अंधेर नगरी मोहन राजा? -प्रकाश कुमार सक्सेना

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जनसंपर्क संचालनालय में सूचना का अधिकार के तहत अवलोकन के लिये लोक सूचना अधिकारी श्री अखिल परस्ते ने मुझे कल दोपहर तीन बजे का समय दिया था। मैं वहां पहुंचा तो वे नहीं मिले। तीन बजे से लगभग पौने छः बजे तक (सी.सी. कैमरे इस बात के गवाह हो सकते हैं)। लगभग साढ़े पाँच बजे उनका एक मातहत कर्मचारी मात्र एक रजिस्टर जिसमें सिर्फ विज्ञापन आदेशों की प्रविष्टियां थीं, दिखाने लगा। मैंने कहा कि भाई वो वृहद जानकारी और उससे संबंधित दस्तावेज कहां हैं? उसने कहा सिर्फ यही है। जो जानकारी सिर्फ कुछ पृष्ठों में दी जा सकती थी उसे वृहद बताकर सिर्फ एक रजिस्टर दिखाना जिसमें वो दस्तावेज थे ही नहीं जो चाहे गये थे। और फिर मुझे बुलाकर लोक सूचना अधिकारी का गायब रहना? ऐसा क्यों किया? ये सवाल आपके मन में भी उठ सकता है?
तो जवाब यूं है कि जो जानकारी मैंने मांगी थी वो श्री परस्ते के वरिष्ठ अधिकारी संयुक्त संचालक श्री पंकज मित्तल से संबंधित है। गड़बड़झाला तो है? इसलिये कनिष्ट अधिकारी क्या करे? मुझे लगता है कि शायद इसीलिये लोक सूचना अधिकारी वहां से नदारत रहे।
अब बात आती है कि आखिर जानकारी में ऐसा क्या था कि विभाग को ऐसे प्रपंच रचना पड़े? तो आपको बता दूं कि चाही गई जानकारी में मैंने श्री मित्तल की पत्रिका को सन् 2021 में जारी विज्ञापन और उसका आदेश क्रमांक देते हुए उससे संबंधित उस समय संलग्न किये दस्तावेज और नोटशीट की सत्यापित प्रतियां मांगी थीं। और इसके साथ ही उनकी पत्रिका के संपादक की संस्था जिसके श्री मित्तल भी सहभागी हैं, को जारी तीन विभिन्न विज्ञापनों की तारीख और आदेश क्रमांक देते हुए नोटशीट की सत्यापित प्रति मांगी थी। क्या यह वृहद स्तर की जानकारी थी? क्या ये दस्तावेज एक रजिस्टर में मात्र प्रविष्टि के रूप में हो सकते थे? मुझे मालूम था कि ऐसा ही कुछ किया जा सकता है इसलिये मैंने शुल्क जमा कराते समय ही एक चिट्ठी दी थी। आवक जावक से पावतियां लेना आजकल मुश्किल कर दिया गया है। मुझे भी पावती नहीं दी। खैर लोक सूचना अधिकारी के नदारत रहने पर वो कर्मचारी श्री मित्तल के पास गया। उन्हें एक टीप के साथ कर्मचारी द्वारा यह कहलवाया कि जानकारी जिस रूप में है उसी रूप में दी जावेगी। हालांकि तब उनके हस्ताक्षर उस पर नहीं थे। रजिस्टर में दस्तावेज थे ही नहीं, सो हमने भी अपनी टीप लिखी और निकल आये।
स्पष्ट है जो जानकारी मेरे सामने रखी ही नहीं गई उसके अवलोकन के लिये शुल्क के नाम से मुझसे पचास रुपये और इतना समय झटक लिया गया? वैसे इनके लिये ऐसा करना कोई नयी बात नहीं है। पहले भी इन्हीं आयुक्त श्री मनीषसिंह के समय इन्हीं के निर्देश पर जानकारी रोकी गई थी, और वह भी ऐसी जानकारी जो इनके तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी ने माना था कि वो दस्तावेज हैं ही नहीं, बाद में शेष दस्तावेजों के लिये की गई अपील के समय संभवतः कूटरचित तरीके से बनाकर बताई गई और जो निशुल्क दी जानी थी उसके 6306/-रुपये जमा कराने के बाद भी दी नहीं गई।
तो मुख्यमंत्री के इस विभाग में ऐसे घोटाले बहुत आम हैं, हर प्रभाग में हैं और ऐसे घोटालों को संरक्षित रखने के लिये ही शायद ऐसी तेजतर्रार ब्यूरोक्रेसी की पदस्थापना यहां की जाती है?
वैसे भी जनसंपर्क विभाग सिविल सेवा आचरण नियमों, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जैसे कानूनों को मानता ही नहीं। यहां भ्रष्टाचार कुटीर उद्योग की तरह संरक्षित है। यह भ्रष्टाचार करने वालों और उसकी जांच करने वालों का संगम है। यहां निचले कर्मचारियों, अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री तक किसी न किसी रूप में लाभार्थी हों? वहां चौपट राज ही कायम होना है? ऐसी शिकायतें मय दस्तावेजों के कई वर्ष पहले कर चुका हूं। और प्रधानमंत्री कार्यालय का भी आशीर्वाद इनके भ्रष्टाचार को प्राप्त है। मैंने पहले भी उज्जैन गैंग का जिक्र किया था। अब वक्त आ गया है सरकारी धन की संगठित लूट को जनता के सामने लाने का। जिसमें सत्तारूढ़ दल से संबंधित संगठनों और नेताओं का भी योगदान सामने आयेगा। बस एक-दो दिनों में ही।

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