बहानों ने रोकी रेल की रफ्तार

मप्र में वन विभाग, एनजीटी की मंजूरी और जमीन अधिग्रहण जैसे मामलों के कारण महत्वाकांक्षी 8 रेल प्रोजेक्ट सालों से अटके हैं। इनमें इंदौर-देवास-बुदनी नई लाइन, छोटा उदयपुर-धार, दाहौद-इंदौर वाया सरदारपुर-झाबुआ आदि शामिल हैं। सबसे खास बात यह है कि इन्हीं में से कई रेल प्रोजेक्ट ऐसे हैं, जो दूसरे राज्यों से भी जुड़ने हैं।
राजस्थान, गुजरात समेत उन राज्यों में तो प्रोजेक्ट पूरी रफ्तार से दौड़ रहे हैं, लेकिन मप्र में ‘सरकारी मंजूरी’ के इंतजार में ये प्रोजेक्ट अटके हुए हैं। यदि ये प्रोजेक्ट पूरे होंगे तो हमारे 14 जिले रेल सुविधा से जुड़ेंगे। इन रेल प्रोजेक्ट्स की लागत 50 हजार करोड़ रु. तक पहुंच चुकी है।
प्रदेश में नई रेलवे लाइनों के प्रस्ताव और उनके निर्माण कार्यों में रेलवे से समन्वय का काम अब तक परिवहन विभाग देखता था। लेकिन इन प्रोजेक्ट्स में तेजी आ सके, इसलिए मप्र सरकार ने एजेंसी बदल दी है। अब लोक निर्माण विभाग समन्वय का काम देखेगा। को सौंप दिया गया है।
वे वन विभाग की मंजूरी, रोड ओवर ब्रिज, एनजीटी की मंजूरी और जमीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों को हल करेंगे। दावा है कि इससे काम तेजी से हो सकेगा। ṇक्योंकि पीडब्ल्यूडी के पास अपने जिले हैं। हालांकि, इन प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए पीडब्ल्यूडी के लिए बड़ी चुनौतियां हैं।
1. भोपाल-रामगंज रेलमंडी 24 साल से पूरा नहीं हो पाया प्रोजेक्ट; राजस्थान में काम पूरा क्यों जरूरी? भोपाल से कोटा की दूरी वाया नागदा 442 किमी है। बीना होकर 443 किमी है। नई रेल लाइन से यह घटकर 276 किमी रह जाएगी। भोपाल, सीहोर, राजगढ़ व राजस्थान के कोटा-झालावाड़ को लाभ। लागत : 2615 करोड़ रु.। 2001 में प्रोजेक्ट शुरू हुआ। अब 2025 तक का लक्ष्य। कहां अटका? रामगंजमंडी से घाटोली तक 128 किमी में रेल लाइन का काम पूरा हो गया है। मप्र में नयागांव तक रेल लाइन डाली गई है। ब्यावरा डिवीजन में जमीनों का अधिग्रहण नहीं हो पा रहा। मुआवजा राशि कम होने से किसानों इनकार कर रहे। पहले डेट लाइन 2022 थी, अब 2025 है।
2. ललितपुर-सिंगरौली विंध्य की लाइफ लाइन, पहले फंड नहीं मिला, अब जमीन क्यों जरूरी? विंध्य (पन्ना, सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली) की जीवन रेखा माना जा रहा है। सिंगरौली मप्र का कोल हब है। ढुलाई पावर प्लांटों तक होगी। कटनी व बीना रेलवे जंक्शन स्टेशनों पर गुड्स लोड कम होगा। मार्च 2026 तक शुरू करने का लक्ष्य। लागत : 8913 करोड़ रुपए कहां अटका? पन्ना टाइगर रिजर्व से लाइन गुजरनी है। स्टेशन रिजर्व से 22 किमी दूर जनकपुर में बनेगा। जमीन अधिग्रहण दिक्कत। 1998 से 2016 तक फंडिंग की वजह से प्रोजेक्ट अटका। फिर 6672 करोड़ रु. बजट मिला। अब 541 किमी के मार्ग में से 460 किमी में काम शुरू।
3. बुदनी-इंदौर लाइन इंदौर-जबलपुर की दूरी 150 किमी घटेगी, जमीन अधिग्रहण में अटका क्यों जरूरी? इंदौर से जबलपुर की दूरी 150 किमी कम हो जाएगी। अभी जबलपुर से इंदौर जाने के लिए वाया भोपाल जाना पड़ता है। यह दूरी 555 किमी है। नए प्रोजेक्ट से दूरी 342 किमी होगी। 4 घंटे का समय बचेगा। सीहोर, नर्मदापुरम व नरसिंहपुर जैसे जिलों को व्यापारिक दृष्टि से लाभ मिलेगा। लागत : 9000 करोड़ रु.। प्रोजेक्ट पूरा होने में 2 से 3 साल का समय लग सकता है। कहां अटका? किसान जमीन छोड़ने के लिए बाजार मूल्य से 4 गुना मुआवजा मांग रहे हैं । इंदौर, देवास व सीहोर में सबसे बड़ी दिक्कत। रूट परिवर्तन के लिए सर्व हो रहा।
4. छोटा उदयपुर-धार : पहली बार धार में रेल लाइन क्यों जरूरी? इंदौर को छोटा उदयपुर होते हुए वडोदरा से जोड़ेगी। धार पहली बार रेलवे लाइन से जुड़ेगा। निमाड़ का मध्य गुजरात के साथ सीधा संपर्क हो सकेगा। पर्यटन, स्थानीय उद्योगों को समर्थन। लागत : 1286 करोड़ रुपए। कहां अटका? रेल लाइन प्रोजेक्ट में पहले इंदौर-दाहौद व छोटा उदयपुर-धार रेल लाइन का लिंक धार में होने वाला था, पर अब तिराला में जंक्शन बनेगा। इससे दूरी 157 किमी से घटकर 145 किमी रह गई है। अभी तक जमीन अधिग्रहण नहीं हुआ।
5. ब्राडगेज कन्वर्जन : मप्र में डिजाइन फाइनल नहीं क्यों जरूरी? गेज परिवर्तन होने से इस मार्ग पर 130 किमी/घंटे की रफ्तार से ट्रेनें चलेंगी। काम 2008 में शुरू हुआ। प्रोजेक्ट पूरा होने में 5 साल और लग सकते हैं। अजमेर से हैदराबाद के बीच सीधी रेल सेवा शुरू हो सकेगी। राजस्थान, मप्र, महाराष्ट्र व आंध्रप्रदेश को लाभ लागत : 1100 करोड़ रुपए कहां अटका? महाराष्ट्र में अकोट-अमलाखुर्द को मेलघाट टाइगर रिजर्व से गुजरना है। पर्यावरण वन मंत्रालय में मंजूरी लंबित है। मप्र में महू के आगे घाट सेक्शन के लिए डिजाइन फाइनल की जा रही है।
6. इंदौर-दाहोद नई रेल लाइन
क्यों जरूरी? रेल लाइन से धार जिले को रेल मार्ग से जोड़ा जा सकेगा। पीथमपुर के उद्योगों को सस्ते दामों पर ट्रांसपोर्ट सुविधा मिल सकेगी। इस लाइन से इंदौर से मुंबई की दूरी 55 किमी कम हो जाएगी। माल ढुलाई के समय और खर्च में कमी आएगी। प्रोजेक्ट की शुरुआत 2008 में हुई, रेलवे ने मार्च 2025 तक ट्रेन चलाने का लक्ष्य रखा है।
लागत : 1640 करोड़ रुपए
कहां अटका? टीही से आगे तीन किमी की टनल अटकी है। इंदौर से टिही के बीच 21 किमी में काम पूरा हो चुका है। कांट्रेक्ट शार्ट टर्मिनेट होने से काम में रुकावट आई है।
7. इंदौर-मनमाड़ नई रेल लाइन क्यों जरूरी? इंदौर से मुंबई के बीच दूरी कम हो जाएगी। अभी इदौर से मुंबई जाने के लिए रतलाम, सूरत होते हुए 830 किमी की दूरी तय करना पड़ती है। नई रेल लाइन से दूरी 262 किमी घटकर 568 किमी रह जाएगी। नई रेल लाइन का काम 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य है।
लागत : 18036 करोड़ रुपए। कहां अटका? इंदौर से मनमाड़ के बीच नई रेल लाइन का पिछले 10 साल में 3 बार प्रोजेक्ट भेजा गया, पर हर बार रद्द हो गया। वजह- रेट ऑफ रिटर्न का ग्राफ हर बार निगेटिव दिखाया गया। 2019 में फिर सर्वे के बाद प्रोजेक्ट मंजूर।
8. झांसी-खिरार भीमसेन रेल लाइन क्यों जरूरी? इस प्रोजेक्ट में रेल लाइन का दोहरीकरण किया जा रहा है। इससे मप्र के खजुराहो के लिए ट्रेनों का आवागमन सुगम होगा। अभी सिंगल लाइन के जरिए रेल यातायात जारी है। लागत : 975 करोड़ रुपए। कहां अटका? बेतवा, धसान नदियों पर पुल बनाए जाना है।
पश्चिम मध्य रेलवे के सीपीआरओ हर्षित श्रीवास्तव ने कहा कि ललितपुर-सिंगरौली और रामगंजमंडी-भोपाल रेल लाइन प्रोजेक्ट पश्चिम मध्य रेलवे के पास है। दोनों प्रोजेक्ट प्रगति पर हैं। रामगंजमंडी रेल लाइन में राजस्थान बार्डर से मप्र में नयागांव तक पूरा हो गया है। यह प्रोजेक्ट 2025 तक पूरा होना है। इसके लिए काम तेजी से चल रहा है।
रेल प्रोजेक्ट को गति देंगे : मंत्री
लोक निर्माण विभाग को नई रेल लाइन और उनके निर्माण में रेलवे से समन्वय करने की जिम्मेदारी मिली है। रेलवे को राज्य सरकार से संबंधित जो भी जरूरते होंगी, उसके लिए समन्वय करेंगे। इससे निश्चित रूप से प्रदेश में चल रहे रेलवे के प्रोजेक्ट को गति मिलेगी।’ –राकेश सिंह, पीडब्ल्यूडी मंत्री
