मोदी के ध्यान से इतनों का चित्त क्यों उखड़ रहा है?

0
Spread the love

श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने देश को बहुमत की अन्तिम सरकार दी थी। वह भी मां की मौत की आड़ लेकर। उसके बाद तो देश बहुमत की सरकार होने का मतलब ही भूल गया था। 2014 में मोदी ने सरकार तो गठबंधन की बनाई लेकिन बहुमत अकेले भाजपा के पास था। इसके बाद देश ने देखा कि बहुमत की सरकार के मायने क्या होते हैं? बहुमत की सरकार तो गांधी-नेहरू परिवार ने भी दी लेकिन बंटवारा मानसिकता से ग्रसित सरकार देश का विकास तो करती रही लेकिन सांस्कृतिक विकास करने के मामले में वह भारत में नया पाकिस्तान पनपाती रही। केवल एक कानून वक्फ के लिए बनाया और सुविधा दर सुविधा देकर उसे बांग्ला देश जितनी जमीन का मालिक बना दिया गया। डरा हुआ देश एक तलाश में था और उसकी नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वह तलाश मिली। समूचा भारत उनके पीछे खड़ा हो गया। इंडिया संस्कृति और उनकी झूठन चाटकर प्रगतिशील दिखने के आदि लोगों का समूह मोदी को पचा नहीं पाया।

तब से जब से मोदी देश के प्रधानमंत्री बने हैं ये लोग हर समय मौके की तलाश में रहते हैं और शब्दों पर गिद्धदृष्टि जमाये रहते हैं। घटनाओं का अपने हिसाब से विश्लेषण करते हैं। एक साथ कांव-कांव करके निकलते हैं और सोशल मीडिया पर पिल पड़ते हैं। हर काेई ऐसे लिखता/बोलता है मानों यह देश तो उनकी ही बात को सुनता है। सच में उनकाे कोई नहीं सुनता आपस में ही एक दूसरे की पीठ खुजाते रहते हैं। उष्ट्राणां विवाहेषु, गीतं गायन्ति गर्दभाः। परस्परं प्रशंसन्ति, अहो रूपं अहो ध्वनिः। अर्थात ऊँटों के विवाह में गधे गीत गा रहे हैं। परस्पर प्रशंसा करते हैं क्या रूप है क्या स्वर है? किसी को कोई लेना देना नहीं है। एक साक्षात्कार में मोदी ने कह दिया कि गांधी पर बनी पिक्चर ने गांधी को जन-जन तक पहुंचा दिया। वह समूह पिल पड़ा। गांधी को विश्व का बच्चा-बच्चा जानता है मोदी को पता ही नहीं? इनका बच्चा ही इनका संसार है। गांधी नाम की महत्ता को नकली गांधी कब का लील चुके हैं। वो गांधी इन गांधियों के वोट का साधन भर है उसका जीवन में प्रयोग कोई नहीं करता? लेकिन यहां मकसद गांधी को उचित स्थान दिलवाना, है कहां? यहां तो मोदी निशाना है? उनको कोसना है?
चुनाव की गहमा-गहमी ने नेताओं को थका दिया। कुछ नेता बैंकाक जाकर थकान मिटा लेते हैं कुछ ध्यान साधना करके। कुछ आपस में ही। जिसकी जैसी संस्कृति, जिसका जैसा चरित्र? अब इन राक्षसों को मोदी के ध्यान से अपनी दुकान लुटने का भय सता रहा है। सरकार बनने की संभावना क्षीण हो जाने के बाद भी ये तत्व विरोध का निचला स्तर ही बनाकर चल रहे हैं। एक पोस्ट डालता है बाकी गालियों वाली भाषा बोलने लग जाते हैं। सनातन संस्कृति में ध्यान शक्ति संचय का बड़ा साधन होता है। यह चित्त और मन के मिलन के बाद शक्ति प्रदान करता है। भारत की तपस्वी परम्परा को समझने वाले इसे समझते भी हैं और स्वीकार भी करते हैं। जो सनातन का विरोध करते रहे हैं। वे आज इस ध्यान का भी विरोध कर रहे हैं। राजनीति के पुराने नेताओं का इस पर कोई बयान नहीं देखा होगा? राजनीति के लौंडों की ही हरकत है जिसमें वे सनातन परम्परा पर प्रहार कर रहे हैं। करेंगे भी क्यों नहीं जिनकी मान्यता या तो इस्लामिक रंग में रंगी है? इसायित का संरक्षण देने के लिए वे राजकाज का उपयोग करते रहे हैं। वाम विचार के साथ खुद को ओत प्रोत किये हैं। या फिर वे हैं जिनकी मोदी काल में दुकान लुट गई। वे आज के भारत के भाग्य विधाता नहीं हैं। वे तो भारत को इंडिया बनाने के प्रयास की धुरी बन रहे हैं। गठबंधन का नाम भी इसीलिए तो इंडिया रखा है।
ध्यान भारत की चेतना का अंग है। वह आत्मशक्ति का संचय करने का साधन है। जो सनातन को मानता है वह इसे समझता है जो नहीं समझता वह राक्षस वृत्ति का आचरण करता है। विरोध करने वालों का डीएनए भी राक्षसी ही कहा जा सकता है। मोदी देश के लिए फिर से शक्ति संचय करके आ रहे हैं। मनमानस ने जनादेश दिया है। इससे मिलने वाली शक्ति का सदुपयोग करने के लिए अध्यात्म की शक्ति की जरूरत इस ध्यान से पूरी हो जायेगी। इसका लाभ मिलेगा समूचे देश को और विश्व को भी। लेकिन मोदी जी आपसे आग्रह है कि भारत मां के उन्नत भाल के लिए इन राक्षसी प्रवृत्ति का वध जरूरी है। आप गाली प्रुफ होंगे तो होते रहें देश को यह स्वीकार नहीं है कि दो कौड़ी के लोग देश के प्रधानमंत्री पद लज्जित करें। एक अभियान इनके लिए भी हो जाये ? तभी समग्र विकास की राह भारत मां के लिए होगी? वह तभी हंसती हुई दिखाई देंगी?

सुरेश शर्मा
चेयरमैन, हिंदी पत्रकारिता फाउंडेशन मध्यप्रदेश (भारत)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481