कल सदन में “श्वानों” द्वारा बच्चों और बुज़ुर्गोँ के साथ हिंसा किये जाने का मुद्दा उठा।

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?अगिया बेताल ?
क़मर सिद्दीक़ी
भोकना बंद करिये, ये हमारा काम है
कल सदन में “श्वानों” द्वारा बच्चों और बुज़ुर्गोँ के साथ हिंसा किये जाने का मुद्दा उठा।
उसी विषय पर हमारे मोहल्ले के कुछ स्वानों की मीटिंग चल रही थी। इस दौरान कभी गुर्राने, कभी भोकने, और कभी गों-गों की आवाज़ें सुनाई दीं। स्वानों की गंभीर भाव-भंगिमा देख कर मामले की तह तक जाने की जिज्ञासा हुई। तभी एक छुटभईया खद्दर धारी निकल पड़े। वो भी भोंकने की कला में दक्ष हैं, और स्वानों की भाषा भी समझते हैं। पता नहीं पिछले जन्म में क्या थे। ख़ैर मैंने उनसे अनुवाद करने के लिये कहा, तो उन्होंने बताया कि, ये सब सदन की बहस पर नाराज़गी और विरोध दर्ज करवा रहे हैं। इनका कहना है कि, हमारे नाम पर वो लोग क्यों भोंक रहे थे। ये हमारा क़ुदरती विशेषाधिकार है। कई नेता चुनाव के समय अस्तित्व के सवाल का वास्ता देते हुए चार-चार बच्चे पैदा करने की सलाह देते हैं, और नतीजा आने के बाद जनसंख्या विस्फोट की चिंता ज़ाहिर करने लगते हैं। सुविधानुसार आपातकाल में जबरिया नसबंदी का मुद्दा उठाएंगे, और हमारे समाज की जबरिया नसबंदी को जायज़ और ज़रूरी बताया जाता है। क़ुदरत ने हमें सिर्फ़ भोंकने का अधिकार दिया है तो हमारी मजबूरी है, पर आप को तो “सर्वश्रेष्ठ प्राणी” कहा गया है। तो आप हमारी भाषा का अतिक्रमण क्यों करते हैं..?हमको आवारा पशु कहा जाता है , तो वो हमारी मजबूरी है, पर प्रचार और नतीजे के बाद आप भी तो अगले “उत्सव” तक आवारा हो जाते हैं!
एक ने तो हमारी नस्ल ख़त्म करने की मांग कर डाली!हक़ीक़त में देश को ख़तरा हमारी नस्ल से नहीं, बल्कि आप से है.हमें तो इसी प्रकृति पर बनाया गया है, पर आप अपने आप को शाकाहारी बताते हुए इंसानों का ख़ून तक पी जाते हैं।

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