नेताओं पर नहीं होता एक्शन; वजह- आचार संहिता सिर्फ गाइडलाइन, कानून नहीं

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मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण से पहले दोनों प्रमुख दलों के नेता एक-दूसरे को हत्यारा, नालायक, डाकू, रामद्रोही बता रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग चुप है। चुनाव आचार संहिता में लिखा है कि कोई भी प्रत्याशी जाति, धर्म के आधार पर वोट नहीं मांग सकता। व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता। इसके बावजूद नेता ये ‘लक्ष्मण रेखा’ क्यों लांघ रहे हैं?

दैनिक भास्कर ने एमपी के चुनाव प्रचार में ऐसे ही कुछ शिकायती बयानों की पड़ताल की। पता चला कि चुनाव आयोग उम्मीदवारों के लिए आचार संहिता जारी जरूर करता है, लेकिन एक्शन के नाम पर उसके हाथ बंधे हुए हैं।

भास्कर संवाददता ने मध्यप्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी अनुपम राजन को भी नेताओं के ऐसे ही बयान याद दिलाए, लेकिन उन्होंने इस पर कोई जवाब नहीं दिया। इस मामले में एक्सपर्ट का कहना है कि नेता जिन शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं वो आचार संहिता उल्लंघन के दायरे में आता है। इस पर क्या कार्रवाई करना है, ये चुनाव आयोग के अधिकारियों पर निर्भर करता है।

आखिरकार आयोग ऐसी शिकायतों पर क्या एक्शन ले सकता है। क्या कोई सजा का प्रावधान है या फिर केवल नोटिस दिया जाता है, क्या कहते हैं आयोग के अधिकारी। सबसे पहले जानिए नेताओं के वो बयान जिन्हें लेकर आयोग को शिकायत की गई, लेकिन इन पर बयानों को लेकर नेताओं के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया।

मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ये बयान तब दिया था, जब वे भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी रोडमल नागर की नामांकन रैली में शामिल हुए थे। उन्होंने राजगढ़ के कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह को लेकर कहा था- ‘दिग्विजय सिंह ने जिंदगी भर हिंदू और मुस्लिमों का लड़ाने का काम किया है और वोट का रास्ता ढूंढा है। भगवान राम के मंदिर का लोकार्पण करने का निमंत्रण ठुकराया। वह सबसे बड़े रामद्रोही हैं।

किसने शिकायत की: कांग्रेस ने इस बयान को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए इसे धर्म की राजनीति बताकर आयोग में शिकायत की थी।

क्या एक्शन हुआ: चुनाव आयोग ने कोई नोटिस भी जारी नहीं किया।

राजगढ़ की ही सभा में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने कहा था कि राजगढ़ का चुनाव साधारण नहीं है, बल्कि भगवान राम का अपमान करने वाले, भारतीय संस्कृति का अपमान करने वाले, आतंकवादियों को गले लगाने वाले व्यक्ति दिग्विजय सिंह के साथ है।

किसने शिकायत की: कांग्रेस ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की, आचार संहिता का उल्लंघन बताया।

क्या एक्शन हुआ: चुनाव आयोग खामोश रहा, कोई कार्रवाई नहीं।

झाबुआ से कांग्रेस के लोकसभा प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया ने एक सभा में वन मंत्री नागर सिंह के पिता भुवान सिंह के खिलाफ टिप्पणी की। उन्होंने कहा, नागर के पिता गांव डोबलाझिरी में योजना बनाकर लूट की वारदात को अंजाम देते थे।

जब मैं मंत्री था तो पुलिस से कहकर गिरफ्तार कराया था। जेल से छूटने के बाद भुवान सिंह ने कहा कि अब कांग्रेस के लिए काम करूंगा। वही नागर सिंह अब कांग्रेस के खिलाफ खड़े हो गए हैं।

किसने शिकायत की: बीजेपी ने कांतिलाल भूरिया के खिलाफ आचार संहिता उल्लंघन की चुनाव आयोग को शिकायत की।

क्या एक्शन हुआ: कांतिलाल भूरिया और विक्रांत भूरिया के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के लिए आईपीसी की धारा 188 के तहत एफआईआर दर्ज।

राहुल गांधी जब 9 अप्रैल को पहले चरण के चुनाव प्रचार के लिए शहडोल पहुंचे थे, तब उन्होंने उमरिया में महुआ चखा था। इस पर पलटवार करते हुए डॉ. मोहन यादव ने कहा था कि राहुल ने बता दिया कि उनके शौक क्या है ?

इस बयान पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सीएम पर निशाना साधते हुए कहा था कि महुआ राहुल गांधी का शौक नहीं है, पर क्या सीएम का शौक क्या जमीन हड़पना है।

क्या हुआ: इस मामले की कोई शिकायत नहीं हुई।

27 अप्रैल को भिंड में लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी फूलसिंह बरैया के समर्थन में सभा के लिए उमरी पहुंचे जीतू पटवारी ने कहा कि पीएम मोदी मंगलसूत्र से लेकर नफरत, बंटवारा… हर तरह की भाषा बोल रहे हैं।

मतदान का प्रतिशत उन्हें महसूस करा रहा है कि वे हारने वाले हैं। रावण भी कहता था कि मुझे मारने वाला संसार में कोई नहीं, लेकिन राम ने उसका वध किया। पीएम की भाषा रावण जैसी है, अहंकार रावण जैसा है।

क्या हुआ: इस मामले की कोई शिकायत नहीं की गई।

अमर सिंह ने 24 मार्च को दिग्विजय सिंह का एक पुराना वीडियो पोस्ट करते हुए उन्हें हिंदू विरोधी बताया। उन्होंने लिखा कि दिग्विजय सिंह सावरकर के नाम का गलत इस्तेमाल करते हुए टिप्पणी करते हैं कि हिंदुत्व का हिंदू धर्म से कोई नाता नहीं है। वे हिंदुओं को जाति धर्म के नाम पर भड़काने का काम करते हैं।

किसने शिकायत की: कांग्रेस ने उनके बयान के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत की।

क्या एक्शन हुआ: आयोग के आदेश पर सोशल मीडिया से अमर सिंह ने ये पोस्ट हटाई।

जिस दिन नकुलनाथ ने ये बयान दिया उससे एक दिन पहले ही अमरवाड़ा से कांग्रेस विधायक कमलेश शाह ने बीजेपी जॉइन की थी। दूसरे दिन नकुलनाथ ने उन पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आदिवासी लोग भोले भाले होते है, सरल व्यवहार के होते है, गद्दार और बिकाऊ नहीं होते, लेकिन आपके चुने विधायक गद्दार भी निकले और बिकाऊ भी निकले। मैं आपसे पूछना चाहता हूं क्या आप उन्हें माफ करेंगे। आने वाले चुनाव में यदि आप अपने इस गांव से एक तरफा वोट करेंगे और मुझे जिताएंगे तो मैं समझूंगा कि आपने कभी उन्हें माफ नहीं किया।

क्या हुआ: नेताओं के बीच केवल बयानबाजी हुई, शिकायत नहीं हुई।

सीएम डॉ. मोहन यादव ने ये बयान छिंदवाड़ा के कांग्रेस प्रत्याशी नकुलनाथ को लेकर दिया था। दरअसल, वे शहपुरा गांव में सभा ले रहे थे। इस दौरान उन्होंने नकुलनाथ और कमलनाथ पर जमकर हमला बोला।

कहा- “गोंड समाज के राजपरिवार के व्यक्ति कमलेश शाह के बारे में कितना गंदा बोला जा रहा है, बरसों तक तुमको (कमलनाथ) माथे पर बैठाया, उसके बाद तुम्हारी पत्नी को बैठाया और बेटा ऐसा नालायक कि गाली बक रहा है और फिर जनता से वोट मांगेंगे।

क्या हुआ: वार-पलटवार के अलावा इस मामले की कोई शिकायत नहीं हुई।

छिंदवाड़ा में बीजेपी-कांग्रेस की एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत

छिंदवाड़ा में पहले चरण यानी 19 अप्रैल को मतदान हुआ था। चुनाव से पहले कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने नकुलनाथ पर मतदाताओं को लुभाने के लिए पैसे बांटने का आरोप लगाया था। बीजेपी के प्रतिनिधिमंडल ने आयोग से एक्शन लेने की मांग की थी।

विजयवर्गीय ने कहा था कि कमलनाथ ग्राम प्रधानों को घर बुला रहे हैं और उन्हें कैश दे रहे हैं। नकुलनाथ शराब, बर्तन और पैसे बांट रहे हैं। चुनाव आयोग को उन घरों की तलाशी लेनी चाहिए जहां नुकलनाथ रुके हैं, क्योंकि वहां पैसों के बंडल रखे हुए हैं। इस मामले में कांग्रेस ने भी पलटवार करते हुए चुनाव आयोग से शिकायत की थी। इस पर कोई एक्शन नहीं हुआ।

अब जानिए आयोग क्यों नहीं ले पाता एक्शन?

एक्सपर्ट बोले- दंडात्मक कार्रवाई का नहीं है अधिकार

आदर्श आचार संहिता के मैन्युअल में ही लिखा है कि ये कोई सांविधिक दस्तावेज नहीं है। इसके कई प्रावधान ऐसे हैं जिसका उल्लंघन करने पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। आयोग ने अपने मैन्युअल में इसका भी जिक्र किया है कि 1980 के दशक में आयोग की तरफ से केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया।

प्रस्ताव में लिखा था कि आदर्श आचार संहिता के कुछ प्रावधानों को कानून का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसे निर्वाचन सुधार से संबंधित गोस्वामी समिति के सामने भी रखा गया। समिति की सिफारिश पर सरकार ने दो नई धाराएं 124 और 126 क को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन के लिए जोड़ा, लेकिन ये विधेयक संसद से पारित नहीं हो सका।

इसके बाद आयोग ने आदर्श संहिता को वैधानिक मान्यता देने के अपने प्रस्ताव को वापस ले लिया। हालांकि, आदर्श आचार संहिता को कानूनी मान्यता नहीं है, लेकिन भारतीय दंड संहिता और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में कई प्रावधानों में कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त बोले- नेता भी जानते हैं क्या बयान देना है

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत कहते हैं कि चुनाव 6 से 8 हफ्तों में खत्म हो जाते हैं, कोई भी कानून इतनी जल्दी प्रभावी कार्रवाई नहीं कर सकता। चुनाव आयोग को लगता है कि नेता के बयान से आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है तो वह उस पर 1 से 3 दिन तक प्रचार करने पर बैन लगा सकता है।

आईपीसी की धारा-188 के तहत कार्रवाई पर रावत कहते हैं, इसमें 500 जुर्माना से लेकर 6 माह तक की सजा का प्रावधान है। हालांकि, आयोग भी सजा जैसी सख्त कार्रवाई नहीं करता। अब आयोग की मॉनिटरिंग और एक्शन का दायरा काफी बढ़ गया है।

रावत कहते हैं, चुनाव में नेताओं की बयानबाजी पर पूरी तरह से रोक लगाना भी गलत होगा। आयोग के पास पर्याप्त ताकत है, सुप्रीम कोर्ट के 1977 के एक निर्णय के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हर मामले में वर्तमान कानूनों के तहत एक्शन लेने का अधिकार है।

भोपाल की प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर पर लगाया था 72 घंटे का बैन

बीजेपी ने इस बार प्रज्ञा ठाकुर को टिकट नहीं दिया। जब वे पिछला लोकसभा चुनाव लड़ रही थीं, तब उनके एक बयान की वजह से चुनाव आयोग ने 72 घंटे तक उनके प्रचार पर रोक लगा दी थी।

दरअसल, प्रज्ञा ठाकुर ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर बयान दिया था। आयोग ने इसे विद्वेष फैलाने वाला बयान माना था। आयोग ने लिखित आदेश में प्रज्ञा ठाकुर को जमकर फटकार लगाई थी। नसीहत देते हुए कहा था कि इस तरह के बयानों से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भविष्य में बचना चाहिए। आयोग ने उनके बयान को भड़काऊ और धार्मिक आधार पर नफरत फैलाने वाला पाया था।

मुख्य चुनाव आयुक्त की नसीहत भी राजनीतिक दलों ने नहीं मानी

मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने 16 मार्च को लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान करते हुए राजनीतिक दलों से गुजारिश की थी कि राजनेता कैंपेन के दौरान पर्सनल अटैक से बचें और डेकोरम को मेंटेन रखें।

उन्होंने कहा था कि आजकल जल्दी-जल्दी दोस्त और दुश्मन बनने की प्रक्रिया का चलन बढ़ गया है, पार्टियां इतना गंदा न बोलें कि वो एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएं और आगे कुछ न हो। मुंह से जो भी निकलता है, वो डिजिटल तौर पर हमेशा के लिए रिकॉर्ड हो जाता है और बार-बार चलता रहता है।

खराब शब्दों की गंदी डिजिटल यादें बनाने से बचें ,क्योंकि एक बार जब लड़ाई-झगड़ा होता है, तो प्रेम का धागा टूट जाता है और जब यह टूट जाता है, तो फिर बड़ी मुश्किल होती है।

निर्वाचन आयोग आचार संहिता उल्लंघन का दंडात्मक रिकॉर्ड नहीं रखता

मुंबई के आरटीआई एक्टिविस्ट जीतेंद्र घाड़गे ने पिछले दिनों सूचना के अधिकार के तहत निर्वाचन आयोग से जानकारी मांगी थी कि लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 में आयोग ने कितने नेताओं को आचार संहिता उल्लंघन पर नोटिस जारी किए, और कितने नेताओं के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की गई थी।

इस आवेदन पर चुनाव आयोग के सूचना अधिकारी की तरफ से जवाब दिया गया कि वह ऐसे उम्मीदवार का रिकॉर्ड नहीं रखता जिनके खिलाफ आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर नोटिस जारी किया गया हो।

साथ ही दंडात्मक कार्रवाई के आवेदन पर आयोग की तरफ से जवाब दिया गया कि डेटा आयोग के पास उपलब्ध नहीं है। आयोग की तरफ से जवाब देते हुए ये भी कहा कि जो जानकारी मांगी गई है उसे इकट्ठा करने में आयोग के संसाधनों का दुरुपयोग होगा। सूचना अधिकारी ने इसके लिए आरटीआई अधिनियम की धारा 7(9) का हवाला दिया।

आरटीआई अधिनियम की धारा 7 (9) कहती है कि आवेदक को सूचना सामान्यत: उसी रूप में प्रदान की जाएगी जिसमें वह मांगी गई है। जब तक कि वह सार्वजनिक प्राधिकरण के संसाधनों का असंगत रूप से दुरुपयोग न करें या सुरक्षा या संरक्षण के लिए हानिकारक न हो।

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