आत्मग्लानि ही सच्ची आत्मशुद्धि है।

0
Spread the love

मुझे याद है जब शुरू में एकादशी व्रत का संकल्प लिया तो किशोर वय उम्र थी, सुबह सुबह यदा कदा कुछ मुंह में अनाज डल गया या दिन में तो मैं उस दिन तो वृत्त रखता पंरतु दुसरे दिन भी बारस को रखता ताकि अगली बार मुझे याद रहे,,,इसे हम आत्मग्लानि भी कह सकते हैं।
अनजानी गलती और उससे स्वयं के किसी नियम, परम्परा, रिवाज , अनुशासन के टुटने से स्वयं को पिडा पहुंचे तो हम आगे सुधार करे।
भगवान का प्रसाद आपने लिया गृहण किया,किस भाव से लिया शुद्धता के भाव से, गलती आपकी नहीं है अगर ग़लती हुई तो आपका दोष नहीं, पंरतु आप आत्मग्लानि रखें ताकि आगे आपको यह मलाल ना रहे।
भगवान को चढ़ाया गया प्रसाद आपको मिल रहा आपका वृत्त है आप देने वाले के हाथ को छुकर माथे पर अपना हाथ रखकर झुक जाए माना जायेगा आपने गृहण किया,,,
तिरुपति बालाजी मंदिर में जिन्होंने प्रसाद पाया अगर मन में आत्मग्लानि आ रही तो स्वयं को दुखी ना करें,,, अपितु यह करें कि स्वयं के हाथों से रोटी बनाकर उसके साथ चना तथा गुड़ रख गौमाता को खिला दिजिए,,,आपका शुध्दिकरण नहीं अपितु मन का विकार तथा अनजाने में ही हुवे गलत खान पान का दोष मिट जायेगा।
भीम को विष दिया गया,,, अनजाने में खाया,,
मीरा को जहर प्रसाद रुप में मिला उन्होंने भाव से गृहण किया,,,भाव महत्वपूर्ण है और भाव कारण आत्मग्लानि महसूस हुईं तो यह करे आगे देखेंगे ईश्वर आत्मग्लानि दूर कर देंगे।।।।
सबको राम राम
प्रमोद कुमार व्दिवेदी एड्वोकेट नंबर 9826093634

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481