मोहन सरकार की पुलिस ,गीता, गुनाह और गश्त?

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*मोहन सरकार की पुलिस ,गीता, गुनाह और गश्त?*

 

व्यंग्यकार -राजेंद्र सिंह जादौन

 

भाजपा प्रवक्ता का बयान आया कि “मोहन भइया की पुलिस को गीता पढ़नी चाहिए, इससे अपराधों में कमी आएगी और प्रदेश अपराध मुक्त होगा।”यह सुनकर लगा मानो अब प्रदेश की पुलिस अपराधियों को पकड़ने नहीं, मोक्ष दिलाने निकलेगी। अब थाना परिसर में ‘धारा 302’ नहीं, ‘श्लोक 302’ की चर्चा होगी और विवेचना के हर केस में कृष्ण-अर्जुन संवाद का हवाला दिया जाएगा।

 

अब थाने में कोई पीड़ित पहुंचेगा और बोलेगा – “साहब, चोरी हो गई”, तो दरोगा जी जवाब देंगे –“हे अर्जुन! मोह और माया का त्याग करो, जो गया वह कभी तुम्हारा था ही नहीं।” अगर कोई कहे – “साहब, मारपीट हो गई”, तो जवाब मिलेगा – “कर्म करो, फल की चिंता मत करो, बाकी केस का फल भगवान जाने।”

 

प्रदेश की पुलिस ट्रेनिंग अकादमी में अब डंडे नहीं, शंखनाद की प्रैक्टिस होगी। क्लास में “धारा 144” नहीं, “अध्याय 18” पढ़ाया जाएगा। कानून की किताबों की जगह गीता रखी जाएगी, और इंस्पेक्टर साहब जब अपराधी से पूछताछ करेंगे, तो पहले कहेंगे – “बता रे अपराधी, तेरा कर्म क्या है? धर्म क्या है? और तू इस लोक में किस अध्याय का पात्र है?”

 

पुलिस का काम अब अपराध रोकना नहीं, अहंकार तोड़ना होगा। थाने का नाम भी बदला जा सकता है –‘कोतवाली’ की जगह ‘कर्मक्षेत्र थाना’,‘चौकी प्रभारी’ अब कहलाएंगे ‘धर्मपाल अधिकारी’।

 

भविष्य में अगर कोई पत्रकार अपराध दर पूछे तो शायद प्रवक्ता जी कहें – “देखिए, अपराध नहीं बढ़े हैं, बस मोह-माया के स्तर पर कर्म-योगी विचलित हुए हैं।”

 

अब जांच अधिकारी केस फाइल में नहीं, गीता श्लोकों में प्रमाण ढूंढेंगे। एफआईआर ऐसे दर्ज होगी –“श्लोक क्रमांक 16/2025 – अपराधी ने अधर्म किया, अतः उसे ज्ञान दिलाना आवश्यक है।” और जब कोर्ट में जज साहब फैसला सुनाएंगे, तो कहेंगे –“हे अभियुक्त! तू अब अर्जुन की तरह पश्चाताप कर, सजा नहीं ज्ञान की प्राप्ति होगी।”

 

अपराध दर घटे या न घटे, लेकिन भाषण दर जरूर बढ़ जाएगी। क्योंकि गीता पढ़ने के बाद हर नेता खुद को श्रीकृष्ण समझेगा और जनता को अर्जुन बना देगा।

हर मंच पर उपदेश होगा – “कर्म करते रहो, सवाल मत पूछो।”

 

कभी-कभी लगता है, प्रवक्ता जी ने शायद गीता को कानून की किताब और आस्था को दंड संहिता समझ लिया है। अगर अपराध मिटाने का उपाय इतना आसान होता तो आज जेलों की जगह आश्रम होते, और अपराधी कोर्ट नहीं, सत्संग में पेश होते।

 

गीता का सार यही है – “कर्म करो, लेकिन धर्मपूर्वक।”

लेकिन नेताओं ने इसे बना दिया है – “बयान दो, परिणाम भूल जाओ।”

 

वाकई, अगर गीता से अपराध मिटते तो पहले प्रवक्ता जी खुद रोज उसका एक अध्याय पढ़ते, कम से कम बयान देने से पहले विवेक का पुनर्जन्म तो हो जाता।

 

अब उम्मीद बस यही है कि अगले आदेश में यह न कह दिया जाए कि ट्रैफिक पुलिस गीता के साथ हनुमान चालीसा भी पढ़े ताकि एक्सीडेंट नहीं, चमत्कार हों! क्योंकि इस प्रदेश में सुधार योजना नहीं चलती यहाँ सब कुछ “धार्मिक भावनाओं से प्रेरित प्रयोग” के तहत चलता है।

 

और अगर सच में अपराध कम करने की इतनी ही ललक है, तो बेहतर होगा कि प्रवक्ता जी एक दिन खुद किसी थाने में जाकर गीता लेकर अपराधियों को उपदेश दें शायद तब उन्हें पता चले कि अपराध कर्म से नहीं, प्रणाली से पैदा होता है।

 

बाकी जनता तो पहले से ही जानती है यह प्रदेश अब धर्मक्षेत्र है,जहाँ पुलिस गश्त नहीं करती बस गीता पाठ करती है।

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