बांग्लादेश में आंदोलन खत्म, मरने वालों की कहानियां बाकी
‘4 अगस्त की बात है। करीब 3 बजे नफीज का फोन आया। उस वक्त वो छात्र आंदोलन में था। मां ने कहा कि बेटा वापस आ जाओ। उसने लौटने की बात भी कही, लेकिन लौटा नहीं। 4 बजे तक उसका रास्ता देखने के बाद हम उसकी तलाश में निकल गए। रात 12 बजे तक न नफीज मिला और न उसकी कोई खबर।’
‘कुछ देर बाद ही न्यूज पोर्टल पर हमें एक फोटो दिखी। उसमें एक लहूलुहान लड़का रिक्शे पर लेटा नजर आया। गौर से देखा तो वो हमारा नफीज ही था।’ इतना कहते हुए नफीज के पिता गुलाम रहमान बिलख पड़ते हैं। वो कहते हैं कि उस दिन हमने अपने बेटा खो दिया।
4 अगस्त को हुई नफीज की मौत करीब उन 200 छात्रों में से एक है, जो तकरीबन 2 महीने चले छात्र आंदोलन का अहम हिस्सा थे। बांग्लादेश में आरक्षण के विरोध में शुरू हुआ प्रोटेस्ट तब तक जन आंदोलन में बन चुका था। जिसका असर ये हुआ कि 5 अगस्त को सत्ता बदली और शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा।
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद अब आंदोलन तो खत्म हो गया है, लेकिन इसमें जान गंवाने वालों की कहानियां बाकी हैं। दैनिक भास्कर ने यही कहानियां जानने के लिए स्टूडेंट मूवमेंट का हिस्सा रहे कई स्टूडेंट्स, उनकी फैमिली और स्टूडेंट कोऑर्डिनेटर से बात की।

सबसे पहले बात गुलाम नफीज की…
आरक्षण के खिलाफ आंदोलन कर रहा था, पुलिस ने गोली मारकर जान ले ली
ढाका का रहने वाला गुलाम नफीज महज 16 साल का था। वो नेवी कॉलेज में पढ़ने वाला बहुत ही काबिल लड़का था। 10वीं में उसने टॉप किया था। वो स्पोर्ट्स और बाकी एक्टिविटीज में भी पार्टिसिपेट करता था। उसके 52 साल के पिता गुलाम रहमान पेशे से व्यवसायी हैं।
रहमान कहते हैं, ‘जो भी प्रोग्राम होता, वो काफी एक्टिव रहता और टीम को लीड करता था। अभी 11वीं में उसका एडमिशन हुआ था। ड्रेस भी सिल गई थी। 30 जुलाई से उसका स्कूल शुरू होने वाला था, लेकिन सब खत्म हो गया।’

‘शुरू में कुछ दिन तक हमें पता ही नहीं चला कि वो प्रोटेस्ट में जाता है। वो अपने दोस्तों के साथ प्रोटेस्ट में जा रहा था। 18 जुलाई को जब उसके पैर में रबर बुलेट लगी और शरीर पर पैलेट गन के निशान मिले, तब हमें इसका पता चला। वो आंदोलन को लेकर जज्बे से भरा रहता था। वो पूरे मूवमेंट को करीब से फॉलो कर रहा था।’
रहमान बताते हैं, ‘4 अगस्त को नफीज ने मुझसे 20 टका मांगे और मैंने दे दिए। उसने कहा कि मुझे सिर पर बांग्लादेशी झंडे वाली पट्टी पहननी है। मैंने कहा कि आज प्रदर्शन में मत जाओ, हालात ठीक नहीं हैं। उसने वादा किया कि वो नहीं जाएगा। उस दिन सुबह हमने साथ में नाश्ता किया। फिर मैं काम पर चला गया।
‘मेरे मना करने के बावजूद उस दिन वो आंदोलन में चला गया। मोबाइल भी साथ नहीं ले गया। करीब 3 बजे उसने अपने दोस्त के फोन से कॉल किया।‘

रहमान बताते हैं, ‘चारों तरफ कर्फ्यू था, ढूंढने में बहुत मुश्किल हो रही थी। उसे ढूंढते हुए रात के 12 बज गए। न वो मिला और न उसकी कोई खबर मिली। कुछ देर बाद ही न्यूज पोर्टल पर हमें एक फोटो दिखी। उसमें एक लहूलुहान लड़का रिक्शे पर लेटा नजर आया। गौर से देखा तो वो हमारा नफीज ही था।‘
‘फिर फोटो छापने वाले पोर्टल के दफ्तर गए। वहां से हमें अस्पताल का पता मिला। फिर हम सुहरावर्दी हॉस्पिटल पहुंचे, जहां उसकी लाश मिली। वॉर्डन ने डेडबॉडी सौंपने से पहले हमसे कहा कि आप उसे देख पाएंगे। नफीज के पूरे शरीर पर घाव ही घाव थे और छाती पर गोली का निशान था। इससे साफ था कि उसे टारगेट करके मारा गया था।‘
4 अगस्त के बारे में रहमान को नफीज के दोस्तों ने पूरा घटनाक्रम बताया था। वे बताते हैं, ‘नफीज और उसके साथी रामपुरा, फार्मगेट और शाहबाद की तरफ जा रहे थे, तभी पुलिस ने हमला कर दिया। अभी वो फार्मगेट पार ही कर रहे थे तभी पुलिस और छात्र लीग (अवामी लीग की स्टूडेंट विंग) ने उन्हें घेर लिया। नफीज भी उसमें फंस गया।

‘पहले छात्र लीग वालों ने नफीज को पीटा। फिर पुलिस ने उस पर गोली चलाई और वो वहीं गिर गया। फोटो जर्नलिस्ट जीबोन अहमद ने उसे हॉस्पिटल ले जाने की कोशिश की, लेकिन छात्र लीग और पुलिस ने नहीं ले जाने दिया। जीबोन ने उसे रिक्शे पर लिटाकर हॉस्पिटल ले जाने की कोशिश की, लेकिन हॉस्पिटल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई।‘
रहमान कहते हैं, ‘पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से हमें पता चला कि गोली बहुत पास से मारी गई थी। मुझे लगा कि आखिर इतनी बर्बरता से कोई किसी बच्चे को कैसे मार सकता है। उसे टारगेट करने के पीछे भला किसी की क्या मंशा रही होगी। उसके कत्ल का ये असर हुआ कि सत्ता बदली। अब हम उसकी मौत को लेकर केस फाइल करेंगे।’

अब बात स्टूडेंट कोऑर्डिनेटर तामिर चौधरी की…
सरकार के रवैये के चलते कोटा रिफॉर्मेशन मूवमेंट बन गया जन आंदोलन
बांग्लादेश में चले स्टूडेंट मूवमेंट का एक हिस्सा तामिर चौधरी भी रहे। वे ढाका यूनिवर्सिटी से कल्चर डिपार्टमेंट से MA कर रहे हैं। तामिर मूवमेंट के कुल 40 स्टूडेंट कोऑर्डिनेटर में से एक हैं और डिबेटर भी हैं।
वे बताते हैं, ‘आरक्षण के खिलाफ जो आंदोलन शुरू हुआ था, उसका नाम कोटा रिफॉर्मेशन मूवमेंट था। कोटा में सुधार की मांग से शुरू हुआ ये आंदोलन सरकार की सख्ती की वजह से सरकार के खिलाफ होता चला गया।‘

आंदोलन के सफर पर बात करते हुए तामिर कहते हैं, ‘आंदोलन की शुरुआत जून में हुई थी, जब हाईकोर्ट ने फ्रीडम फाइटर्स कोटा को रीस्टोर कर दिया था। ये आरक्षण उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया।‘
‘उनके परिवारजनों को सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण दिया जाता था। सिर्फ 1% आबादी के लिए 30% का रिजर्वेशन मिल रहा था। हमें लगा कि ये बाकी लोगों के साथ नाइंसाफी है।’
वे आगे कहते हैं, ‘14 जुलाई तक ये आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण ही था। जब सरकार ने कहा कि नौकरी स्वतंत्रता सेनानियों को मिलनी चाहिए या फिर रजाकारों (जो आजादी के खिलाफ थे) को। बात यहां से बिगड़ी। शेख हसीना ने ये माहौल बनाने की कोशिश की कि अगर आप कोटा के समर्थक नहीं हैं, तो आप रजाकार हैं। 99% लोग कैसे रजाकार हो सकते हैं।‘

14 जुलाई की रात वो हुआ जो 15 साल में कभी नहीं हुआ था
तामिर बताते हैं, ‘14 जुलाई को ढाका यूनिवर्सिटी में छात्राओं ने गर्ल्स रेसिडेंशियल हॉस्टल के दरवाजे तोड़ दिए और वो सड़कों पर प्रदर्शन करने आ गईं। इसके बाद हॉस्टल के सारे छात्र सड़कों पर प्रदर्शन करने लगे।
15 साल में पहली बार था कि प्रधानमंत्री के खिलाफ स्टूडेंट्स सड़कों पर आ गए। छात्र लीग के स्टूडेंट्स और प्रदर्शनकारियों के बीच इसे लेकर विवाद बढ़ा और कई बार ये हिंसक भी हो गया। छात्र लीग को सरकार और पुलिस का सपोर्ट था।‘
‘उसी रात से सरकार ने आंदोलन को दबाना शुरू कर दिया। 16 जुलाई से पुलिस ने छात्रों को मारना शुरू कर दिया। हमारा अनुमान है कि तब करीब 1000 लोगों की मौत हुई थी, लेकिन सरकार सिर्फ 300 मौत का आंकड़ा बता रही है।’
‘इंटरनेट बंद होने की वजह से हम तक कोई जानकारी नहीं पहुंच रही थी। करीब 7 दिन तक पूरे देश में इंटरनेट बैन रहा। सरकार कम्युनिकेशन ब्लैकआउट करना चाहती थी।’
‘सरकार के रवैये के चलते आंदोलन और ज्यादा तेज होता गया। धीरे-धीरे इससे आम लोग भी जुड़ते चले गए। जल्द ही एक स्टूडेंट मूवमेंट एक जन आंदोलन बन गया। कॉलेज के अलावा स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे, मेहनतकश लोग, महिलाएं और बुजुर्ग सभी किसी ना किसी तरह से इसका हिस्सा बन गए। शेख हसीना के खिलाफ गुस्सा खुलकर सामने आने लगा।’


तामिर कहते हैं, ’आंदोलन के बीच में भी हमने सत्ता परिवर्तन के बारे में नहीं सोचा था। हमें लगा था कि सरकार कुछ वक्त लेगी और कोटा पर बातचीत करके बीच का रास्ता निकालेगी। हो सकता है कि दिखावे के लिए वो कुछ मंत्रियों को बर्खास्त कर दें, लेकिन सत्ता परिवर्तन का हमने कभी नहीं सोचा।’
’18 जुलाई को सरकार ने आंदोलन रोकने के लिए करीब 100 छात्रों को मार दिया था। सरकार के इस रवैये के बाद हमारा छात्र आंदोलन शेख हसीना को कुर्सी से हटाने के लक्ष्य पर शिफ्ट हो गया। छात्रों को उस वक्त तक लग गया था कि अब यही विकल्प बचा है।’
पूरे छात्र आंदोलन के दौरान सबसे डरा देने वाला मौका कब रहा? इसके जवाब में तामिर कहते हैं, ‘4 अगस्त को प्रदर्शन के दौरान बहुत फायरिंग हो रही थी। मेरे एक दोस्त की गोली लगने से मौत हो गई। तभी एक गोली अचानक मेरे कान के पास से गुजरी। कुछ मिनट के लिए तो मैं अपनी सुधबुध खो बैठा था। जब थोड़ा नॉर्मल हुआ, तो फिर नए उत्साह से भर गया।’
‘5 अगस्त को भी मुझे रबर बुलेट और स्प्लिंटर लगे। पुलिस की लाठी लगने से हाथ फ्रैक्चर हो गया। पुलिस एक्शन के दौरान हमने धानमंडी इलाके में एक अपार्टमेंट में शरण ली।’
‘यहां पूरी सोसाइटी के लोग हमारी मदद कर रहे थे। कोई पानी ला रहा था, कोई चोट पर पट्टी बांध रहा था। इस वक्त तक हम उम्मीदें खोने लगे थे। हमें लग रहा था कि अब हम हार रहे हैं, लेकिन इन लोगों के सहयोग को देखकर हमारी उम्मीदें फिर जागीं। हमें लगा कि लोगों की हमसे उम्मीदें जुड़ चुकी हैं, हमें इनकी खातिर कुछ करना होगा।’
‘फिर उस दिन वो वक्त भी आया जिसका हम सबको इंतजार था। शेख हसीना को इस्तीफा देना पड़ा और देश छोड़ने के सिवा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा।‘
तामिर कहते हैं, ‘हम इस दिन का सपना जरूर देखते थे, लेकिन हमें पता था कि हमारे जिंदा रहते ये नहीं होगा। उस दिन हर कोई खुश था। जब मैं शाहबाग इलाके में पहुंचा, तब मिठाई की दुकानों पर मिठाइयां खत्म हो गई थीं। सड़कों पर लोग नाच रहे थे, झूम रहे थे।

अब बात स्टूडेंट मूवमेंट का हिस्सा रहे कुछ स्टूडेंट्स की…
पहले आरक्षण को सपोर्ट किया, जब असलियत पता चली तो सड़क पर उतरे
स्टूडेंट मूवमेंट के बारे में जानने के लिए हम कुछ स्टूडेंट्स से भी मिले। इन्हीं में से एक हैं फातिमा अख्तर। अजीमगंज के चांदपुर गांव की रहने वाली हैं और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आती हैं। वो ढाका यूनिवर्सिटी पहुंचने वाली अपने घर की पहली लड़की हैं।
फातिमा बताती हैं, ‘शुरू में मैं कोटा सिस्टम के सपोर्ट में हुआ करती थी, लेकिन जब प्रदर्शन हुआ और मैंने इसके बारे में जाना तो पता चला कि ये कितना भेदभाव करने वाला है। इसकी वजह से मेरिट पर असर पड़ रहा था। 15 जुलाई से जब मैंने इस कोटा मूवमेंट को जॉइन किया तो मेरे परिवार ने मेरा समर्थन नहीं किया। मेरे साथ रहने वाली मेरी बहनों ने भी साथ देने से मना किया।’
‘मैं शाम को ट्यूशन से लौटते वक्त प्रोटेस्ट में शामिल होने चली जाती थी। जब हिंसा शुरू हुई तो मेरी दो सहेलियों को पुलिस ने पीटा। मेरे कुछ सीनियर ने उस दिन मेरा रेस्क्यू किया। इसके बाद हम शहीद मीनार के पास गए, तो वहां छात्र लीग वाले मेरे दोस्तों को पीट रहे थे।’

आंदोलन दबाने की सकार की हर कोशिश बेकार साबित हुई
इसके बाद हम निशिता जमान निहा से मिले। वो भी ढाका यूनिवर्सिटी के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट में पढ़ती हैं। निशिता बताती हैं, ‘मैं कोटा मूवमेंट से शुरुआत से जुड़ी हूं। हमें आजादी हासिल किए 54 साल हो चुके हैं, लेकिन अब भी नौकरियों में फ्रीडम फाइटर्स के लिए कोटा जारी है। वो भी 30% का।’
‘आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन ढाका यूनिवर्सिटी से शुरू हुआ और फिर पूरे बांग्लादेश में फैलता चला गया। सरकार ने शुरू में हमारी कोई सुनवाई नहीं की, लेकिन हम डटे रहे। सरकार हमारा मूवमेंट दबाने के लिए अलग-अलग चालें चल रही थी, लेकिन नाकाम रही।‘

वे आगे कहती हैं, ‘जब अबू सईद को गोली मारी गई, तो वो हमारे लिए बहुत दुखद पल था। जब मैंने वो वीडियो देखा तो मैं कई मिनट तक रोती रही। इससे पहले मेरे पेरेंट्स प्रोटेस्ट में शामिल होने से रोकते थे। इस घटना के बाद उन्होंने एक बार भी नहीं रोका। उन्होंने कहा- प्रोटेस्ट करो, लेकिन संभल कर करना।
5 अगस्त को जब शेख हसीना ने देश छोड़ा, तब काफी हिंसा हुई। कई पुलिस वालों और अवामी लीग के नेताओं की हत्या हुई। मुझे उन लोगों की मौत का भी दुख है, लेकिन सरकार ने इस तरह का सिस्टम बनाया कि ये सब हुआ। हालांकि, उस दिन जिसने भी गलत किया है या हिंसा की, उसकी जांच होनी चाहिए और उन पर केस चलना चाहिए।

सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा 56% से घटाकर 7% की
बांग्लादेश में अब सरकारी नौकरियों में आरक्षण 56% से घटाकर 7% कर दिया गया है। इसमें से स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार वालों को 5% आरक्षण मिलेगा जो पहले 30% था। बाकी 2% में एथनिक माइनॉरिटी, ट्रांसजेंडर और दिव्यांग शामिल होंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, 93% नौकरियां मेरिट के आधार पर मिलेंगी।
बांग्लादेश की सरकार ने 2018 में अलग-अलग कैटेगरी को मिलने वाला 56% आरक्षण खत्म कर दिया था, लेकिन 5 जून, 2024 को वहां के हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को पलटते हुए दोबारा आरक्षण लागू कर दिया था। इसके बाद से ही बांग्लादेश में हिंसा का दौर शुरू हुआ। 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने फिर सरकारी नौकरियों में 56% आरक्षण देने के ढाका हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।
