मां केवल परिवार की आधारशिला नहीं, संस्कारों की प्रथम विश्वविद्यालय है
सादर प्रकाशनार्थ
“मां केवल परिवार की आधारशिला नहीं, संस्कारों की प्रथम विश्वविद्यालय है”
“मां का मन खुश तो परिवार में स्वतः खिल उठते हैं संस्कार”
“मां घर की धड़कन ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों की दिशा भी है”
“जब मां स्वयं को समय देती है, तभी परिवार को सच्चा सुख मिलता है”
सुख शांति भवन नीलबड़ में मातृत्व दिवस पर गूंजा आत्मशक्ति, संस्कार और आध्यात्मिक सशक्तिकरण का संदेश
भोपाल।
के सुख शांति भवन, नीलबड़ भोपाल द्वारा मातृत्व दिवस के उपलक्ष्य में एक अत्यंत सुंदर, गरिमामयी एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शीर्षक था — “ मां : सुखी, परिवार की आधारशिला” । कार्यक्रम में मातृत्व, आत्मबल, संस्कार, आध्यात्मिक जागरूकता एवं महिला सशक्तिकरण के विविध आयामों पर गहन विचार साझा किए गए। पूरे कार्यक्रम के दौरान आध्यात्मिकता, आत्मीयता और संस्कारों का सुंदर संगम देखने को मिला।
सर्वप्रथम बीके साक्षी बहन ने कार्यक्रम की थीम “मन सुखी, परिवार की आधारशिला” को स्पष्ट करते हुए कहा कि परिवार की वास्तविक खुशी बाहरी सुविधाओं, भौतिक उपलब्धियों या आधुनिक संसाधनों से नहीं, बल्कि घर के सदस्यों के शांत, सकारात्मक और संतुलित मन से बनती है। यदि मां का मन प्रसन्न, स्थिर और शक्तिशाली हो, तो पूरा परिवार स्वतः प्रेम, सहयोग, धैर्य और श्रेष्ठ संस्कारों से भर जाता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में हर घर को केवल सुविधाओं की नहीं, बल्कि मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की आवश्यकता है। उन्होंने सभी को राजयोग मेडिटेशन को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम की शुरुआत बीके पूनम बहन द्वारा की गई, जिन्होंने विभिन्न रोचक एक्टिविटीज, प्रेरणादायी सहभागिताओं एवं मनोरंजक आध्यात्मिक प्रयोगों के माध्यम से सभी माताओं एवं उपस्थित अतिथियों को मातृत्व दिवस की शुभकामनाएं देते हुए उत्साह एवं उमंग से भर दिया। उनके सहज एवं स्नेहमय संचालन से पूरे सभागार में आनंद, अपनापन और सकारात्मक ऊर्जा का सुंदर वातावरण बन गया। उपस्थित सभी बहनों एवं माताओं ने बड़े उत्साह के साथ गतिविधियों में सहभागिता की।
इसके पश्चात वरिष्ठ राजयोगिनी बीके आराधना दीदी ने अपने मधुर एवं आत्मीय शब्दों द्वारा सभी अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि मां केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि भावनाओं, संस्कारों और मूल्यों की प्रथम शिक्षिका होती है। एक मां ही बच्चे के जीवन की पहली गुरु होती है, जिसकी सोच, वाणी और संस्कार आने वाली पीढ़ियों का निर्माण करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि मां आत्मिक रूप से सशक्त हो, तो वह परिवार को भी श्रेष्ठ दिशा दे सकती है। कार्यक्रम का शुभारंभ सभी अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन कर विधिवत रूप से किया गया।
कार्यक्रम में विशेष रूप से डॉ. विवेकन पचौरी जी (डिप्टी डायरेक्टर सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन विभाग), श्रीमती राबी श्रीवास्तव जी (वेलनेस कोच), डॉ. श्रेष्ठा धीमान जी (एजुकेशनिस्ट एवं सोशल वर्कर), श्रीमती नंदिता साहू जी (मैनेजर, बैंक ऑफ बड़ौदा) सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
परम आदरणीय राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी नीता दीदी जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज के समय में परिवार की वास्तविक आधारशिला मां है, लेकिन वही मां आज स्वयं भीतर से थकी हुई, भावनात्मक रूप से कमजोर और मानसिक दबावों से घिरी हुई दिखाई देती है। ऐसे समय में माताओं के लिए परमात्मा से संबंध जोड़ना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
उन्होंने कहा कि जब एक मां स्वयं को केवल शरीर या भूमिका नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली आत्मा समझती है और परमात्मा शिव से शक्ति प्राप्त करती है, तब वह घर में शिवशक्ति और समाज में मां दुर्गा के समान प्रेरणास्रोत बन जाती है।
उन्होंने सभी माताओं से आग्रह किया कि वे 24 घंटे में से कम से कम एक घंटा स्वयं के लिए — अपने आत्मिक उत्थान, आत्मचिंतन तथा परमात्मा की याद में अवश्य निकालें। यही वास्तविक “ मदर्स डे गिफ्ट ” है, जो हर मां स्वयं को दे सकती है। उन्होंने कहा कि जब मां भीतर से शांत, संतुष्ट और शक्तिशाली होती है, तभी वह पूरे परिवार को प्रेम, धैर्य और संस्कारों से जोड़ पाती है।
दीदी ने यह भी कहा कि आध्यात्मिकता एक श्रेष्ठ जीवन जीने की कला है, जिससे परिवार में प्रेम, संवाद, आत्मीयता और आपसी सम्मान स्वतः बढ़ने लगता है। उन्होंने माताओं को स्वयं को “त्याग की मूर्ति” नहीं, बल्कि “शक्ति स्वरूपा” के रूप में देखने की प्रेरणा दी।
मुख्य अतिथि डॉ. विवेकन पचौरी जी ने अपने संबोधन में कहा कि समाज में महिलाओं और माताओं की भूमिका को केवल जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें निर्णय लेने वाली, संस्कार देने वाली और समाज निर्माण की प्रमुख शक्ति के रूप में सम्मान देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि एक सशक्त मां ही सशक्त समाज और श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण कर सकती है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता केवल महिला सशक्तिकरण की नहीं, बल्कि “आत्मिक सशक्तिकरण” की है, जिससे महिलाएं अपने आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति को पहचान सकें। उन्होंने ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा महिलाओं एवं परिवारों के लिए किए जा रहे आध्यात्मिक प्रयासों की सराहना भी की।
कार्यक्रम की विशेष आकर्षण चार रंगों पर आधारित आध्यात्मिक थीम एक्टिविटी रही, जिसमें मातृत्व के विभिन्न स्वरूपों को अत्यंत सुंदर एवं भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया। उपस्थित सभी माताओं एवं बहनों ने अलग-अलग रंगों के माध्यम से “मां” के विराट स्वरूप को अनुभव किया।
आकाश के नीले रंग द्वारा जन्मदात्री मां को स्मरण किया गया, जो अपने विशाल हृदय, सहनशीलता और निःस्वार्थ प्रेम से संतान को जीवन देती है। हरे रंग के माध्यम से प्रकृति मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई, जो निरंतर मानव जीवन का पालन-पोषण कर रही है। भूरे रंग द्वारा धरती मां को याद किया गया, जो बिना भेदभाव सभी को धारण कर सेवा करती है और सहनशीलता का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करती है। वहीं लाल रंग द्वारा परमात्मा मां के स्वरूप को अनुभव कराया गया, जो अपने असीम प्रेम, शक्ति और सुरक्षा की छत्रछाया से आत्माओं को आंतरिक बल प्रदान करते हैं।
इस अनूठी गतिविधि ने सभी को यह अनुभूति कराई कि मातृत्व केवल एक संबंध नहीं, बल्कि प्रेम, संरक्षण, त्याग, सहनशीलता और आध्यात्मिक शक्ति का जीवंत स्वरूप है। पूरे सभागार में आत्मीयता, कृतज्ञता, सम्मान और दिव्यता का वातावरण अनुभव किया गया।
वेलनेस कोच श्रीमती राबी श्रीवास्तव जी ने कहा कि माताएं पूरे परिवार का ध्यान रखते-रखते स्वयं को भूल जाती हैं। वे सबकी पसंद, स्वास्थ्य और आवश्यकताओं का ख्याल रखती हैं, लेकिन स्वयं के शरीर, मन और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं दे पातीं। उन्होंने कहा कि यदि मां स्वयं स्वस्थ, प्रसन्न और मानसिक रूप से संतुलित रहेगी, तभी वह परिवार को भी सही ऊर्जा दे पाएगी।
उन्होंने सभी महिलाओं को प्रतिदिन कुछ समय मेडिटेशन, आत्मचिंतन और स्वयं की देखभाल के लिए निकालने की प्रेरणा देते हुए कहा कि “स्वयं को समय देना स्वार्थ नहीं, बल्कि परिवार के लिए सबसे बड़ा उपहार है।”
डॉ. श्रेष्ठा धीमान जी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि वे लंबे समय से राजयोग ध्यान से जुड़ी हुई हैं और उन्होंने अनुभव किया है कि यह केवल ध्यान नहीं, बल्कि “जीवन जीने की एक श्रेष्ठ कला” है। उन्होंने बताया कि राजयोग के अभ्यास ने उन्हें अपने व्यस्त जीवन में संतुलन बनाना सिखाया है। इससे वे अपने कार्य, परिवार, सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ स्वयं के लिए भी समय निकाल पाती हैं।
उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता व्यक्ति को भीतर से स्थिर बनाती है, जिससे उसकी रचनात्मकता, धैर्य और निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ती है। राजयोग ने उन्हें अपनी हॉबीज, क्रिएटिविटी और आत्मविकास को समय देने की प्रेरणा दी, जिससे जीवन अधिक संतुलित, सुंदर और आनंदमय बना। उन्होंने कहा कि ध्यान व्यक्ति को केवल शांत नहीं बनाता, बल्कि भीतर से मजबूत और परिस्थितियों का सामना करने योग्य भी बनाता है।
श्रीमती नंदिता साहू जी ने कहा कि बैंकिंग जैसी व्यस्त कार्यशैली के बीच परिवार और कार्यस्थल दोनों को संतुलित रखना आसान नहीं होता, लेकिन राजयोग ध्यान और परमात्मा की याद ने उन्हें यह शक्ति दी है कि वे हर परिस्थिति में शांत और सकारात्मक रह सकें।
उन्होंने कहा कि आज भी समाज में महिलाओं को हर स्थान पर समान दृष्टिकोण नहीं मिलता, लेकिन जब महिला स्वयं को आत्मस्वरूप समझकर परमात्मा से शक्ति लेती है, तब वह परिस्थितियों से ऊपर उठकर आत्मसम्मान में स्थित रह सकती है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता महिलाओं को भीतर से इतना सशक्त बना देती है कि वे हर परिस्थिति में मुस्कुराते हुए आगे बढ़ सकें।
कार्यक्रम के मध्य बीके डॉ. प्रियंका बहन द्वारा मां पर आधारित एक अत्यंत भावपूर्ण गीत की सुंदर प्रस्तुति दी गई, जिसने उपस्थित सभी अतिथियों को भावविभोर कर दिया। गीत के शब्दों ने मां के त्याग, प्रेम और ममता को अत्यंत संवेदनशील रूप से प्रस्तुत किया, जिससे पूरे वातावरण में भावनात्मक आत्मीयता की अनुभूति हुई।
अंत में बीके हेमा बहन जी ने सभी को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीवन जीने की प्रेरणा देते हुए ज्ञान के गहन बिंदुओं का अभ्यास कराया। उन्होंने कहा कि जब हम स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा से जुड़ते हैं, तब भीतर की चिंता, तनाव और असुरक्षाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं।
उन्होंने कहा कि राजयोग ध्यान केवल कुछ समय का अभ्यास नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में स्वयं को शांत, स्थिर और शक्तिशाली बनाए रखने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। उन्होंने सभी को संक्षिप्त राजयोग मेडिटेशन का अनुभव भी कराया, जिससे पूरा वातावरण गहन शांति, सकारात्मक ऊर्जा और दिव्यता से भर गया।
कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन बीके डॉ. देवयानी बहन द्वारा अत्यंत प्रभावशाली, गरिमामयी एवं आत्मीय शैली में किया गया। अंत में सभी अतिथियों का तिलक, पत्रिकाओं एवं सम्मान स्वरूप भेंट देकर अभिनंदन किया गया तथा सभी ने ईश्वरीय प्रसाद ग्रहण किया।
