पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः ।।”
प्रकृति हमारा मातृवत पोषण कर रही है। हमें जीवन में जो कुछ भी प्राप्त है वह प्रकृति द्वारा प्रदत्त है। अतः प्रकृति संरक्षण, धरा को हरितिमा सम्पन्न बनाना तथा जल, जमीन, जंगल एवं अन्यान्य प्राकृतिक अवयवों को सहेज कर रखना हमारा सबका पहला उत्तरदायित्व है ..! प्रकृति के उपासक हैं – हम। हमारा शरीर पंचतत्व से बना है। भारत ने सदियों से प्रकृति के संरक्षण का सन्देश पूरी दुनिया को दिया है। पर्यावरण संरक्षण हमारी संस्कृति का आधारभूत मूल्य है। हम प्रकृति को देव मानते हैं, अन्य देशों में ऐसा नहीं है। कल्याणी मोक्षदा शस्य श्यामला भारतभूमि के ऋषि-मुनियों का ध्यान करते हुए पुण्य सलिला तीर्थों का स्मरण करते हुए गुरू परम्परा का पावन पुण्य स्मरण करते हुए हम सभी प्रकृति संरक्ष्ण के लिए हर सम्भव प्रयास करें ! पर्यावरण के इस अभियान में आपकी सहभागिता इसकी सफलता का मापदण्ड बनेगी। आइये ! अपनी धरती को बचाने के लिए साथ में जुड़ें। श्रीरामचरितमानस में कहा गया है कि ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम शरीरा।’ हमारा शरीर जीवन पंचतत्व से बना है। यह जीवन तभी बचेगा जब हम पर्यावरण के प्रति सचेत रहेंगे। हमारी प्रकृति और पर्यावरण में भी ये पाँच तत्व मुख्य रूप से घुले हुए हैं। यदि इन तत्वों में प्रदूषण होता है, तो इससे न केवल हमारा पर्यावरण दूषित होता है, बल्कि हमारे शरीर और मन भी अस्वस्थ व रोगी बनते हैं। प्रकृति में मिश्रित हुए ये पँचतत्व आपस में रचे-बसे हैं, एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी भी तत्व में आया हुआ असंतुलन दूसरे तत्व को प्रभावित करता है। किसी भी तत्व में कमी या वृद्धि दूसरे तत्व को प्रभावित करती है। श्रीरामचरितमानस में गंगा यमुना तथा संगम के चित्रण के अतिरिक्त सरयू नदी का विवरण भी है। सरयू का निर्मल जल आसपास के वायुमण्डल को भी शुद्ध किए हुए है। यह बताता है कि यदि हम अपने आसपास की नदियों, तालाबों को साफ रखेंगे तो समृद्धि बनी रहेगी। हम प्रकृति को देव मानते हैं, अन्य देशों में ऐसा नहीं है। हम अग्नि, वायु, जल, धरती, निहारिका, अम्बर, नक्षत्रों को देवता मानते हैं। हमारे यहाँ वृक्ष देव हैं। घास का तिनका गणपति पूजा में पहले चढ़ता है। फल-फूल, वन्य औषधियाँ, बेलपत्र, तुलसी, इनके बिना हमारा कोई जीवन नहीं। हमारे उत्सव, मेले, कुम्भ स्नान नदियों के किनारे ही सिद्ध होते हैं। हमारी संस्कृति में तीन शब्द हैं – तर्पण, अर्पण और समर्पण। ये सारे नदियों के तट पर ही सम्पन्न होते हैं। हम प्रकृति से प्रेम करें, उससे हमें प्राण मिलते हैं, जीवन मिलता है, औषधि प्राप्त होती है, उसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। मर्यादा केवल भक्तों के लिए ही नहीं, भगवान ने भी मर्यादाओं का पालन किया है। तो हम भी मर्यादाओं का सम्मान करें। भगवान से सर्वविधि कल्याण की अनेकानेक प्रार्थना करते हुए शुभकामनाएँ देता हूँ … ।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – परमात्मा प्रकृति में लीन हैं, जैसे तिल में तेल वैसे ही सारे संसार में ईश्वर है। प्रकृति की पूजा ईश्वर की पूजा है। हम सबको प्रकृति का संरक्षण करना आवश्यक है। भारत ने सदियों से यह सन्देश पूरी दुनिया को दिया है। यहाँ के पर्वत, नदियों, वृक्षों में परमात्मा है, सूर्य व चाँद में परमात्मा है, जीव-जन्तु में परमात्मा देखना, मनुष्यों में परमात्मा देखना है। ये सुन्दर प्रकृति हमारी है। इसके संरक्षण उत्तरदायित्व भी हमारा है। इसलिए हर एक मानव प्रकृति के संरक्षण की प्रतिज्ञा ले। इस प्रकार भारत पर्यावरण की दृष्टि से दुनिया का आदर्श देश बनकर उभरकर आयेगा। अंधविश्वास से नहीं, प्रकृति की पूजा भाव से होती है। अपने हृदय में भाव रखें और उसकी शुद्धता को स्थिर रखेंगे। तभी हम प्रकृति को बचाए रखेंगे। हमारे देश में लाखों गाँव हैं। यदि हर गाँव के तालाब शुद्ध व पवित्र जल का स्रोत बन जायें, तो देश में कहीं भी पानी का कोहराम नहीं हो सकता। स्वाभिमान जगाने के लिए हमें आत्म-निर्भर होना चाहिए और आत्म-निर्भर बनने के लिए स्वाभिमान जगाना पड़ेगा। स्वाभिमान का एक अंग है – हमारी संस्कृति। हम उसे पहचानें और उसका सम्मान करें। हर घर में तुलसी का पौधा लगाते हैं, इसी प्रकार पाँच-पाँच पौधे लगायें, जो हमारे जीवनकाल के बाद भी जीवित रह सकें तो हम अमरत्व को पा सकेंगे। हर गाँव को पवित्र बनायें, समृद्ध बनायें, शहर के हर मोहल्ले को शुद्ध रखें और पौधों का संरक्षण करते रहें, इस कार्य के लिए आप सब को शुभकामनाएँ देता हूँ। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि सृष्टि यदि सुरक्षित होगी तभी मानव जाती सुरक्षित होगी और जीवन दिव्य होगा। हमारे पूर्वजों ने इस सत्य को समझा कि हम भी प्रकृति का एक अंग हैं। शरीर में जैसे सब अंग काम करते हैं, तब शरीर चलता है और जब तक शरीर चलता है, तब तक ही शरीर का कोई अंग चल पाता है। शरीर अंगों के कार्य पर निर्भर है, अंग शरीर से मिलने वाली प्राणिक ऊर्जा पर निर्भर है। यह परस्पर सम्बन्ध सृष्टि का हमसे है, हम उसके अंग हैं, सृष्टि का पोषण हमारा कर्तव्य है। अपनी प्राण धारणा के लिए हम सृष्टि से कुछ लेते हैं, शोषण नहीं करते, सृष्टि का दोहन करते हैं। यह जीने का ढंग हमारे पूर्वजों ने समझा और केवल एक दिन के नाते नहीं, एक देह के नाते; नहीं तो पूरे जीवन में उसको रचा बसा लिया। हमारे यहाँ स्वाभाविक कहा जाता है कि शाम को पेड़ों को मत छेड़ो, पेड़ सो जाते हैं। पेड़ों में भी जीव है, इस सृष्टि का वो हिस्सा है। आधुनिक विज्ञान का ये ज्ञान हमारे पास आने के हजारों वर्ष पहले से, हमारे देश का सामान्य अनपढ़ व्यक्ति भी जानता है कि पेड़ को शाम को छेड़ना नहीं चाहिए। हमारे यहाँ नागपँचमी है, हमारे यहाँ गोवर्धन पूजा है। हमारे यहाँ तुलसी विवाह है। इन सारे दिनों को मनाते हुए आज के सन्दर्भ में उचित ढंग से मनाते हुए, हम सब लोगों को इस संस्कार को अपने पूरे जीवन में पुनर्जीवित और पुनर्संचरित करना है। जिससे नई पीढ़ी भी उसको सीखेगी, उस भाव को सीखेगी। हम भी इस प्रकृति के घटक हैं। हमको प्रकृति से पोषण पाना है, प्रकृति को जीतना नहीं। इसलिए हमें स्वयं प्रकृति से पोषण पाकर प्रकृति को जीवित रखना है …।