सलीब पर लटका डॉक्टर!डॉ नरेन्द्र सिंह!

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न जाने क्यों,
अब मैं डरने लगा हूँ-उस व्यक्ति से
जिसे देखकर, पहले करुणा का भाव जागता था!
उसके कक्ष में घुसते ही,उसके चेहरे की पीड़ा,मुझे उद्वेलित कर देती थी-
कैसे,अपने ज्ञान के उपयोग से उसकी पीड़ा हर सकूँ!
उस व्यक्ति का कोई नाम ,कोई धर्म नहीं होता था,वह केवल और केवल-एक “मरीज”होता था!
न जाने क्यों अब मैं डरने लगा हूँ, उसी मरीज से जो हाथ जोड़े पीड़ा हरने की गुहार करता तो है-
पर,कब ये जुड़े हाथ तब्दील हो जायेंगे “मुक्के”में और मुझे पीड़ित बना दें!
इसलिए अब मैं डरने भी लगा हूँ, और भयग्रस्त भी हूँ उस भीड़ से जो कब और क्यों हिंसक हो उठे-
पता नहीं!
मैंने चिकित्सा शास्त्र में पढ़ा था,
मानव शरीर ,उसकी उपचार के प्रति प्रतिक्रिया और परिणाम किसी गणित के सूत्र की तरह सर्वमान्य नहीं हो सकते!?
इसलिए अब मैं डरने लगा हूँ-
उस न्याय व्यवस्था से-जो मेरे उपचार में केवल खामियां ढूंढती है-गणितीय सूत्र की तरह!
और सुना देती है सजा एक ऐसे अपराध के लिए-जिसे अंजाम देने का मेरा कोई इरादा नहीं था!
इसीलिए अब मेरी नजरें,मरीज के परीक्षण और तकलीफ से ज्यादा उसकी फ़ाइल पर टिकी होती है-
कुछ लिखना छूट न जाए और मैं कागज पर अपने आप को सही साबित कर सकूं-
पैथागोरस की प्रमेय की तरह!!
नित नई नई खोजों,नित नई नई निदान की जांचों के ज्ञान के जाल में उलझा बड़ी दुविधा में हूँ-
इस गरीब की गणितीय सूत्र के हिसाब से सभी जाँचे करवाऊं या अपने व्यावहारिक ज्ञान से निदान कर लूँ?
करना तो चाहता हूँ लेकिन डरने लगा हूँ, न्याय के उन पैरोकारों से
जो केवल धाराएँ, और सूत्र याद रखते हैं-व्यावहारिक मजबूरी नहीं!??
अब मैं डरने लगा हूँ दीवाल पर टंगी अपनी चिकित्सा की डिग्री से
और अपने कंधे पर लटकी उपभोक्ता कानून की तलवार से!
अब मुझे कक्ष में घुसता वही व्यक्ति जो “मरीज”कहलाता था
अब “उपभोक्ता”कहलाने लगा है!
व्यवस्था ने मरीज को तो उपभोक्ता बना दिया,लेकिन मैं व्यापारी नहीं बन पा रहा हूँ-
इसीलिए अब मैं डरने लगा हूँ अपने आप से भी,
और पाता हूँ अपने आपको
सलीब पर लटका हुआ!!?
डॉ नरेन्द्र सिंह

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