो अक्टूबर से लागू करने की तैयारी में रहा,लेकिन सियासी कारणों से ऐसा हो नहीं सका।
दरअसल,गांधी जयंती पर सरकार की खासी व्यस्तता रही। इसके चलते जेल सुधार प्रोग्राम को आगे टालना पड़ा। विभाग के नए नोटिफिकेशन के अनुसार अब इसे जनवरी में लागू करने की तैयारी है। इसी माह में ‘बापू’की पुण्यतिथि भी है। यानी कैदियों को अभी दो- ढाई महीने और मौजूदा व्यवस्था से ही काम चलाना पड़ेगा।
** माफिया सब पर भारी
क्रशर व लकड़ी माफिया प्रदेश में कितना प्रभावी है,राजधानी से सटा रातापानी टाइगर रिजर्व इसकी बानगी है। रातापानी को टाइगर रिजर्व घोषित करने केंद्र ने 2008 में अपनी सैद्धांतिक सहमति दी। पिछले जून में मोहन सरकार कैबिनेट ने इसके गठन को मंजूरी दे दी।
एनटीसीए बार-बार राज्य के वन अफसरों को पत्र लिखकर रातापानी को टाइगर रिजर्व अधिसूचित करने की याद दिलाते रहा। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने बीते माह एक बार फिर समीक्षा बैठक में अपने मिजाज का हवाला देते हुए वन अधिकारियों को अधिसूचना जारी न होने पर फटकार भी लगाई।
बावजूद इसके रातापानी अब तक सिर्फ कागजों में ही टाइगर रिजर्व बना हुआ है।
** 93 बैच की लॉटरी
मप्र आइएएस संवर्ग के 93 बैच में कुल जमा पांच अफसर हैं। इनमें चार का जन्मवर्ष एक ही है। पांचों को ही पांच माह में पदोन्नति भी मिल गई या मिलने जा रही है।
गत 30 सितंबर को 89 बैच के आशीष उपाध्याय की सेवानिवृति पर नीरज मंडलोई (Photo) एसीएस बने। मंडलोई मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री भगवंत राव मंडलोई के पोते व 1974 बैच के आइएएस विनोद कुमार मंडलोई के बेटे हैं। यानी मंडलोई परिवार की तीसरी पीढ़ी मप्र की सेवा में है।
बैच में सीनियर मोस्ट संजय दुबे बीते माह ही पदोन्नति पा चुके हैं।अगले तीन माह में इसी बैच के अनुपम राजन,अनिरुद्ध मुखर्जी व दीप्ति गौड़ मुखर्जी भी मुख्य सचिव पद का वेतनमान पाने वालों की श्रेणी में शामिल होंगे। मौजूदा वित्तीय वर्ष की शेष अवधि यानी 31 मार्च तक रिटायर होने वालों में पंकज राग,मलय श्रीवास्तव,एसएन मिश्रा व अजीत केसरी शामिल हैं।
एमपी के अफसरों पर भरोसा सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय का मप्र के आइएएस अफसरों से गहरा नाता है। विभाग के सचिव रहे अनुराग जैन की मप्र के मूल कैडर में वापसी पर अब मप्र के ही एक अन्य अधिकारी पंकज अग्रवाल को इस मंत्रालय में सचिव पद का दायित्व सौंपा गया है।
1992 बैच के अधिकारी पंकज अग्रवाल वर्तमान में केंद्र में उर्जा सचिव हैं। उर्जा के साथ ही उन्हें सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय में सचिव पद का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया।