दूर तलक जाएगी, उपचुनाव की आवाज

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महाराष्ट्र में प्रचंड जीत से बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व जश्न में है. पूरे देश में कार्यकर्ता उत्साहित हैं. दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव और उपचुनाव के परिणामों से जीतने और हारने वाले दोनों ही भौंचक्के हैं.इतनी बड़ी जीत का भरोसा नहीं था और इतनी बुरी हार की भी कल्पना नहीं थी.
चुनाव नतीजों के हर राज्य में अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं. मध्य प्रदेश को बीजेपी का मायका कहा जाता है. मायके के बुधनी और विजयपुर में उपचुनाव के परिणाम खुशी से ज्यादा गम देने वाले हैं. विजयपुर में तो पार्टी हार गई है. बुधनी में चुनाव जरूर बीजेपी जीत तो हुई लेकिन इतनी कम लीड, डिफीट ही प्रतीत सी हो रही है.
बुधनी विधानसभा शिवराज सिंह चौहान का परंपरागत गढ़ है. आम चुनाव में वह यहीं से चुने गए थे. लोकसभा में भी बुधनी क्षेत्र उनके लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा रही. उपचुनाव में बुधनी से जीते रमाकांत भार्गव, शिवराज सिंह के काफी करीबी माने जाते हैं. यह सोचने का विषय है कि, जीत की लीड सिर्फ छह महीने में ही 95 हजार से ज्यादा कैसे कम हो गई?
बुधनी क्षेत्र दशकों से मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान लीड कर रहे हैं. उपचुनाव के परिणाम तो यही दिखा रहे हैं कि, क्षेत्र में उनका दबदबा कम हो गया है. जाति समीकरण के हिसाब से भी यह क्षेत्र किरार बाहुल्य है. शिवराज सिंह चौहान और कांग्रेस के उपचुनाव में प्रत्याशी इसी समाज से आते हैं.
परिणाम से यह भी साबित हो रहा है कि, किरार समाज ने बीजेपी को एकमुश्त वोट नहीं दिया, जो शिवराज सिंह चौहान को सुनिश्चित रूप से मिलता रहा है. इसी कारण शायद भाजपा प्रत्याशी की उपचुनाव में जीत का अंतर इतना कम हो गया. श्रीमती साधना सिंह चौहान अभी भी किरार समाज की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. यह तो नहीं माना जा सकता कि, चौहान परिवार की किरार समाज पर पकड़ कमजोर हो गई है.
अक्सर ऐसा देखा गया है कि, किरार अपने समाज के प्रत्याशी को ही बढ़-चढ़ कर मतदान करते हैं, यह सामान्य सी बात भाजपा नेताओं को समझने की जरूरत थी. समाज को पूर्व अनुसार अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए सभी तरह के प्रयास करने की आवश्यकता थी. ऐसा नहीं होने से यह सामान्य राजनीतिक चर्चा प्रारंभ हो गई है, कहीं ऐसा तो नहीं है कि, मतों की संख्या में कमी राजनीतिक कारणों से मैसेजिंग के लिए आई है.
बुधनी सीट पर प्रत्याशी चयन के समय शिवराज सिंह के बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान का नाम भी पार्टी की राज्य इकाई ने राष्ट्रीय नेतृत्व को भेजा था. दिल्ली से रमाकांत भार्गव को प्रत्याशी बनाया गया. चुनाव प्रचार के दौरान कार्तिकेय चौहान का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह धमकी भरे लहजे में कह रहे थे कि, अगर गलती से भी बीजेपी का प्रत्याशी चुनाव हार जाता है तो फिर क्षेत्र के लोग काम कराने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के दरवाजे कैसे जा सकेंगे.
राजनीति तो सतत प्रक्रिया है, अगले चुनाव तक रमाकांत भार्गव शायद रिटायर भी हो जाए. इसके बाद तो फिर युवा नेतृत्व को ही मौका मिलेगा. किरार समाज निश्चित रूप से यही प्रयास करेगा कि, इस समाज के ही किसी युवा नेता को मौका मिले और शायद चुनाव परिणाम भी इसी तरह का संदेश दे रहें हैं.
यद्यपि शिवराज सिंह चौहान झारखंड विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रभार संभाल रहे थे. वह बुदनी में प्रचार के लिए कम समय दे पाए, इसके बावजूद उनका नाम और काम ही इस विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी की पहचान बननी चाहिए थी. इस पर चिंतन आवश्यक है कि, ऐसे क्या कारण हुए कि, इतनी जल्दी पार्टी के समर्थन में भारी गिरावट आ गई.
विजयपुर में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जीती थी. उपचुनाव में भी कांग्रेस जीत गई है लेकिन यह परिणाम भी बीजेपी के लिए बहुत गंभीर संकेत कर रहे हैं. पार्टी ने कांग्रेस से आए नेता को महत्व देते हुए मंत्री बनाया लेकिन इस उपचुनाव में उनको जीत नहीं दिला पाई. हारे प्रत्याशी ऐसा ही इशारा कर रहे हैं कि, स्थानीय स्तर पर अंदरूनी कलह के कारण हार का सामना करना पड़ा.
कमलनाथ की सरकार से बगावत जब ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में हुई थी तभी इस बात की चर्चा थी कि रामनिवास रावत भी कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होंगे. रावत को सिंधिया खेमे का ही माना जाता था, जब वह सिंधिया के साथ भाजपा में नहीं शामिल हुए, तब कांग्रेस में उन्हें अतिरिक्त महत्व दिया जाने लगा. ऐसा माना जा रहा था कि, उन्हें पीसीसी प्रेसिडेंट या नेता प्रतिपक्ष बनाया जाएगा.
जब कांग्रेस में उन्हें कोई पद नहीं दिया गया तो लोकसभा चुनाव के समय उनका भाजपा में शामिल होना, राजनीतिक पंडितों को समझ नहीं आया. बीजेपी के पास तो बड़ा बहुमत था. उसे किसी विधायक की आवश्यकता नहीं थी. ऐसा कहा जाने लगा था कि, सिंधिया को संतुलित करने के लिए रावत को बीजेपी में लाया जा रहा है. यह उपचुनावों के परिणाम में भी पढ़ा जा सकता है.
ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी ने स्टार प्रचारक जरूर बनाया था लेकिन वह प्रचार करते हुए तो कहीं देखे नहीं गए. चर्चा तो यहां तक सुनी गई कि, विजयपुर के प्रत्याशी ने पार्टी से अनुरोध किया था कि, सिंधिया को उनके क्षेत्र में प्रचार के लिए नहीं भेजा जाए.
उपचुनाव परिणाम बीजेपी में दूर तक पढ़े जाएंगे. मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के परफॉर्मेंस के रूप में भी कई दृष्टिकोण इसमें देखे जाएंगे. पार्टी अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के गृह क्षेत्र में बीजेपी की पराजय मायने रखती है.
कांग्रेस को चुनाव परिणाम से संजीवनी मिली है. फिलहाल विधानसभा के चुनाव काफी दूर है लेकिन तैयारी और कमजोरी को तो हर क्षण दुरुस्त करते रहना होगा. दल-बदल भी बीजेपी को तकलीफ दे रहा है. अंदरूनी कलह में इसका भी योगदान लगता है.

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