☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 08 मार्च, 2024 (शुक्रवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ..!”
अपनी सामर्थ्य, योग्यता और पात्रता के अनुरूप निरन्तर सत्कर्म करते रहें। जिस प्रकार एक एक बून्द के संग्रहण द्वारा घट में पूर्ण जलराशि एकत्रित की जा सकती है, वैसे ही छोटे अर्थात् संक्षिप्त प्रयत्नों की सुदीर्घ श्रृंखलाएँ ही जीवन की सफलता और श्रेष्ठता सुनिश्चित करती हैं। अतः विवेकपूर्ण ढंग से निरन्तर सत्कर्म पारायण रहें। सत्कर्म का प्रकाश ही हमें ले जाता है – जीवन के अँधेरों से दूर। सत्कर्म मनुष्य की एक ऐसी मूल पूँजी है, जो इहलोक-परलोक का पाथेय बन कर सकल अनुकूलताएँ प्रदान करने में समर्थ है। गीता ने मनुष्य को हमेशा कर्म करते रहने का उपदेश दिया है। कर्म का तात्पर्य सत्कर्म है। सत्कर्मों से ही लोक-परलोक बनता है। सत्कर्म से अंतकरण शुद्ध होता है। सुख प्रतिष्ठा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। आत्मा को तात्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्गति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। भक्ति का सामर्थ्य इतना बड़ा है कि वह हमसे सत्कर्म कराती है, पापकर्म करने से रोकती है और पुराने पापकर्मो का सच्चा प्रायश्चित करने की प्रेरणा हमारे अन्त:करण में लाती है …।
? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – मानव को जन्म से लेकर मृत्यु-पर्यन्त कुछ-न-कुछ कर्म करते रहना पड़ता है। इसलिए धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य को हर क्षण सत्कर्म में ही व्यतीत करना चाहिए। सत्कर्म करते रहने में ही जीवन की सार्थकता है। भगवान आदिशंकराचार्य कहते हैं कि जो पुरुषार्थहीन है, वह वास्तव में जीते-जी मरा हुआ है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – “युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु ..।” यानी बुद्धिमान को उचित जीवनचर्या एवं पुरुषार्थ में लगे रहना चाहिए। एक क्षण भी आलस्य, प्रमाद, भोग या किसी अन्य प्रकार के दुष्कर्म में कदापि नहीं खोना चाहिए। मुनि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि व्यक्ति यदि अपने कर्म को धर्म, कर्तव्य एवं पूजा मानकर करे, तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है। धर्मशास्त्रों में न्यायोचित्त धनार्जन करते हुए भक्ति, सेवा, परोपकार, दान, स्वाध्याय, अतिथि सेवा, सत्संग आदि सत्कर्म में रत रहने की प्रेरणा दी गई है। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि निषिद्ध कर्म करने एवं विहित कर्मों का त्याग करने से मनुष्य के पुण्य नष्ट हो जाते हैं तथा उसे तरह-तरह के संकट घेरकर दुरावस्था को पहुँचा देते हैं। अतः हर क्षण सत्कर्म करते रहने में ही मानव का कल्याण है। भगवान का उन्हीं लोगों के हृदय में वास होता है, जो सत्कर्म करते हैं। अनैतिक कमाई का लाभ तो कोई भी उठा सकता है। परन्तु तुम्हारे अनैतिक कर्मों को तुम्हें ही भोगना होगा, इसलिए कर्म करनें में सावधानी बरतें। जीवन को उत्सव की तरह जीयें , ताकि हमेशा जीवन में नयापन बना रहे, ताजगी बनी रहे। यदि मनुष्य रामनाम स्मरण करता है, परन्तु उसके आचरण दोषपूर्ण हैं तो उसकी भक्ति, श्रवण व मनन वृथा हैं। जिनके भीतर आचरण की दृढ़ता रहती है, वे ही विचार में निर्भीक और स्पष्ट हुआ करते हैं।परोपकार का आचरण मत त्यागो। संसार क्षणिक है। जब चन्द्रमा और सूर्य भी अस्त हो जाते हैं, तब अन्य कौन स्थिर है? तप, त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों में शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं। सत्य और सतकर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सत्कर्म से मनुष्य का जीवन संवरता है तो सत्य से परमात्मा की प्राप्ति होती है। सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन परास्त नहीं हो सकता। अतः श्रीमद् भागवत पुराण ने मनुष्य को सत्य के साथ रहने का बड़ा सन्देश दिया है ..।

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