प्रधानमंत्री के नाम एक चिट्ठी-ध्रुव शुक्ल

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मैं गांधी जी को जानता हूं
ध्रुव शुक्ल

प्रधानमंत्री जी, मैं सत्तर साल का हो गया हूं। मुझे अपने बचपन की याद है कि जब अपने प्राइमरी स्कूल से गांधी जी का जन्मदिन मनाकर घर लौटा तो मैंने अपनी दादी से पूछा कि जब महात्मा गांधी को मारा गया तब क्या हुआ था? दादी बोली — बेटा, ऐसा लगा कि जैसे पूरे संसार में अंधेरा छा गया है। सब उसी अंधेरे में एक-दूसरे को टटोल रहे थे। फिर उस दिन शाम का खाना बनाने का मन नहीं हुआ। इतने आंसू आये कि चूल्हा ही बुझ गया।

प्रधानमंत्री जी, पचहत्तर साल बाद आज भी जब किसी चूल्हे में बुझी हुई लकड़ियां देखता हूं तो लगता है कि गांधी जी की मृत्यु की खबर फिर आ गयी है। जबसे होश संभाला है तब से देश के जीवन में उन्हें रोज तिल-तिल मरते देखता हूं पर उनका अन्त आता ही नहीं। वे बार-बार जी उठते हैं। वे मेरी स्मृति के द्वार पर रोज़ दस्तक देते हैं। गोधूलि बेला में उनकी आहट घर लौटती गायों के गले में झूलती चण्टियों-सी सुनायी देती है। वे अंजान के स्वरों में बसकर पूरे आकाश में रोज़ गूंजते हैं। राम निरञ्जन के जगत पसारे में उनका मन सबसे मिला हुआ ही पाता हूं। गांधी जी तो बीती सदी से ही सबकी पीर पहचानते हुए संसार की सब प्रार्थनाओं में गहरी सांत्वना की तरह बसे हैं।

प्रधानमंत्री जी, बापू के जीवन से प्रेरणा लेकर अनेक फिल्में भारत में बनती रही हैं। बाद में ब्रिटिश फिल्मकार एटनबरो ने भी एक फिल्म बनायी। इस फिल्म को प्रियदर्शिनी इंदिरा जी ने राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम से आर्थिक सहयोग भी दिया था। दुनिया में गांधी जी केवल भले आदमियों के नेता नहीं थे। उनसे प्रेरणा पाकर हमारे समय के मुन्ना भाई भी गांधीगीरी करने लगते हैं। गांधी जी ने तो अपने जीवन में राम राज्य नामक एक ही फिल्म देखी थी। गांधी जी इस फिल्म को देखने से पहले ही राम को अच्छी तरह जानते थे।

प्रधानमंत्री जी, दुनिया के अनेक देशों में महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित हुई है। उस ब्रिटिश पार्लियामेण्ट के सामने भी उनकी प्रतिमा है जिसके विरुद्ध उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत में अहि़सक संग्राम छेड़ा। महात्मा गांधी महान लेखक टाल्सटाय, वैज्ञानिक आइंस्टीन, क्रांतिकारी नेल्सन मण्डेला , महान कलाकार चार्ली चैप्लिन, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के विश्वव्यापी हृदय में अपनी जगह बना सके। जब हमारे देश में न्याय मांगने वालों की बात उनकी ही चुनी हुई सरकार नहीं सुनती तब लोग गांधी जी की समाधि के पास जाकर बैठ जाते हैं। सब न्याय मांगने वाले आखिरी उम्मीद तो गांधी जी से ही बांधे हुए हैं।

प्रधानमंत्री जी, ये दुनिया और हमारा देश साधनों की लूट के जिस रास्ते पर जा रहे हैं, महात्मा गांधी ने बीसवीं सदी के पहले दशक में ही चेताया था कि एक दिन ऐसा आयेगा जब मानवजाति को टेक्नालाजी अपना गुलाम बना लेगी। प्रधानमंत्री जी, वह दिन उग भी आया है और संसार के जीवन पर इस दिन की ढलती हुई शाम का धुंधलका किसी गहरे अवसाद की तरह छा रहा है। इस गहरे अवसाद और अकेलेपन में सिर्फ़ गांधी जी ही तो हैं जो पूरे संसार के साथ खड़े दिख रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी, आपका इन्टरव्यू सुनते हुए लगा कि आपके कहने में जो बात छूट गयी, उसे एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में पूरी कर दूं।
सादर
ध्रुव शुक्ल

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