दो साल—भ्रष्टाचार बे-मिसाल..? संपादकीय -राजेन्द्र सिंह जादौन
दो साल—भ्रष्टाचार बे-मिसाल..?
संपादकीय -राजेन्द्र सिंह जादौन
13 दिसंबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपने दो साल पूरे करने जा रहे हैं। जश्न का माहौल तैयार है, पोस्टर भी तैयार हैं, उपलब्धियाँ गिनाने का सरकारी ताना-बाना भी। लेकिन असल सवालों से किसी सरकार ने कब तक भागा है? समीक्षा बैठकों का सर्कस चल रहा है जहाँ मंत्री 30 मिनट में 50–60 हज़ार करोड़ के विभागों की समीक्षा निपटा दे रहे हैं। मानो विभाग नहीं, चाय की दुकान का हिसाब देख रहे हों।
पर असली सवाल तो अब खड़ा हो रहा है मोहन यादव अपने ही विभागों की समीक्षा करेंगे? क्योंकि उनके पास विभाग इतने हैं कि एक सूची बनाई जाए तो मंत्री परिषद से बड़ी लगती है। क्या मुख्यमंत्री अपने मंत्रालयों की समीक्षा उसी तरह करेंगे जैसे अपने मंत्रियों से करवाते हैं? क्या वे भी भाजपा कार्यालय में समय निकालकर कार्यकर्ताओं से मिलने वाली वही ‘अनिवार्य ड्यूटी’ खुद निभाएँगे या सिर्फ़ दूसरों पर लागू होगी? लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती असल काला सच तो विभागों की गलियों में गूँज रहा है।
कमीशनखोरी का ग्राफ़ दो साल में ऐसा उछला है जैसे सरकार ने खुद कोई ‘उन्नति योजना’ चला रखी हो।
जहाँ पहले 10% का ‘रिवाज़’ था, अब 30% नया ‘सिस्टम’ बन चुका है। और मज़ेदार या कहें शर्मनाक बात यह है कि जिन विभागों में यह कमीशनखोरी सबसे ज्यादा बढ़ी है… वे विभाग सीधे मुख्यमंत्री के पास हैं।
अब सवाल जनता पूछ रही है क्या समीक्षा का पैमाना सबके लिए बराबर होगा? क्या मुख्यमंत्री अपने ही विभागों में हुई इस बढ़ोत्तरी की भी समीक्षा करेंगे या इसे ‘सिस्टम की उपलब्धि’ मानकर आगे बढ़ जाएंगे? क्या दो साल के इस शासनकाल में भ्रष्टाचार के बढ़ते प्रतिशत को उपलब्धियों की सूची में शामिल किया जाएगा?
दावे बहुत हैं, पोस्टर बहुत हैं, भाषण भी बहुत हैं लेकिन सच्चाई इतनी सी है कि सरकार के दो साल नहीं हुए… दो साल में भ्रष्टाचार के नए मापदंड स्थापित हुए। और राज्य में एक ही बात अब खुलकर कही जा रही है “मोहन सरकार के दो साल भ्रष्टाचार बे-मिसाल।”
