मोटापे की वजह से लोग बुली करते थे
‘मैं बचपन से हेल्दी रही हूं। घरवाले तो कुछ नहीं कहते थे, लेकिन आस-पड़ोस के लोग जब भी घर आते, मोटापे को लेकर जरूर कमेंट करते। रिश्तेदार जब भी घर आते, मम्मी से एक बात जरूर कहते- बेटी जात है। इसे वजन कम करने को कहिए। ब्याह कर दूसरों के घर जाना है। इतना मोटापा ठीक नहीं।
जब मेरे सामने मेरी बॉडी, इसकी बनावट को लेकर कोई बोलता, तो बुरा लगता था। मैं कुछ नहीं बोलती। चुपचाप सिर नीचे कर लेती थी। क्या ही बोलती, किस-किस का मुंह बंद करती। अब इन्हें कौन समझाए कि अगर किसी का वजन बढ़ रहा है, तो इसके पीछे दर्जनों कारण हो सकते हैं।
कॉलेज में एडमिशन लिया, तो वहां भी दोस्त मेरी बॉडी, कपड़ों को लेकर कमेंट करते थे। इससे तंग आकर मैं प्लस साइज और मिड साइज पर ब्लॉग लिखने लगी। जल्द ही देशभर की हेल्दी महिलाएं मेरे साथ कनेक्ट होने लगीं। हालांकि, उस वक्त बिल्कुल भी पता नहीं था कि एक दिन यह कपड़ों के बिजनेस में कन्वर्ट हो जाएगा।’
मैं दिल्ली के साकेत इलाके में हूं। 30 साल की विशाखा भास्कर ये बातें बता रही हैं। विशाखा प्लस साइज महिलाओं के लिए स्टाइलिश ड्रेस बनाती हैं। वह अपैरल कंपनी ‘अंगरखा’ की को-फाउंडर हैं।

विशाखा कहती हैं, ‘कॉलेज के दिनों की बात है। मैं अपने ग्रुप के साथ मॉल में कपड़े खरीदने गई थी। मुझे छोड़कर हर किसी ने अपनी पसंद के कपड़े खरीद लिए। ये 2012-13 की बात है।
मुझे XL साइज से भी ओवर कपड़े आते थे। आप कह सकते हैं कि मैं मिड साइज या प्लस साइज के कपड़े पहनती थी। उस वक्त बड़े ब्रांड भी इस रेंज में अच्छे कपड़े नहीं बना रहे थे।
हुआ ये कि जो कपड़े मैं खरीदना चाहती थी, वह मेरे साइज के मुताबिक नहीं मिला। मैं बहुत नर्वस हो गई। एक दिन जिस ड्रेस को पहनकर मैं कॉलेज गई, उस पर एक लड़के ने निगेटिव कमेंट किया।
उसके बाद जब मैंने कपड़ों के साइज को लेकर रिसर्च करनी शुरू की, तो पता चला कि मेरे जैसे लोग मिड और प्लस साइज की कैटेगरी में आते हैं। इससे पहले तो मैंने ये टर्म कभी सुना भी नहीं था।
मैंने ऑनलाइन ब्लॉग लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे मेरे टच में देशभर से दर्जनों हेल्दी महिलाएं आने लगीं।’

विशाखा कुछ ड्रेस निकालकर दिखा रही हैं। दिखने में ये स्टाइलिश और यूनीक लग रहे हैं। कहती हैं, ‘मेरा तो फैशन रिलेटेड बैकग्राउंड भी नहीं था और घर में भी कोई बिजनेस वाला नहीं।
मम्मी एडवोकेट और पापा गवर्नमेंट जॉब में हैं। 12वीं के बाद इकोनॉमिक्स सब्जेक्ट से बैचलर में एडमिशन ले लिया। कॉलेज जाने के बाद समझ में आया कि इकोनॉमिक्स तो मेरे बस की नहीं है।
मैं स्टडी के दौरान हर वक्त परेशान रहती थी। मन में चलता था कि अब करियर का क्या होगा। इसी बीच जब मोटापे की वजह से लोगों ने बुली करना शुरू किया, तो मैं फैशन इंडस्ट्री के बारे में सोचने लगी।
2015 में बैचलर कम्प्लीट करने के बाद दिल्ली की एक फैशन बेस्ड अपैरल कंपनी के साथ काम करने लगी। यहीं पर बिजनेस पार्टनर असाना से मुलाकात हुई।’

विशाखा ने दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) से इकोनॉमिक्स ऑनर्स किया है। पूछने पर कहती हैं, ‘घरवालों को यकीन था कि पढ़ाई कम्प्लीट करने के बाद या तो मैं आगे की पढ़ाई करूंगी या किसी कंपनी के साथ जॉब करूंगी।
जब घरवालों और आसपास के लोगों को पता चला कि मैं फैशन इंडस्ट्री के लिए काम कर रही हूं, तो सभी ने ताने मारने शुरू कर दिए। मुझे आज भी याद है। एक आंटी को जब पता चला कि मेरा एडमिशन SRCC में हुआ है, तो वह कहने लगीं- मुझे तो विशाखा पर गर्व है। उसे इतना बढ़िया कॉलेज मिला है।
लेकिन जब उन्हें ये पता चला कि मैं कॉलेज के बाद अपना ब्रांड स्टार्ट कर रही हूं, प्लेसमेंट में नहीं बैठी हूं, जॉब नहीं कर रही हूं, तब आंटी ने मेरी मम्मी के मुंह पर कहा- देख लीजिए, आपकी बेटी ट्रैक से हट रही है। ऐसा न हो कि इसका फ्यूचर खराब हो जाए।
मेरी मम्मी को भी कॉन्फिडेंस नहीं था कि मैं ये सब कर पाऊंगी।’

विशाखा कहती हैं, ‘मुझे प्लस साइज की महिलाओं के लिए कपड़े बनाने की इंडस्ट्री में बड़ा गैप दिखा। दिल्ली में कुछ महीने काम करने के बाद मैं मुंबई चली गई। वहां एक दूसरे फैशन ब्रांड के साथ काम किया।
मैं बचपन से स्केचिंग, ड्रॉइंग करती थी। क्रिएटिव वर्क में इंट्रेस्ट था। असाना के साथ मिलकर बिजनेस प्लान करना शुरू किया। वह मणिपुर की रहने वाली हैं। नॉर्थ के रहने वाले लोगों को नॉर्थ-ईस्ट के लोग दूसरी दुनिया के लगते हैं।
उनके चेहरे, बोल-चाल, पहनावे को लेकर कमेंट करते हैं, लेकिन जब मैं पहली बार असाना से मिली, तो उसी वक्त मन बना लिया था कि बिजनेस करूंगी, तो सिर्फ असाना के साथ। सक्सेसफुल बिजनेस के लिए परफेक्ट बिजनेस पार्टनर का होना जरूरी है।
2017-18 का साल था। मैं और असाना, दोनों दिल्ली के अलग-अलग फैब्रिक मार्केट में जाकर कपड़ों के थान को देखते थे। मुझे तो इसकी समझ ही नहीं थी। असाना इस मामले में एक्सपर्ट है।’

2018 में विशाखा ने अपने ब्रांड ‘अंगरखा’ की शुरुआत की। वह बताती हैं, ‘हमें डर भी था कि बिजनेस चलेगा या नहीं। शुरुआत में हम दोनों ने 10-10 हजार रुपए यानी टोटल 20 हजार का इन्वेस्टमेंट किया था।
इसी पैसे से मार्केट से थान में कपड़े खरीदकर 2 टेलर के साथ मिलकर ड्रेस डिजाइन किया। जब इसे ऑनलाइन लॉन्च किया, तो कुछ ही महीनों में सारे प्रोडक्ट बिक गए। पहले साल 7 लाख का बिजनेस हुआ था।
उसके बाद लगा कि हम बिजनेस कर सकते हैं। धीरे-धीरे हमने अलग-अलग कैटेगरी के साथ प्रोडक्ट बनाना शुरू किया। ब्लॉगिंग के दौरान पैन इंडिया से हेल्दी महिलाएं मेरे साथ जुड़ी हुई थीं।
हमने जब इनको कपड़े बेचे, तो इन्हें काफी पसंद आए। उसके बाद हमने डिजिटल मार्केटिंग पर फोकस करना शुरू किया। इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया की बदौलत बिजनेस बढ़ने लगा। हालांकि कोविड आते-आते मार्केट डाउन हो गया।
एक वक्त ऐसा भी आया, जब कम ऑर्डर आने की वजह से लगा कि अब हमें अपना ब्रांड बंद करना पड़ेगा।’

आपकी खुद की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है?
‘अभी हम आउटसोर्स कर रहे हैं। दो दर्जी के साथ मिलकर हमने अपना ब्रांड शुरू किया था। आज दिल्ली बेस्ड दो बड़े मैन्युफैक्चरर हैं, जिनके साथ मिलकर हम ड्रेस तैयार करते हैं।
दरअसल, शुरुआत में यदि हम मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की प्लानिंग करते हैं, तो इसमें ज्यादा पैसों की जरूरत होती है। बहुत सारे ऐसे मैन्युफैक्चरर हैं, जो बिना किसी ब्रांड नेम के साथ अलग-अलग ब्रांड के लिए कपड़े तैयार करते हैं।
अभी हम हर महीने 20-25 लाख का बिजनेस कर रहे हैं। सालाना 2.5 करोड़ के करीब टर्नओवर है। 15 से ज्यादा लोगों की टीम है।

