ना मेने नमक खाया, ना दूध की चाय पी…?
ना मेने नमक खाया, ना दूध की चाय पी…?
भाई, हमारे यहाँ आयोजनों का भी क्या कहना! कहने को तो मिलन समारोह था, पर हकीकत में मिलन कहीं था ही नहीं। भीड़ जुटाने का हुक्म था, और हुक्म के आगे तो सब पीआरओ ऐसे खड़े थे जैसे बोर्ड पर चिपके पोस्टर रंग-बिरंगे, लेकिन काम के ज़ीरो।
कंधे कमज़ोर थे, और जिन कंधों पर बोझ डाला गया, वो तो ऐसे फुस्स निकले जैसे गैस का सिलिंडर बिना रेगुलेटर के।
इतना तक मालूम नहीं कि कौन पत्रकार है, कौन संस्था से है बस सबको एक ही तराज़ू में तोल दिया, जैसे सब भीड़ ही हों।
आका का हुक्म साफ़ था:
“भीड़ चाहिए, भीड़!”
अब इज्ज़त, सम्मान, संवाद ये सब किताबों के शब्द हैं, आयोजनों में नहीं।
आका तो संतुष्ट थे, कि कुर्सियाँ भरी हैं। बाक़ी ये पीआरओ साहबान, जिनकी गिनती एक दर्जन से ऊपर थी, सब अपनी आका की चौखट पर चुपचाप मुँहबंद बैठे रहे मानो ज़ुबानें किराये पर देकर आए हों।
और मैं?मुझे तो कोई कर्ज़ चुकाना नहीं, ना मेने नमक खाया, ना दूध की चाय पी। तो भला क्यों उतारूँ एहसान? जो लोग दूध-चाय में डूबकर “आका” का नमक हलाल कर आए हैं, वही कंधे बदल-बदल कर बोझ उठाएँ।
मैं तो बस तमाशा देखूँगा और हँसूंगा इस मिलन समारोह पर, जहाँ मिलन पीछे रह गया,
औऱ समारोह सिर्फ आका की जय-जयकार बनकर रह गया। राजेंद्र सिंह जादौन
