तीन सीटों पर जाति, तीन पर बड़े चेहरों के कारण मुकाबला बराबरी का
हमने 3 करोड़ घर बनाने का संकल्प लिया है। 5 साल तक किसान सम्मान निधि चालू रहेगी और गरीबों को मुफ्त राशन मिलता रहेगा। मोदी की गारंटी वहां से शुरू होती है जहां दूसरों से उम्मीद खत्म हो जाती है।
– नरेंद्र मोदी, 14 अप्रैल को होशंगाबाद में
हमारी सरकार बनने पर किसानों का कर्जा माफ करेंगे। समर्थन मूल्य पर फसल खरीदी का कानून बनेगा। हर गरीब महिला को सालाना एक लाख रुपए देंगे। जहां 50% से ज्यादा आदिवासी होंगे, वहां कलेक्टर नहीं होंगे। आदिवासियों की समिति काम करेगी।
– राहुल गांधी, 8 अप्रैल को शहडोल में
मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस-भाजपा के शीर्ष नेताओं की रैलियों के भाषणों पर गौर करें तो पता चलता है कि दोनों का फोकस किसान, गरीब और महिलाओं पर हैं। 2019 में MP की 29 में 28 सीटें जीतने वाली भाजपा यहां क्लीन स्वीप की उम्मीद कर रही है। वहीं कांग्रेस 2023 के विधानसभा चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद दिग्गजों के साथ चुनावी मैदान में है।
MP की 29 में से 6 सीटों पर कांटे की टक्कर दिख रही है। यानी नतीजे किसी भी तरफ जा सकते हैं। जिन सीटों पर कांटे का मुकाबला है उनमें राजगढ़, रतलाम, छिंदवाड़ा, मंडला, सीधी, सतना और मुरैना सीट शामिल है। इनमें तीन सीटों पर जाति और तीन पर बड़े चेहरे फैक्टर हैं। दैनिक भास्कर ने लोकसभा चुनाव के हर फेज में हवा का रुख और मुद्दों को समझने की कोशिश की। पढ़िए क्या है MP में हवा का रुख…

4 पॉइंट्स में समझिए हर चरण की स्थिति
पहला चरण : 6 सीटों में से छिंदवाड़ा, मंडला और सीधी में कांटे के मुकाबले की स्थिति है। बालाघाट, शहडोल और जबलपुर में समीकरण भाजपा के पक्ष में जा रहे हैं।
दूसरा चरण: 6 सीटों में केवल सतना सीट पर कांटे का मुकाबला कहा जा रहा है। यहां जातिगत समीकरण हावी है। बाकी 5 सीटों के समीकरण भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं।
तीसरा चरण: 9 सीटों में राजगढ़ और मुरैना दो सीटों पर कांटे का मुकाबला नजर आ रहा है। राजगढ़ से दिग्विजय सिंह मैदान में हैं। मुरैना में जातिगत फैक्टर हावी है।
चौथा चरण: 8 सीटों में से रतलाम, धार और खंडवा में जातिगत समीकरण और विधानसभा के नतीजे असर डाल रहे हैं। कांटे की टक्कर है। पांच सीटों पर भाजपा की मजबूत बताई जा रही।
अब सिलसिलेवार समझिए हर चरण की तस्वीर

सबसे पहले फर्स्ट फेज की 6 सीटों के हाल…
छिंदवाड़ा, मंडला में कांटे की टक्कर, सीधी में भाजपा के वोट बंटे
छिंदवाड़ा : ये अकेली ऐसी सीट है जो 2019 के चुनाव में कांग्रेस के खाते में आई थी। कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ यहां से एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। BJP ने उनके सामने विवेक बंटी साहू को मैदान में उतारा है। विवेक साहू का ये पहला लोकसभा चुनाव है। इससे पहले वे दो बार कमलनाथ के सामने विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं।
इस सीट को जीतने के लिए BJP ने पूरी ताकत झोंक दी है। गृहमंत्री अमित शाह का रोड शो हो चुका है। BJP ने कमलनाथ के कई करीबी नेताओं को तोड़ लिया है। इनमें दीपक सक्सेना, कमलेश शाह जैसे बड़े नाम है। वहीं कमलनाथ ने अपने गढ़ को बचाने के लिए खुद मोर्चा संभाला हुआ है। वे लोगों से 40 साल के संबंधों का हवाला दे रहे हैं।
छिंदवाड़ा में राजनीतिक दलों के इन दांव पेंच को लेकर वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश जैन का कहना है कि इन स्थितियों को देखते हुए अभी कुछ भी कहना बेहद मुश्किल है।

बालाघाट: यहां BJP ने भारती पारधी को टिकट दिया है। वे पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रही हैं। कांग्रेस ने पूर्व विधायक अशोक सरस्वार के बेटे सम्राट सिंह को मैदान में उतारा है। बसपा से कंकर मुंजारे के मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है।
वरिष्ठ पत्रकार सोहन वैद्य के मुताबिक बालाघाट में जातिगत समीकरण हावी रहते हैं। मुंजारे लोधी समुदाय से आते हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि बालाघाट विधायक और कंकर मुंजारे की पत्नी अनुभा मुंजारे के कारण लोधी वोट मिल सकते हैं। हालांकि, कंकर मुंजारे के मैदान में उतरने से ऐसा होता दिखाई नहीं देता। वहीं भारती पारधी जिस पंवार समुदाय से आती हैं उन्हें इस समाज के वोट मिलने की उम्मीद है।
मंडला: भाजपा उम्मीदवार फग्गन सिंह कुलस्ते विधानसभा चुनाव हार कर फिर मैदान में हैं। लोग उनसे नाराज हैं, लेकिन कुलस्ते को मोदी और राम मंदिर फैक्टर पर भरोसा है। कांग्रेस के ओमकार सिंह मरकाम आदिवासियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। उन्हें इसका फायदा मिलता दिख रहा है। मंडला में विधानसभा में भी कांग्रेस 8 में से 5 सीटें जीती हैं।
इस लिहाज से यहां अब मुकाबला टक्कर का है। यहां गोंगपा ने महेश कुमार वट्टी को टिकट दिया है। वे MA, LLB पास व गोंडी साहित्यकार हैं। वे GCF जबलपुर की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए हैं। गोंगपा को लेकर भी चर्चा है, वो परिणाम पर भी असर डाल सकती है।

शहडोल: हिमाद्री सिंह कांग्रेस उम्मीदवार फुंदेलाल मॉर्को पर लगातार बढ़त बनाए हुए हैं। मार्को को आखिरी समय में टिकट मिला है। यहां से कांग्रेस को जब कोई चेहरा नहीं मिला, तब मार्को को आगे किया गया। अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित शहडोल सीट पर BJP मजबूत नजर आती है। लोकसभा की आठ में से सात विधानसभा सीटों पर BJP काबिज है।
सीधी: यहां कमलेश्वर पटेल अपना राजनीतिक करियर बचाने के लिए भाजपा के डॉ. राजेश मिश्रा के सामने पूरी ताकत झोंक चुके हैं। सीधी में पेशाब कांड का वीडियो वायरल करने में डॉ. मिश्रा के बेटे की भूमिका की चर्चा है। इसे लेकर सीधी के पूर्व विधायक केदारनाथ शुक्ला भी डॉ. राजेश मिश्रा से नाराज हैं।
इसी पेशाब कांड की वजह से शुक्ला का राजनीतिक करियर खत्म हुआ है। चर्चा ये भी है कि सीधी की पूर्व सांसद रीति पाठक भी यहां डॉ. मिश्रा के लिए पूरी ताकत नहीं लगा रही हैं। पाठक को विधायक बनने पर भी MP कैबिनेट में भी जगह नहीं मिली है। इससे वह खिन्न बताई जा रही हैं।
जबलपुर: BJP से आशीष दुबे कांग्रेस के दिनेश यादव से काफी आगे हैं। वजह ये है कि कांग्रेस के नेताओं का यादव को सपोर्ट नहीं है। सभी ने चुनाव लड़ने से इनकार किया तो यादव को चुनाव लड़ना पड़ा। कांग्रेस के मेयर जगत बहादुर अन्नू, पूर्व विधायक नीलेश अवस्थी, एकता ठाकुर BJP में शामिल हो चुके हैं। यहां कांग्रेस संगठन से ही जूझ रही है।

दूसरे चरण की 6 सीटें…
सतना में BJP मुश्किल में, बाकी 5 सीटों पर आगे
सतना: BJP उम्मीदवार गणेश सिंह कांग्रेस और बसपा के बीच मुश्किल में फंसते दिख रहे हैं। बसपा के नारायण त्रिपाठी ने ब्राह्मण वोटों का गणित गड़बड़ा दिया है। गणेश सिंह ब्राह्वण वोटों को हासिल करने के लिए जोड़तोड़ कर रहे हैं। 2019 में कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने वाले राजाराम त्रिपाठी को भाजपा में शामिल कर डैमेज कंट्रोल की कोशिश हुई है।
सतना में गणेश सिंह से ये सवाल पूछा जा रहा है कि उन्होंने 20 साल से सांसद रहते हुए क्षेत्र के लिए क्या किया? गणेश सिंह पर अपने ही परिवार को आगे बढ़ाने के भी आरोप लग रहे हैं। खास बात ये है कि विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की सतना में रैली के बावजूद गणेश सिंह चुनाव हार गए थे।

रीवा: BJP के जनार्दन मिश्रा को कांग्रेस की नीलम अभय मिश्रा चुनौती दे रही हैं। नीलम भी पहले BJP से विधायक रह चुकी हैं। उनके पति अभय मिश्रा वर्तमान में कांग्रेस से विधायक हैं। अभय मिश्रा और जनार्दन BJP में रहते हुए भी एक दूसरे के विरोधी रहे हैं। ऐसे में यहां कांग्रेस पूरी ताकत से चुनाव लड़ रही है, लेकिन डिप्टी CM राजेंद्र शुक्ल से जनार्दन की नजदीकी ब्राह्मण वोटर्स को भाजपा के लिए लामबंद करती दिख रही है।
दमोह: BJP के राहुल लोधी कांग्रेस के तरबर सिंह लोधी पर भारी पड़ रहे हैं। तरबर बिकाऊ और टिकाऊ के मुद्दे पर अपनों के बीच जा रहे हैं। लेकिन यहां जयंत मलैया और प्रहलाद पटेल दोनों गुट राहुल को जिताने में जुटे हैं। वरिष्ठ पत्रकार नारायण सिंह ठाकुर का कहना है कि विधानसभा चुनाव में राहुल लोधी ने जयंत मलैया की मदद की। अब मलैया राहुल को मदद कर रहे हैं।
खजुराहो: BJP के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा की राह आसान है। वीडी के सामने 15 अप्रैल तक कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं था। अब कांग्रेस और सपा ने फॉरवर्ड ब्लॉक के आरबी प्रजापति को अपना समर्थन दिया है। यहां समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार मीरा यादव का नामांकन खारिज कर दिया गया था।
टीकमगढ़: मौजूदा सांसद वीरेंद्र कुमार के सामने कांग्रेस के पंकज अहिरवार एकदम नया चेहरा है। यहां अहिरवार वोटों की संख्या 4 लाख से ज्यादा है, लेकिन कांग्रेस को इसका सीधा फायदा मिलता नहीं दिख रहा है।
होशंगाबाद : इस सीट पर पहली बार चुनाव लड़ रहे भाजपा के दर्शन सिंह कांग्रेस के दिग्गज संजय शर्मा पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। एक-एक कर कई नेता कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा जॉइन कर चुके हैं। पॉलिटिकल एक्सपर्ट का कहना है कि यदि मोदी मैजिक कम हुआ तो संजय भाजपा के खेमे में सेंधमारी कर सकते हैं। वजह ये है कि वे लंबे समय तक भाजपा में ही रहे हैं।

तीसरे चरण की 9 सीटों का हाल
राजगढ़ में आखिरी चुनाव का इमोशनल कनेक्ट, मुरैना में कड़ी टक्कर
राजगढ़: दिग्विजय सिंह की बढ़त को रोकने के लिए BJP ने हिंदुत्व का कार्ड तैयार कर लिया है। BJP को मालूम है कि यहां मौजूदा सांसद रोडमल नागर से लोग नाराज हैं। इसलिए BJP अब यहां ये कह रही है कि सांसद के चेहरे को नहीं बल्कि मोदी को देखकर वोट करें।
दिग्विजय 77 की उम्र में खुद को सेहतमंद बताने के लिए रोज पैदल चलकर जनता के बीच पहुंच रहे हैं। दिग्विजय जनता से कह रहे हैं कि ये उनका आखिरी चुनाव है। इमोशनल कनेक्ट बढ़ाने के लिए वे ये भी कह चुके हैं कि इस बार मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं है। लोगों से मदद लेनी पड़ेगी।

सागर: BJP की लता वानखेड़े कांग्रेस के गुड्डू बुंदेला को बाहरी बताकर बढ़त बनाए हुए हैं। संगठन की नेता होने से वानखेड़े के लिए BJP का हर धड़ा काम कर रहा है।
मुरैना: कांग्रेस के सत्यपाल उर्फ नीटू सिकरवार भाजपा को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। सिकरवार परिवार का यहां अच्छा प्रभाव है। भाजपा के शिवमंगल को सिर्फ मोदी फैक्टर से उम्मीद है। मुरैना की 8 विधानसभा सीटों में 5 पर कांग्रेस काबिज है। इस हिसाब से यहां मुकाबला टक्कर का दिख रहा है।
विदिशा: शिवराज की राह बेहद आसान लग रही है। कांग्रेस उम्मीदवार प्रताप भानु शर्मा 33 साल बाद फिर शिवराज के सामने चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन यहां चर्चा वोटों के मार्जिन की है।

गुना: ज्योतिरादित्य सिंधिया यादवों की नाराजगी के बावजूद बढ़त बनाए हुए हैं। सिंधिया को पिछला चुनाव हारने की सहानुभूति का भी फायदा मिल रहा है। सिंधिया का पूरा परिवार यहां सक्रिय है। यादव वोटर्स की संख्या करीब 75 हजार हैं, लेकिन अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा दूसरे वर्ग के वोटर्स का फायदा सिंधिया को मिल सकता है।
ग्वालियर: BJP के भारत सिंह कुशवाहा को नरेंद्र सिंह तोमर का समर्थन हासिल है। सिंधिया की भी मदद मिल रही है। भाजपा यहां शहर में पहले से ही मजबूत रही है। पहली बार भाजपा ने ग्रामीण क्षेत्र से उम्मीदवार उतार कर गांवों को भी साधने की कोशिश की है। कांग्रेस उम्मीदवार प्रवीण पाठक की इमेज अच्छी है, लेकिन संगठन के तौर पर यहां भाजपा कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा मजबूत है।
भिंड: भाजपा ने यहां से मौजूदा सांसद संध्या राय, तो कांग्रेस ने भांडेर से विधायक फूल सिंह बरैया पर दांव खेला है। इस सीट पर 30 प्रतिशत दलित व आदिवासी वोटर हैं। बरैया की दलित वोटरों में गहरी पकड़ है। वहीं भाजपा की संध्या राय को दलित के साथ-साथ OBC व सर्वण जातियों का बड़ा समर्थन मिलता रहा है।
भोपाल: कांग्रेस के नए चेहरे अरुण श्रीवास्तव के सामने BJP के पूर्व महापौर आलोक शर्मा लगातार बढ़त बनाए हुए हैं। भोपाल में 2019 में भी वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा पहली बार चुनाव लड़ी साध्वी प्रज्ञा सिंह को मिला था। ऐसे में आलोक तो भोपाल के लिए जाना-पहचाना चेहरा हैं, उन्हें इसका सीधा फायदा मिलता दिख रहा है।
बैतूल: BJP के दुर्गादास उइके बढ़त बनाए हुए हैं। यहां कांग्रेस उम्मीदवार रामू टेकाम के खिलाफ उनकी ही पार्टी में नाराजगी दिख रही है। वजह ये है कि टेकाम पिछला चुनाव भी हारे थे, उन्हें रिपीट किया गया है। यहां कई नेताओं ने BJP का दामन थाम लिया है।

चौथे चरण की 8 सीटों में हवा का रुख
रतलाम में कांग्रेस के भूरिया आगे, खंडवा और धार में सीधी टक्कर, 5 पर BJP को बढ़त
इंदौर : BJP के मौजूदा सांसद शंकर लालवानी को मोदी का ही सहारा है। कभी लालवानी के टिकट की चर्चा छेड़ने वाले मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इंदौर के चुनाव से दूर हैं। कांग्रेस प्रत्याशी अक्षयकांति बम के पास पहचान का संकट है। लोगों के बीच चर्चा हार-जीत के अंतर की है।
उज्जैन : महाकाल के बाद सबसे ज्यादा चर्चा महाकाल लोक की है। मोदी-शाह इसे सब जगह गिना रहे हैं। कांग्रेस के पास ऑप्शन नहीं है। महेश परमार 2018 में विधायक, 2022 में महापौर, 2023 में फिर विधायक लड़े और अब 2024 में सांसद प्रत्याशी हैं। यानी 5 साल में चौथा चुनाव।
रतलाम: कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया आक्रामक प्रचार कर रहे हैं। वे भील समुदाय से आते हैं। दूसरी तरफ BJP से अनीता नागर सिंह चौहान हैं। अनीता भिलाला समुदाय से आती हैं। इस सीट पर भील और भिलाला 65:35 के अनुपात में हैं। इस वजह से कांग्रेस ने भील समुदाय को साधा है। राम मंदिर और मोदी फैक्टर रतलाम-झाबुआ के शहरी मतदाताओं के बीच ही सिमटकर रह गए हैं। ऐसे में यहां कांटे की टक्कर हो गई है।

देवास: भाजपा ने पूर्व न्यायाधीश और सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी को दोबारा उतारा है, लेकिन जज साहब यहां हिंदुत्व के ब्रांड ऐंबैस्डर हैं। उन्हें इसका फायदा मिलता दिख रहा है। पूर्व सांसद सज्जन सिंह वर्मा चुनाव से दूर हैं। वहीं BJP छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए दीपक जोशी भी ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के राजेंद्र बघेल अकेला ही किला लड़ा रहे हैं।
धार: BJP भोजशाला के सर्वे के बहाने हिंदुत्व के मुद्दे को आगे बढ़ाने में कामयाब दिख रही है। यहां कांग्रेस उम्मीदवार राधेश्याम मुवेल का उनकी पार्टी के भीतर विरोध है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी मुवेल के लिए ताकत झोंक रहे हैं, लेकिन हिंदुत्व के एजेंडे पर यहां कांग्रेस कमजोर दिख रही है।

खरगोन: गजेंद्र पटेल ने पार्टी के भीतर हो रहे विरोध को कंट्रोल कर लिया है। पटेल समर्थक उन्हें मोदी सरकार में निमाड़ से मंत्री प्रोजेक्ट कर रहे हैं। इससे BJP फायदे में है। कांग्रेस ने विधानसभा में इस लोकसभा की 8 में से 5 सीटें जीती हैं। मगर, विधायक लोकसभा उम्मीदवार का साथ देते नजर नहीं आ रहे। कांग्रेस ने पोरलाल खरते को टिकट दिया है। जिनका प्रभाव बड़वानी, सेंधवा के आदिवासी इलाकों में है।
मंदसौर: राजस्थान से लगी हुई सीट BJP का गढ़ है। 2009 के चुनाव के छोड़कर BJP यहां से नहीं हारी। कांग्रेस ने पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन की जगह दिलीप गुर्जर को उतारा है। जो क्षेत्र के लिए नए होने के साथ बाहरी हैं, BJP इसे मुद्दा बना रही है।
खंडवा: BJP के ज्ञानेश्वर पाटिल के सामने कांग्रेस के नरेंद्र पटेल हैं। नरेंद्र के लिए अरुण यादव काम कर रहे हैं। ये फैक्टर उनके लिए फायदेमंद है। पाटिल से पूर्व सांसद स्व. नंदकुमार सिंह चौहान के परिवार की नाराजगी है। बेटे को टिकट नहीं मिलने से चौहान परिवार भाजपा के साथ नहीं है। यहां कांग्रेस ताकत तो लगा रही है, लेकिन खंडवा बीते एक दशक में BJP का गढ़ बन गया है।

एक्सपर्ट बोले- मूल मुद्दे चुनाव से गायब
मप्र में हवा के इस रुख पर वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल कहते हैं कि चुनाव में मूल मुद्दे गायब हो रहे हैं, जो चिंता की बात है। वे कहते हैं कि लोकसभा चुनाव सरकार की 5 साल की मार्कशीट होते हैं। उस सरकार की राष्ट्रीय नीतियां कैसी थीं, कार्यक्रम कैसे थे, देश की आर्थिक सेहत के क्या हाल रहे ? नई पीढ़ी के लिए सरकार की कितनी चिंता रही। ये सब कुछ आंकलन करने के लिए होता है।

हालांकि, CSDS के अभय दुबे कहते हैं कि लोग अपने मुद्दों से परेशान है। भाजपा के पक्ष में सबसे बड़ा फैक्टर ये है कि उनके पास सुपरिभाषित नेतृत्व है। लाभार्थी स्कीम हैं। इसलिए वे लोगों को राजनीतिक स्थिरता का भरोसा दिलाने में सफल दिखते हैं।

