सार्वजनिक स्थल पर तलवार घुमाना भी अपराध है?

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सार्वजनिक स्थल पर तलवार घुमाना भी अपराध है?

झोला छाप ख़बरी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह मानी जाती है कि कानून सबके लिए बराबर होता है। चाहे वह आम नागरिक हो या सत्ता के शिखर पर बैठा कोई बड़ा नेता। लेकिन जब व्यवहार में यह बराबरी दिखाई नहीं देती, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। हाल ही में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री Mohan Yadav एक सार्वजनिक कार्यक्रम में तलवार लहराते नजर आए। तस्वीरें और वीडियो सामने आए तो लोगों के मन में एक सहज सवाल पैदा हुआ क्या सार्वजनिक स्थान पर तलवार घुमाना कानूनन सही है?

भारतीय कानून इस मामले में काफी स्पष्ट है। सार्वजनिक स्थानों पर हथियारों का प्रदर्शन या उनका उपयोग सामान्यतः प्रतिबंधित माना जाता है, खासकर तब जब वह कानून-व्यवस्था को प्रभावित कर सकता हो या किसी तरह का डर और असुरक्षा पैदा करता हो। पुलिस अक्सर ऐसे मामलों में आर्म्स एक्ट और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई करती है। कई बार तो केवल सोशल मीडिया पर हथियार के साथ फोटो डालने भर पर भी पुलिस लोगों को थाने बुला लेती है।

यही वजह है कि जब किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के हाथ में सार्वजनिक मंच पर तलवार दिखाई देती है और पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या कानून की धाराएं केवल आम लोगों के लिए ही तेज होती हैं?

अक्सर देखा गया है कि शादी-ब्याह, जुलूस या किसी उत्सव में अगर कोई आम व्यक्ति तलवार या अन्य हथियार लहराता हुआ दिख जाए तो पुलिस तुरंत सक्रिय हो जाती है। कई बार तो बिना देर किए केस दर्ज कर लिया जाता है। पुलिस यह तर्क देती है कि इससे सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है या किसी दुर्घटना की आशंका रहती है। लेकिन वही नियम सत्ता के गलियारों के सामने अचानक ढीले क्यों पड़ जाते हैं?

यह सवाल केवल किसी एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता की ओर इशारा करता है जहां सत्ता और कानून के बीच एक अघोषित दूरी बन जाती है। लोकतंत्र में पुलिस का काम केवल कानून लागू करना होता है, न कि व्यक्ति के पद और प्रभाव को देखकर उसका वजन तय करना।

कई बार समर्थक यह तर्क देते हैं कि तलवार सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक होती है। विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मान स्वरूप तलवार भेंट करने या उसे उठाकर अभिवादन करने की परंपरा भी रही है। यह बात अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन कानून का मूल सिद्धांत यही है कि परंपरा और कानून के बीच संतुलन बना रहना चाहिए। अगर वही काम कोई आम नागरिक करता है और उसे अपराध मान लिया जाता है, तो फिर वही नियम सत्ता के प्रतिनिधियों पर भी लागू होना चाहिए।

दरअसल समस्या केवल तलवार घुमाने की नहीं है, बल्कि उस संदेश की है जो समाज में जाता है। जब जनता देखती है कि नियम अलग-अलग लोगों के लिए अलग तरीके से लागू हो रहे हैं, तो कानून के प्रति भरोसा कमजोर होता है। कानून का सम्मान तभी बनता है जब वह बिना भेदभाव के लागू हो।

पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता होती है। अगर पुलिस किसी घटना को केवल इसलिए नजरअंदाज कर दे क्योंकि उसमें कोई प्रभावशाली व्यक्ति शामिल है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता। पुलिस को यह भी समझना होगा कि आज के समय में हर घटना कैमरे में कैद हो जाती है और समाज तुरंत सवाल पूछने लगता है।

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या कानून की धाराएं केवल आम नागरिकों के लिए हैं? अगर सार्वजनिक स्थल पर हथियार लहराना गलत है तो वह हर व्यक्ति के लिए गलत होना चाहिए। और अगर यह परंपरा के नाम पर स्वीकार्य है, तो फिर आम नागरिकों के मामलों में भी उसी दृष्टि से विचार होना चाहिए।

लोकतंत्र में कानून की असली ताकत उसकी समानता में होती है। जब तक यह समानता व्यवहार में नहीं दिखेगी, तब तक ऐसे सवाल उठते रहेंगे और उठने भी चाहिए। क्योंकि सवाल पूछना ही लोकतंत्र को जीवित रखता है।

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