नेहरू ने कैसे रुकवाया कोरिया युद्ध; यूक्रेन जा रहे PM मोदी क्या वही दोहराएंगे
2 अक्टूबर 1950 की आधी रात। चीन के विदेश मंत्री झोउ एनलाई ने बीजिंग में भारतीय राजदूत को समन किया। एनलाई ने एक संदेश दिया कि, ‘अगर अमेरिका ने कोरिया में 38 पैरलल लाइन को पार किया तो चीन हस्तक्षेप करेगा।’
राजदूत ने उसी रात प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को पूरी बात बताई। नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली तक ये मैसेज पहुंचाया।
नेहरू के संदेश को अमेरिका ने गंभीरता से नहीं लिया। नतीजा- चीन भी जंग में कूद पड़ा। तमाम कोशिशों से 3 साल 1 महीने और 2 दिन बाद युद्धविराम हुआ। तब तक करीब 30 लाख लोग मारे जा चुके थे।

सवाल-1: कोरिया की जंग क्यों और कैसे शुरू हुई?
जवाबः कोरिया एक पेनिन्सुला है यानी 3 तरफ समुद्र से घिरा और एक तरफ मेनलैंड से जुड़ा टापू। यहां 1904 तक कोरियाई साम्राज्य का शासन था। इस पर कब्जे के लिए 1904-05 में जापान और चीन के बीच भीषण युद्ध हुआ। जापान ने जीत दर्ज की और कोरिया पर कब्जा जमा लिया। 1945 में सेकेंड वर्ल्ड वॉर में हार के बाद जापान को कोरिया छोड़ना पड़ा।

जापान के हटते ही कोरिया को दो हिस्सों में बांट दिया गया। 38 पैरलल लाइन को बंटवारे की लकीर मान लिया गया। उत्तरी हिस्से में सोवियत सेना और दक्षिणी हिस्से में संयुक्त राष्ट्र की सेना लगाई गई।
नॉर्थ कोरिया में कोरियाई कम्युनिस्टों के नेतृत्व में कोरियाई लोक जनवादी गणराज्य की सरकार बनी। साउथ में लोकतांत्रिक तरीके से नेता सिंगमन री के नेतृत्व में सरकार बनी। नॉर्थ का झुकाव कम्युनिस्ट विचारधारा की तरफ था, जबकि साउथ पूंजीवादी देशों की तरफ झुकाव वाला था। यहीं से विवाद शुरू हुआ। नॉर्थ कोरिया ने 25 जून 1950 को 38 पैरलल लाइन पार कर साउथ कोरिया पर हमला कर दिया।

सवाल-2: कोरिया की जंग में अमेरिका और चीन आमने-सामने कैसे आ गए?
जवाबः कोरिया में युद्ध शुरू होते ही दुनिया की नजर UN यानी संयुक्त राष्ट्र पर टिक गई। अमेरिका ने दबाव डालकर UN में वोटिंग कराई और साउथ कोरिया की सुरक्षा का जिम्मा ले लिया। दूसरे विश्वयुद्ध में जापान को सरेंडर कराने वाले अमेरिकी जनरल मैकऑर्थर के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी कोरिया पहुंची।
खतरनाक नापाम बम के साथ अमेरिकी फाइटर उड़ान भरने लगे। अमेरिकी सेना के बी-29 और बी-51 बमबर्षक विमानों ने नॉर्थ कोरिया के गांवों तक को तबाह कर दिया था। शुरुआती हिचक के बाद चीन ने नॉर्थ कोरिया का साथ देना शुरू कर दिया। हालांकि, अभी उसने अमेरिका के खिलाफ सेना नहीं उतारी थी। सोवियत संघ भी नॉर्थ कोरिया को हथियार दे रहा था।

जनवरी 1951 तक अमेरिकी सेना ने नॉर्थ कोरिया की कम्युनिस्ट सेना को न सिर्फ 38 पैरलल के पीछे धकेल दिया था, बल्कि यालू नदी के करीब पहुंच गई थी। यालू नदी चीन और नॉर्थ कोरिया के बॉर्डर पर है। ऐसे में चीन को यह डर सताने लगा कि कहीं जनरल डगलस मैकऑर्थर अपनी सेना के साथ चीन की सीमा में न घुस जाएं।
चीन के इसी डर ने उसे जंग में खुलकर उतरने के लिए मजबूर कर दिया। माओ का इशारा मिलते ही यालू नदी के किनारे मोर्चा संभाले चीन के 2 लाख से ज्यादा सैनिकों ने अचानक अमेरिकी सैनिकों पर धावा बोल दिया। उनका हमला इतना एग्रेसिव था कि अमेरिकी सेना को पीछे लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अमेरिकी सेना 38 पैरलल पर आकर ठहर गई, जो दोनों देशों के बीच का बॉर्डर था। इससे जनरल मैकऑर्थर बौखला गए। उन्होंने चीन के अलग-अलग शहरों में परमाणु बम तक इस्तेमाल करने की धमकी दे दी। जवाब में चीन के सुप्रीम लीडर माओ ने कहा कि हम 60 करोड़ की आबादी हैं। अगर 30 करोड़ मारे भी गए, तो 30 करोड़ बचेंगे।
सवाल-3: जब चीन-अमेरिका के हाथ खून से सने थे, भारत ने क्या भूमिका निभाई?
जवाबः उस वक्त भारत को आजादी मिले महज 3-4 साल ही हुए थे। PM नेहरू को डर था कि कहीं ये जंग तीसरे विश्वयुद्ध में न बदल जाए। इसलिए भारत ने कोई एक पक्ष चुनने की बजाय तटस्थ रहना ठीक समझा।
भारत ने जंग में अपने सैनिक नहीं भेजे, बल्कि 60वीं पैराशूट फील्ड एंबुलेंस यूनिट तैनात की। इसने करीब 2 लाख घायल सैनिकों की मदद की। करीब 2,300 सर्जरी की। इस दौरान भारत लगातार शांति समझौते की विफल कोशिशें करता रहा। 1952 में एक उम्मीद जगी।
जंग का कोई नतीजा नहीं निकल रहा था। इसलिए दोनों पक्षों ने 38 पैरलल लाइन पर स्थित पानमनजोम गांव में बैठक की। कई मुद्दों पर सहमति बनी, लेकिन 1.70 लाख युद्धबंदियों पर विवाद बना रहा। यहीं पर भारत की मजबूत एंट्री होती है। समाधान निकालने के लिए नेहरू ने विशेष राजदूत वीके कृष्ण मेनन को एपॉइंट किया।
मेनन ने एक बेहतरीन प्रस्ताव तैयार किया। उन्होंने कहा कि युद्धबंदियों के लिए एक कमीशन बनाया जाए। जो बंदी वापस लौटना चाहते हैं उन्हें जाने दिया जाए। जो नहीं जाना चाहते, उन्हें UN की कस्टडी में रखा जाए। जनरल असेंबली ने ये प्रस्ताव मान लिया, लेकिन सोवियत तैयार नहीं हुआ। नतीजा- फिर से जंग छिड़ गई।
लगातार कोशिशों के बाद नॉर्थ और साउथ कोरिया ने 1953 में युद्धविराम पर साइन किए। हालांकि, युद्ध बंदियों का मुद्दा अभी भी बना हुआ था। एक नई कमेटी बनी, जिसकी अध्यक्षता भारत को दी गई। कई देशों ने इस पर सवाल भी खड़े किए कि क्या भारत इतना बड़ा टास्क पूरा कर पाएगा।

सभी 1.70 लाख युद्ध बंदियों को एक कैंप में रखा गया। जनरल थिमैया के नेतृत्व में भारतीय सैनिक तैनात थे। अलग-अलग बैच में सैनिकों को उनके घर पहुंचा दिया गया। हालांकि, जंग के बाद करीब 22 हजार सैनिकों ने घर लौटने से इनकार कर दिया। उनकी कस्टडी भारत को मिल गई। अलग-अलग ग्रुप्स के सौंपने के बाद भी 88 बंदी बच गए थे, जिन्हें सेना भारत ले आई। यानी भारत ने कोई भी काम अधूरा नहीं छोड़ा।
सवाल-4: यूक्रेन दौरे पर जा रहे PM मोदी से क्या उम्मीदे हैं?
जवाबः भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह यूक्रेन की अपनी यात्रा के दौरान यूक्रेन और रूस के बीच संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान पर अपने नजरिए को रखेंगे। मोदी बुधवार को पोलैंड के लिए रवाना हुए और शुक्रवार को कीव का दौरा करेंगे।
भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक PM मोदी 21-22 अगस्त तक पोलैंड के दौरे पर रहेंगे। इसके बाद वे ट्रेन से यूक्रेन के लिए रवाना होंगे। मोदी की यूक्रेन यात्रा उनकी मॉस्को की यात्रा के कुछ हफ्ते बाद हुई है।
मॉस्को दौरे के दौरान नरेंद्र मोदी ने युद्ध को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बात की थी। मोदी ने इटली में ग्रुप ऑफ सेवन शिखर सम्मेलन के दौरान यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से भी मुलाकात की थी।
सवाल-5: क्या कोरियाई युद्ध की तरह रूस-यूक्रेन के बीच शांति स्थापित करने में भारत अहम भूमिका निभा सकता है?
जवाबः 1950 के दशक में हुई कोरियाई वॉर और 2022 में शुरू हुई रूस-यूक्रेन जंग में कई समानताएं हैं। उस वक्त भी दो खेमे बंटे थे। एक तरफ चीन-सोवियत संघ, तो दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोपीय देश थे। इस वक्त भी एक तरफ रूस और दूसरी तरफ अमेरिका मदद कर रहा है। दोनों जंग में भारत ने किसी तरफ झुकाव न दिखाते हुए तटस्थ रहने की कोशिश की है।
मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में रूस और अमेरिका दोनों को ही भारत की जरूरत है, इसलिए विवाद सुलझाने में भारत की भूमिका अहम हो जाती है। क्वाड में भारत की हिस्सेदारी को लेकर अमेरिका उत्सुक है। वहीं, ब्रिक्स में पुतिन की चाहत है कि वह मोदी और शी जिनपिंग के साथ खड़े होकर पूरी दुनिया को रूस, चीन और भारत की एकजुटता दिखाएं।
भारत ने शुरुआत से अपना स्टैंड साफ रखा है कि यूक्रेन में जंग बम, बंदूक और गोलियों के बीच सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि ‘कूटनीति और संवाद’ के जरिए खत्म होगी।
यूक्रेन में युद्ध खत्म कराने को लेकर भारत पहले से ही कोशिशें कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक महीने में पुतिन और जेलेंस्की के साथ फोन पर दो बार लंबी बातचीत की है।

सवाल-6: रूस-यूक्रेन के बीच समझौता कराने में भारत पहली पसंद क्यों है?
जवाबः रूस-यूक्रेन के बीच शांति स्थापित करने में चीन और तुर्किये के नाम भी सामने आए, लेकिन भारत की विश्वसनीयता इन पर भारी पड़ सकती है, क्योंकि ये समझौता सिर्फ रूस और यूक्रेन के बीच का नहीं, बल्कि दुनियाभर में उसकी स्वीकृति जरूरी है। इस जंग में इनडायरेक्ट तौर पर कई देश शामिल हैं।
शुरुआत में तुर्किये ने ब्लैक-सी में अनाज की आवाजाही शुरू करने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन धीरे-धीरे उसका उत्साह ठंडा पड़ गया। दुनिया के कई हिस्सों में कट्टरपंथी इस्लाम को बढ़ावा देने में तुर्किये की भूमिका संदिग्ध है।
चीन ने भी यूक्रेन के विदेश मंत्री की मेजबानी की। कुछ प्रस्ताव रखे, लेकिन फिर उसकी मध्यस्थता धीमी पड़ गई। पश्चिमी देशों को यह भी लगता है कि चीन का पलड़ा रूस की तरफ झुका रहेगा।
भारत को रूस और अमेरिका दोनों गंभीरता से ले सकते हैं। मोदी को पुतिन का समर्थन मिलता है। अमेरिका भी भारत को अधिक लचीला और खुले विचारों का मानता है।
सवाल-7: अगर भारत मध्यस्थता करता है तो उसकी शुरुआत कैसे होगी?
जवाबः मध्यस्थता में 7 दशक पुरानी कोरियाई युद्ध के दौरान अपनाई स्ट्रैटजी काम आ सकती है। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश नंदा के मुताबिक…
- शुरुआत में भारत मानवीय आधार पर कैदियों की अदला-बदली, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की सुरक्षा, क्लस्टर बम का इस्तेमाल न करने, युद्ध क्षेत्रों से नागरिकों को बाहर निकालने जैसे समझौतों पर दोनों पक्षों को राजी करवा सकता है।
- इस प्रक्रिया से पैदा हुए आपसी विश्वास से युद्धविराम भी हो सकता है। इलाकों को डिमिलिटराइज्ड किया जा सकता है। जिससे रूस और यूक्रेन अपनी-अपनी सेनाओं को मौजूदा स्थिति से कई किलोमीटर पीछे हटा लें।
- इसके बाद विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए विवादित क्षेत्रों में लोकप्रिय इच्छा का पता लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा अधिकृत शांति सैनिकों द्वारा जनमत संग्रह आयोजित कराने के सुझाव पर विचार किया जा सकता है।
