लुंगियों में भरकर नोटों के बंडल ट्रेन से नीचे फेंके

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मध्यप्रदेश क्राइम फाइल्स पार्ट 1 में आपने पढ़ा कि 8 अगस्त 2016 की रात तमिलनाडु के सेलम रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन नंबर 11064 सेलम-चेन्नई एक्सप्रेस अपने तय समय पर रवाना होती है। इस ट्रेन में भारतीय रिजर्व बैंक के 342 करोड़ रुपए थे, जो लकड़ी के कुल 226 बॉक्स में रखे थे। ये पुराने और कटे-फटे नोट थे। इन रुपयों को चेन्नई में भारतीय रिजर्व बैंक के खजाने में पहुंचाना था। बोगियों की सुरक्षा के लिए 18 पुलिसकर्मी तैनात थे।

ट्रेन तमिलनाडु के सेलम रेलवे स्टेशन से चेन्नई के लिए रवाना हुई। 140 किलोमीटर का सफर तय कर रात 11 बजे गाड़ी विरुधाचलम पहुंचती है। यहां एक घंटे रुकती है, क्योंकि यहीं से ट्रेन में डीजल इंजन बदला जा रहा था। उसकी जगह अब इलेक्ट्रिक इंजन लगना था। इंजन चेंज होता है और फिर ट्रेन आगे बढ़ जाती है।

5 घंटे बाद ट्रेन 9 अगस्त की सुबह 4 बजे तमिलनाडु के एग्मोर रेलवे स्टेशन पहुंचती है। तब पता चलता है कि ट्रेन में डाका पड़ा है। 5 करोड़ रुपए गायब हैं। हड़कंप मच जाता है।

चलती ट्रेन में डाका कैसे डाला गया? कौन थे डकैत, जिनका कोई सुराग नहीं मिल रहा था? मध्यप्रदेश क्राइम फाइल्स के पार्ट 2 में पढ़िए, आगे की कहानी…

ट्रेन डकैती सेलम से एग्मोर रेलवे स्टेशन के बीच हुई थी।
ट्रेन डकैती सेलम से एग्मोर रेलवे स्टेशन के बीच हुई थी।

मोबाइल नंबर से मिला पहला सुराग पुलिस ने 2 हजार लोगों से पूछताछ की। हजारों कॉल डिटेल खंगाली गईं। आखिर में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा से मदद ली गई। तब जाकर पहला सुराग मिला कि देश की अब तक की सबसे बड़ी ट्रेन रॉबरी किसने की थी?

पुलिस ने सेलम से चेन्नई के बीच ट्रेन के चलने के दौरान मोबाइल नेटवर्क डेटा खंगालना शुरू किया। उन्होंने उन सभी मोबाइल नंबरों को ट्रैक किया, जो इस रूट पर एक्टिव थे।

नासा से मांगी सैटेलाइट इमेज जैसे ही इन नंबरों की गहराई से जांच हुई, सामने आया कि सभी नंबर मध्यप्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से खरीदे गए थे। पुलिस ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा से सैटेलाइट इमेज मांगीं। सेलम से विरुधाचलम के बीच की रात की इमेज खंगाली गईं।

और तब सामने आया चौंकाने वाला सच। ट्रेन की छत पर कुछ संदिग्ध आकृतियां थीं, जो उसके साथ-साथ मूव कर रही थीं। सैटेलाइट तस्वीरें और मोबाइल लोकेशन मिलाकर पुलिस ने पाया कि इस डकैती को करीब एक दर्जन लोगों ने मिलकर अंजाम दिया था। ये सभी एमपी के थे।

पारदी गिरोह ने दिया वारदात को अंजाम तमिलनाडु सीबी-सीआईडी ने मध्यप्रदेश पुलिस से संपर्क साधा। सैटेलाइट तस्वीरों, संदिग्ध मोबाइल नंबरों से पता लगा कि ये काम पारदी गिरोह का है। रतलाम जिले के दिनेश और रोहन पारदी को चेन्नई जाते समय तमिलनाडु पुलिस ने गिरफ्तार किया।

तमिलनाडु पुलिस अक्टूबर 2018 में गुना आई। संदेहियों के बारे में पता लगा कि वे गुना जेल में बंद हैं। मोहर सिंह पारदी, रूसी पारदी, महेश पारदी, कालिया उर्फ कृष्णा और बिल्टिया पारदी को पुलिस तमिलनाडु ले गई।

मोहर, रूसी, कालिया और महेश को मध्यप्रदेश की गुना सेंट्रल जेल से हिरासत में लिया गया जबकि ब्रजमोहन को अशोक नगर जेल से हिरासत में लिया गया था। सीबी-सीआईडी ने इसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की और पूरी वारदात का खुलासा किया।

मोहर सिंह पारदी, जिसकी गैंग ने इस वारदात को अंजाम दिया।
मोहर सिंह पारदी, जिसकी गैंग ने इस वारदात को अंजाम दिया।

डकैती का मुख्य किरदार गुना का मोहर पारदी था सीबी-सीआईडी ​​अफसरों की तरफ से बताया गया कि डकैती का मुख्य किरदार गुना का मोहर सिंह पारदी था। आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि वह मध्यप्रदेश के गुना जिले के खेजराचक गांव का मूल निवासी है। उसके चाचा और चचेरे भाई, कुछ अन्य रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ मिलकर गिरोह में राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में अपराध कर रहे थे।

मोहर के गिरोह का मुखिया बनने से पहले उसका रिश्तेदार किरण ही गिरोह का मुखिया था। बाद में किरण की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई।

मोहर सिंह की रुकसाद पारदी और नवल पारदी से दुश्मनी थी, क्योंकि उसे शक था कि वे उसके गिरोह द्वारा किए गए अपराधों की जानकारी स्थानीय पुलिस को दे रहे हैं। इसलिए मोहर सिंह ने जून 2015 में एक विवाद के दौरान उनकी गोली मारकर हत्या कर दी।

इस हत्या में मोहर सिंह, उसके भाई रामभजन, गजराज, उसकी बहन सुलोचना, उसकी पत्नी बनवारा बाई और उसके गिरोह के कुछ अन्य सदस्य शामिल थे।

डकैती से पहले एक सप्ताह रेकी की मोहर के गिरोह के सदस्य 2016 में तमिलनाडु पहुंचे। वे सड़क किनारे या रेल की पटरियों के पास अस्थायी घर बनाकर रहने लगे। पुलिस ने बताया कि वे दिहाड़ी मजदूरी और रेहड़ी-पटरी का काम करते थे। इसी दौरान अपराध करने के लिए अलग-अलग जगह चुनते थे।

तमिलनाडु में रहने के दौरान मोहर को सलेम में रहने वाले गिरोह के एक सदस्य के जरिए सलेम-चेन्नई रेल मार्ग पर नकदी की आवाजाही के बारे में पता चला। मोहर सिंह ने अपने कुछ करीबी साथियों के साथ एक हफ्ते से भी ज्यादा समय तक अयोथियापट्टनम और विरुधाचलम रेलवे स्टेशनों के बीच लगातार सफर कर रेकी की।

इसके बाद मोहर और उसके 7 साथियों ने सेलम और विरुधाचलम रेलवे स्टेशन के बीच डाका डालने की प्लानिंग तय की। दरअसल, इन दोनों स्टेशन के बीच ट्रेन 45 मिनट से ज्यादा समय तक चलती है।

बैटरी वाले कटर से काटी रेल की छत घटना वाले दिन मोहर और उसकी गैंग ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा कर रहे थे।

नोटों के बंडलों को छह लुंगियों में लपेटा और बांध दिया। योजना के अनुसार, बाकी सदस्य विरुधाचलम स्टेशन के पास वायलूर ओवरब्रिज पर 200 मीटर से ज्यादा दूर ट्रैक के किनारे इंतजार कर रहे थे।

जब ट्रेन इस घुमावदार पटरी पर चल रही थी और विरुधाचलम के पास पहुंच रही थी, तो धीमी गति से चल रही ट्रेन की छत पर बैठे लोगों ने लुंगियों में लिपटे पैसों के बंडल जमीन पर इंतजार कर रहे गिरोह के दूसरे सदस्यों की ओर फेंक दिए। फिर वे धीमी गति से चल रही ट्रेन से कूदकर भाग गए।

नोटबंदी से रद्दी हो गए नोट पुलिस को आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि डकैतों ने लूट के रुपयों से कुछ प्रॉपर्टी सहित अन्य सामान खरीदे थे।

गिरफ्तारी के चार साल बाद साल 2021 में डकैती के मामले में मोहर बरी हो गया, लेकिन अन्य आपराधिक गतिविधियों के कारण वो वांटेड लिस्ट में ही रहा।

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