अफसरों की मिलीभगत से मुआवजे का ‘सौदा’
मध्यप्रदेश के सिंगरौली के 33 गांवों से होकर जाने वाले प्रयागराज नेशनल हाईवे के बीच खड़ी मुआवजा इंडस्ट्री दलालों और अफसरों के गठजोड़ से फल-फूल रही है। सिंगराैली कलेक्टोरेट और तहसील से ऐसे ही कुछ दलालों से संपर्क किया, जो सिर्फ मुआवजा वाली जमीनों का सौदा कराते हैं। ये 4 गुना मुआवजे की गारंटी लेते हैं। ऐसे ही एक दलाल ने हमारे लिए उसी गांव में एक जमीन का इकरारनामा कराया, जहां सबसे ज्यादा मुआवजा घर बने हैं।
चितरंगी में हाईवे प्रोजेक्ट वाली जमीन पर मुआवजा इंडस्ट्री की पड़ताल करने के लिए सिंगरौली कलेक्टोरेट से लेकर चितरंगी तहसील तक कई जगह एजेंटों से बात की। निवेश के उद्देश्य से जमीन खरीदने की इच्छा जताई तो हर जगह एजेंटों ने अलग-अलग प्रोजेक्ट्स की मार्केटिंग की।
चितरंगी के हाईवे प्रोजेक्ट की जमीन का सौदा हमने सुकेश नाम के एजेंट के जरिए किया। उसने हमारी चितरंगी के ‘गुप्ता जी’ से बात कराई। गुप्ता जी ने मुआवजे की जद में आने वाले मकान के ऊपर निर्माण कराने और उस पर मिलने वाले मुआवजे का 80% पैसा लौटाने का सौदा किया। हालांकि, हमने यह सौदा नहीं किया।
इसके बाद दूसरे एजेंट की मार्फत बड़कुड़ पहुंचे। ये वही गांव है, जहां कई मुआवजा घर बने हैं। एजेंट ने हमारे लिए इसी गांव की जमीन का इकरारनामा करवाया।

जहां सबसे ज्यादा मुआवजा घर बने, वहीं इकरारनामा
रिपोर्टर : ये एक लाइन से मकान कैसे बने हैं? एजेंट : ये जमीन हाईवे में आ रही है। मुआवजे के लिए गांव के लोगों ने बनवा लिए हैं। रिपोर्टर : जमीन का पैसा मिलेगा, फिर ये घर क्यों? एजेंट : जमीन का पैसा कम मिलेगा। घर का ज्यादा। कई लोगों ने तो जमीन बेच दी। कई लोग 20% पर बाहरी लोगों को दे रहे हैं। (एक लाइन से बने घर दिखाते हुए) ये जो 32 घर हैं… बनारस के मिश्रा ने बनवाए हैं। रिपोर्टर (किसान से) : आपने घर नहीं बनवाए? किसान : बनवाए हैं। लेकिन काफी जमीन बची है। रिपोर्टर : हमारा भी कुछ जुगाड़ करवा दीजिए। किसान : यहां सब यही कर रहे हैं। हाईवे की लाइन में अब भी मेरी जमीन का एक नंबर खाली पड़ा है। सर्वे हो चुका है। मुआवजा मिलना पक्का है। आप पैसा लगाकर मकान बनवा लो। मुआवजा मिलेगा तो 20% रखकर आपको 80% दे देंगे। बाकायदा लिखा-पढ़ी करवाएंगे। रिपोर्टर : ठीक है। फिर कल तहसील चलकर इकरारनामा बनवा लेते हैं। (अगले दिन भास्कर रिपोर्टर ने बड़कुड़ गांव के एक किसान की हाईवे में आ रही जमीन के प्लॉट नंबर 187 का इकरारनामा बनवाया। भास्कर के पास इस सौदे का वीडियो भी है।)



कलेक्टोरेट के बाहर एजेंटों का गैंग, 4 गुना मुआवजे की गारंटी
सिंगरौली में कलेक्टोरेट के बाहर जब जमीन खरीदने और निवेश की इच्छा जताई, तो तीन-चार लोग आ गए। एक अपने ऑफिस ले गया। उसने हमें बताया कि अडाणी ग्रुप चितरबईकलां, अमिलिया, पिड़वार, बंधा जबकि एनसीएल पड़री, चिनगी टोला, तिलहद में प्रोजेक्ट ला रहा है।
उसने कहा- इन जगहों पर जमीन ले लो। चार गुना मुआवजे की गारंटी है।
बरसों से डटे अफसर, चुनाव में हटाया भी तो दो-तीन महीने में फिर वापसी
सिंगरौली जब से सीधी से अलग होकर जिला बना, तब से यहां मुआवजे को लेकर अफसरों और बाबू की नजरें इनायत होने लगीं। पड़ताल में पता चला कि ये ऐसे अफसर हैं, जो बरसों से यहीं डटे हैं। एक अफसर तो ऐसे हैं, जो नायब तहसीलदार से डिप्टी कलेक्टर तक यहीं प्रमोट हुए। सिर्फ चुनाव के दौरान इन्हें हटाया जाता है। दो और अफसर ऐसे हैं, जो यहां 5 या इससे अधिक बार पोस्टिंग ले चुके हैं।
अफसरों के अलावा ऐसे बाबू भी हैं, जो 12 से 20 साल तक एक ही कुर्सी पर जमे हैं। आरोप लगते रहे हैं कि यही चेन मुआवजे का खेल खेल रही है। नेताओं का दबाव आता है, तो ये उन्हें भी मुआवजे की लिस्ट में शामिल कर खुश कर देते हैं। यही वजह है कि पिछले एक दशक में करीब 5 परियोजनाओं में ही 740 करोड़ का मुआवजा घोटाला विधानसभा और लोकसभा तक छाया रहा।
ये दो अधिकारी, जो बार-बार जिले में ही घूमते रहे…
विकास कुमार सिंह : 8 साल में 6 पोस्टिंग
- 10 अगस्त 2015 से जुलाई 2016 तक- देवसर
- अगस्त 2016 से जुलाई 2018 तक -सिंगरौली
- जुलाई 2019 से अक्टूबर 2019 तक -सिंगरौली
- अक्टूबर 2019 से जनवरी 2022 तक -देवसर
- अप्रैल 2022 से सितंबर 2022 तक -चितरंगी
- सितंबर 2022 से जुलाई 2023 तक -देवसर। 2023 में चितरंगी के भी संयुक्त कलेक्टर रहे।
राजेश शुक्ला : 8 साल में 5 पोस्टिंग
- देवसर तहसील में 1 जनवरी 2016 से 6 अक्टूबर 2017 तक।
- माड़ा न्यायालय में 27 अक्टूबर 2017 से जुलाई 2018 तक।
- 30 अक्टूबर 2018 से 10 अगस्त 2018 तक माड़ा में संयुक्त कलेक्टर
- 30 जुलाई 2021 को फिर संयुक्त कलेक्टर बने।
- पांचवीं बार 31 जुलाई 2023 से 24 दिसंबर 2023 तक सिंगरौली संयुक्त कलेक्टर रहे।
और ये बाबू 12 से 20 साल तक जमे…
मुनेंद्र मिश्रा : देवसर में 20 साल रहे। ईओडब्ल्यू में मामले भी दर्ज हैं। दो साल पहले चितरंगी भेजा गया।
आशुतोष द्विवेदी, सहायक ग्रेड-2 : कलेक्टर के यहां 2012 से पदस्थ।
अशोक कुमार मिश्रा, प्रवाचक : अपर कलेक्टर के यहां 2012 से पदस्थ।

एक्सपर्ट व्यू : भू-अर्जन करने वाले विभागों की मिलीभगत से फर्जी मुआवजा ले रहे
रिटायर्ड डिप्टी कलेक्टर श्रीराम तिवारी कहते हैं कि मप्र में भू-अर्जन एक्ट 2013 के प्रावधान लागू है लेकिन पालन नहीं होता। किसी भी परियोजना के शुरू होने का प्रस्ताव मिलते ही कलेक्टर या शासन को इन क्षेत्रों में खरीद-फरोख्त की रोक लगा देनी चाहिए। इसके लिए अधिसूचना जारी की जाती है। नगरीय निकाय को इन जगहों पर निर्माण रोकने चाहिए।
वर्तमान भूमि डायवर्सन के प्रकरण भी स्वीकृत नहीं होने चाहिए लेकिन मप्र में ऐसी कोई व्यवस्था ही लागू नहीं है। रोक नहीं लगने की वजह से अधिग्रहण वाले क्षेत्रों में कच्चे-पक्के निर्माण होते रहते हैं और इनका भारी-भरकम मुआवजा प्राप्त कर लिया जाता है। भू-अर्जन करने वाले विभाग की मिलीभगत रहती है, इसलिए समय रहते शासन-प्रशासन से परियोजनाओं वाले क्षेत्रों में जमीनों की खरीद-फरोख्त व निर्माण पर रोक लगाने का अनुरोध नहीं करते।
