ये गर्मियां…. ये कुल्फियां…..ये मस्तियां….Ashok manbani

0
Spread the love

हर व्यक्ति बचपन में ननिहाल में बिताए दिन यादगार मानता है। वे दिन यादगार होते भी हैं।

ननिहाल गांव में हो या शहर में बहुत खट्टी मीठी यादें लिए होती है। जब कभी मैं रायपुर जाता था तो मेरे लिए खास आकर्षण शहर का खान-पान होता था। इसमें वह कुल्फियां खास स्थान रखती हैं जिन पर नारियल की गरी लगाकर दी जाती थी।

रायपुर में जयराम टॉकीज के पास मिलने वाला फलूदा, जय स्तंभ के पास मिलने वाला स्वादिष्ट गन्ने का रस जिसमें बहुत अच्छा मसाला भी डाला जाता था और बर्फ मिलाकर जब हम पीते थे,मजा आ जाता था। आज भी उस लंबे से गिलास को याद करते हैं। इतना लंबा गन्ने के रस का गिलास आज तक किसी शहर में नहीं मिला। एक उत्सव सा होता था ये सब अनुभव।

मधु स्वीट्स के समोसे भी हम नहीं भूल पाए हैं, क्या तो चटनी का संगम होता था।वहीं पास में एक गास मेमोरियल लाइब्रेरी थी,जहां बैठकर कॉमिक्स पढ़ते थे।कभी-कभी पास,चौराहे के एक कोने में कोटक बुक कार्नर से हम बाल साहित्य खरीद भी लेते थे।

रिक्शा पर लटक कर गांधी बाग तक चले जाना अपने ममेरे भाई बहनों के साथ, हमें अलग आनंद देता था। सात आठ साल की आयु थी जब देश में दूरदर्शन आया और रायपुर पहला नगर था जहां प्रसारण शुरू हुआ। तब मोती बाग में कृषि के कार्यक्रम देखने भी भीड़ लग जाती थी बच्चों की और एक तरह के नि:शुल्क सिनेमा को देखने का हम आनंद प्राप्त करते थे।

भिलाई रोड पर नंदनवन भी कई बार गए। लेकिन शहर में जो स्थान देखने लायक होते थे उनमें घासीदास संग्रहालय और श्याम बाग भी कम आकर्षण का केंद्र ना थे।

ननिहाल गणेश रामनगर में थी ,जहां से पुराने बस स्टैंड तक दिन में कई बार विचरण करते हुए नजदीक के चार-पांच सिनेमाघर में खूब फिल्में भी देख डालीं थीं। उन दिनों किसी-किसी फिल्म के कलाकार भी रायपुर आ जाते थे। नदिया के पार के सचिन और साधना सिंह का आगमन भी याद है। ननिहाल की यादें आगे भी जारी रहेंगी।

चित्र सौजन्य: गूगल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481