पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – जीवन का प्रत्येक सूर्योदय हमें हमारे लक्ष्य और संकल्पनाओं की संपूर्ति के नवीन अवसर प्रदान करता है। इसलिए नवसृजन, नवोन्मेषी विचार एवं नूतन अवसरों का स्वागत करें। भय, कुंठा, तनाव एवं असुरक्षा के भाव हमारे मन की दुर्बलताएँ हैं। इनसे अप्रभावी रहकर ही जीवन की श्रेष्ठ सम्भावनाओं को साकार किया जा सकता है ..! सद्विचार-सम्पन्न मनुष्य में अनायास ही चारित्रिक उच्चता, उदारता, करुणा-परदुःखकातरता और दिव्यता आदि सद्गुण प्रकट होने लगते हैं, अर्थात् विचारों में अद्वितीय सामर्थ्य विद्यमान है। जीवन में रूपांतरण के लिए वैचारिक शुचि-सम्पन्नता अपेक्षित है। सात्विक व पवित्र विचार ही ब्रह्मचर्य का आधार है। वास्तव में विचारों की उच्चता भी जीवन की सादगी का ही एक प्रकार और रूप है। जिनके विचार उच्च होते हैं, वह लोग अपने जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ नही गँवाते। स्वयं को किसी-न-किसी दिव्य सत्प्रवृक्ति में संलग्न रखें व व्यस्त रहने की आदत डालें। निठल्ले व्यक्तियों को ही विकार अधिक सताते हैं। अतः आप अपने विचारों को पवित्र, सात्विक व उच्च बनाएँ। विचारों की उच्चता बढ़ाकर आप अपनी आंतरिक दशा को परिवर्तित कर सकते हैं। उच्च व सात्विक विचार औषधि है। स्वस्थ्य और सकारात्मक विचारों से साधक में चरित्र की उच्चता, चिन्तन की शुद्धता एवं आचरण की पारदर्शिता आती है और जीवन सिद्धि-श्रेष्ठता का मार्ग प्रशस्त होता है। अतः जीवन में विचार सम्पन्नता रहे। सत्संग – स्वाध्याय द्वारा सद्विचारों का प्रस्फुटन होता है। सद्विचारों से पवित्र अंतःकरण एवं आध्यात्मिक मनःस्थिति का निर्माण होता है और साधन चतुष्ट्य की सिद्धि होती है। इस प्रकार जीवन सिद्धि का प्रथम सोपान सत्संग व सद्ग्रन्थों का अध्ययन ही है। सद्ग्रन्थों में ही सद्विचार, शुभ-संकल्पता और जीवन सिद्धि के मंत्र छिपे हुए हैं। इसलिए सफल और दिव्य जीवन के निर्माण हेतु सत्संग व सद्ग्रन्थों का अध्ययन सर्वथा श्रेष्ठ और हितकर है …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – विचारों में श्रेष्ठता और उच्चता पैदा करें, क्योंकि विचार ही प्रगति का प्रथम सोपान है। बाहरी दृश्यमय जगत की रचना ईश्वर द्वारा की गई है। इस पृथ्वी पर मनुष्य सहित अनेक जीव-जन्तु अपना जीवनयापन करते हैं। अन्यान्य जीवों में मनुष्य विवेकयुक्त होने के कारण सबसे श्रेष्ठ प्राणी है। उसे ईश्वर ने बुद्धि के द्वारा विचार करने की शक्ति भी प्रदान की है। विचारों को पवित्र कर आत्मभाव में जाग्रत होने की युक्ति मात्र मनुष्य के पास है। इस भूमि पर अनेकानेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने स्वयं को पवित्र कर आत्मा का साक्षात्कार किया है। अनेक ऐसे भी महापुरुष जन्मे हैं, जिन्होंने ईश्वर की अनन्य भक्ति कर उनके प्रकट दर्शन किए हैं। सूक्ष्मावलोकन करने से ऐसा विदित होता है कि पूर्व में मनुष्य का हृदय अत्यन्त पवित्र व विचारों से निर्मल था। पवित्रता, शुद्धता व मन की सरलता उनके लिए अत्यधिक महत्व रखती थी। परम्परा से स्थापित मर्यादाओं का पालन उनके द्वारा उत्कृष्ट भाव से किया जाता था। लोग बाहरी दृष्टि से वैभवशाली नहीं थे, पर हृदय से बहुत सम्पन्न हुआ करते थे। उनके अंतर्मन में भावों की उत्कृष्टता कूट-कूट कर भरी थी। “सादा जीवन उच्च विचार” उनका मूलमंत्र होता था। काल की गति के अनुसार विचारों का अवमूल्यन शुरू हुआ तो अंतर्मन के भाव जगत में शुष्कता आने लगी। लोग विचारों की उच्चता को छोड़कर मात्र भौतिक जगत की सम्पन्नता को श्रेष्ठ मानकर उसकी ओर आकर्षित होते चले गए। आज भी स्वयं को भौतिक रूप से संवारने की होड़ समाज में जारी है। संस्कार क्षीण होने लगे, विचारों में गिरावट आने लगी। बाहरी जगत को ही सर्वस्व समझ कर बिना विचार किये इस दौड़ में लोग सम्मिलित होते चले गये। प्रेम, सहिष्णुता, दया, परोपकार के स्थान पर बाहरी जगत की सम्पन्नता हावी होती चली गई। घर, नगर, गाँव इससे ग्रसित होते गए। इस दौड़ के कारण अन्दर झाँकना बन्द हो गया। इसका परिणाम भी अब सामने आने लगा है। लोग अवसाद ग्रस्त होते जा रहे हैं। अब तो लोग जीवन की अमूल्यता को ही नहीं समझ पा रहे हैं। जीवन जीने के लिए साधनों की आवश्यकता है, पर भाव की शुद्धता और पवित्रता से मन को सींचते रहने की भी आवश्यकता होती है। जीवन की निरन्तरता के लिए इनकी आवश्यकता को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार इन्हें इनका स्थान प्रदान कर अंतर्मन के भावों में पवित्रता लाते हुए पूर्णता की ओर अग्रसर होते जाना ही कल्याणकारी होगा …।