सत्ता के गलियारे से ..रवि अवस्थी …तो साढ़े 5 साल रहेगी सरकार
सत्ता के गलियारे से ..रवि अवस्थी
…तो साढ़े 5 साल रहेगी सरकार
वन नेशन,वन इलेक्शन कमेटी के फॉमूले पर अमल हुआ तो अगले तीन साल में होने वाले 25 राज्यों के चुनाव उनके कार्यकाल की कटौती के साथ होंगे। बचे मप्र समेत बीजेपी शासित तीन राज्य। इनका कार्यकाल जनवरी 2029 के पहले पखवाड़े तक है। 19वीं लोकसभा के चुनाव जून 2029 में संभावित रहेंगे। एक साथ चुनाव के लिए इन तीनों राज्यों के लिए तीन ऑप्शन होंगे।राष्ट्रपति शासन,कार्यवाहक सरकार या शेष अवधि के कार्यकाल में बढ़ोत्तरी। इन अटकलों के बीच यह माना जा रहा है कि मप्र की 16वीं विधानसभा का कार्यकाल तय अवधि से अधिक होगा। यानी मौजूदा ‘माननीयों’ को पांच—छह माह का ‘मौका’अतिरिक्त मिलने के आसार हैं।
** अपनों की बेकद्री
मप्र बीजेपी का दावा है कि बीते ढाई महीने में ही कांग्रेस के 6 हजार से अधिक छोटे—बड़े नेता अपनी पार्टी छोड़ उसका दामन थाम चुके हैं। हैरत की बात यह कि कांग्रेस इस मामले में पूरी तरह बेफिक्र नजर आ रही है। महू से पार्टी के दिग्गज नेता रहे पूर्व विधायक छतर सिंह दरबार के मामले को ही लीजिए।बीते साल नवंबर में पार्टी छोड़ दी थी। चुनाव लड़े। दूसरे नंबर पर रहे।दो माह से उनके बीजेपी में जाने की चर्चा रही,लेकिन कांग्रेस ने उन्हें रोकने का कोई जतन किया हो,इसकी कोई खबर बाहर नहीं आई। उपेक्षा की यही पीड़ा,पार्टी छोड़ चुके अन्य नेताओं,कार्यकर्ताओं ने भी जताई। नेताओं का रूठना नई बात नहीं है लेकिन कुशल संगठक वही,जिसकी प्राथमिकता संगठन को मजबूत करने की हो।
** तोड़ा बिसेन का तिलिस्म
पार्षद या जिला पंचायत अध्यक्ष को सीधे सांसद का चुनाव लड़ाने का साहस बीजेपी ही कर सकती है।
बालाघाट नगर परिषद की वार्ड 22 की पार्षद भारती पारधी इसकी बानगी है। जिन्हें बालाघाट सीट से उम्मीदवार बनाया गया। भारती को मैदान में उतारकर बीजेपी ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। भारती के बहाने अंचल के पंवार मतों को तो साधा ही कद्दावर नेता बन चुके गौरीशंकर बिसेन का तिलिस्म भी टूटा। दूसरा पार्टी ने कांग्रेस की संभावित प्रत्याशी पूर्व विस उपाध्यक्ष हिना कांवरे के समक्ष एक चुनौती पेश की। भारती को प्रदेश के पंचायत मंत्री प्रह्लाद पटेल का करीबी माना जाता है। पटेल बालाघाट के सांसद भी रह चुके हैं।
** साधौ इस संसार में..
छतरपुर के एक बीजेपी नेता हुए साधौराम मिश्रा। जीवन पर्यन्त सायकिल से चले। कई राज्यों में पार्टी का प्रचार किया। मिश्रा ने हर दौर में निडरता के साथ जमीनीस्तर पर पार्टी का काम किया। पद की लालसा कभी नहीं रखी। 90 वर्ष की उम्र में चंद महीने पहले वह दिवंगत हुए। दूसरे हैं राज्य सभा के मौजूदा सांसद अजय प्रताप सिंह। सांसद बनने से पहले पार्टी में विभिन्न पदों पर रहे। अब उनकी सांसदी खत्म होने में चंद दिन बाकी है। ऐसे में लोकसभा का टिकट चाहिए। नहीं मिला तो त्यागपत्र देकर निर्दलीय मैदान में उतरने की तैयारी में हैं!
**कुछ तो हुआ
प्रदेशवासी लंबे समय से केन—बेतवा लिंक परियोजना शिलान्यास की बाट जोह रहे हैं। इसे लेकर कई मंचों से घोषणाएं हुईं। तिथियां भी तय हुईं। इसकी बेला आती,उससे पहले चुनाव की आचार संहिता आ गई। बहरहाल,स्थिति का पूर्वाभास सरकार को भी रहा। इसके चलते परियोजना न सही,इसी नाम की जल कलश यात्रा निकालकर उन ग्रामीणों को रिझाने का जतन हुआ जो बेहतर मुआवजा नहीं मिलने तक अपनी जमीन छोड़ने को राजी नहीं।
**आधी रात का अफसाना
सामान्य कामकाज के मामले में सरकारी दफ्तरों का समय तय है,लेकिन असामान्य कामों के लिए कोई वक्त नहीं। सरकार चाहे तो रात तीन बजे भी काम हो सकता है। कम से कम तबादलों के मामले में तो यह ट्रेंड बन ही चुका है,कि ज्यादातर तबादलों की सूची आधी रात के बाद ही फाइनल होती है। दो दिन पहले शताधिक अफसरों के तबादलों के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अब आधी रात के बाद होने वाले कामकाज के मामलों में तो ज्ञानियों ने पहले ही बहुत कुछ कहा है।
** ईमानदारी अभी बाकी है
यह शीर्षक किसी ड्रायवर के लिए नहीं,जिसने यात्री का खोया हुआ सामान लौटा दिया हो। दरअसल,यहां बात हो रही सीईओ स्तर की एक ऐसी ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ महिला अधिकारी की। जिन्होंने अपने विभाग में महाप्रबंधक के रिक्त पदों की पूर्ति नियमानुसार व पारदर्शितापूर्वक कराने में पूरी लगन का परिचय दिया। मामला कैबिनेट तक नहीं पहुंच सका तो साधिकार समिति से अनुशंसा हासिल कर काम का आगे बढ़ाया। हालांकि इसके लिए उन्हें भी कई तरह के पापड़ बेलने पड़े,लेकिन कहते हैं—जहां चाह,वहां राह। अब मातहत,इन्हें दुआ देने के साथ ही यह कामना भी कर रहे हैं कि काश!बाकी अधिकारी भी महिला अधिकारी से कुछ सबक लेते। यह अधिकारी जिस विभाग में हैं,उसे एक पूर्व मंत्री तो ‘भानुमति का कुनबा’ कहा करते थे।
** तेल जले सरकार का,मिर्जा खेले फाग
यह कहावत,प्रदेश के उच्च व तकनीकि शिक्षा विभाग पर एकदम फिट बैठती है। तकनीकि शिक्षा के आरजीपीवी का ही प्रकरण लीजिए।सरकारी रकम निजी धंधे में लगा दी। कलई खुलने पर पहले तो कुतर्कों का सहारा लिया जाता रहा। जैसे—तैसे आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हुआ तो इसमें भी चेहरा देखकर एक्शन हुआ। कुलगुरू बख्श दिए गए।रजिस्ट्रार निलंबित। उच्च शिक्षा विभाग भी कारिस्तानी में पीछे नहीं है। केंद्र प्रवर्तित ‘रूसा’ योजना इसकी बानगी है। सतपुड़ा विभाग के कई माले घेरने के बाद,विभाग को योजना क्रियान्वयन के लिए 33 लाख रुपए के किराए पर एमपी नगर का एक निजी भवन किराए पर लेना पड़ा। इतनी बड़ी रकम किराए पर खर्च होने के बाद प्रचारविहीन सेमीनार ठाकरे सभागृह में होते हैं। योजना का मूल उद्देश्य है दक्ष प्रोफेसर्स का कौशल उन्नयन और बजट करोड़ों में। जिसके खर्च न होने पर लेप्स होने का खतरा रहता है।
